जून का महीना आते ही हम सभी आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखने लगते हैं कि काश, बस एक बार अच्छी बारिश हो जाए, ताकि इस झुलसाने वाली गर्मी और लू से राहत मिले। गर्मी में राहत की चाह रखना बहुत स्वाभाविक है; लेकिन यह भी सच है कि हम हमेशा जो नहीं है उसकी चाहत में इतने व्याकुल रहते हैं कि, जो सामने है उसकी खूबी को देखना भूल जाते हैं। आज जून की इस चिलचिलाती धूप में हम जुलाई-अगस्त की बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जैसे ही बारिश आएगी, वे सब जो आज पानी की एक बूँद के लिए तरस रहे हैं, कल जलभराव, रास्तों के कीचड़, सीलन और उमस को कोसने लगेंगे। तब हर कोई कहेगा कि इससे तो जून की सूखी गर्मी ही भली थी!
वैसे, ध्यान से देखें तो आज ये मौसम भी अपने पुराने और स्वाभाविक चक्र में कहाँ रहे? चाहे यह रिकॉर्ड तोड़ती भीषण गर्मी हो, प्रलय जैसी बाढ़ लाने वाली भारी बारिश हो या हाड़ कँपाने वाली कड़ाके की ठंड- यह सब प्रकृति का बदला हुआ रूप है, जो हमें चेतावनी दे रहा है। असल में तरक्की के नाम पर और 'अंधाधुंध विकास' के मुखौटे के पीछे जो बर्बादी हमने खुद अपने हाथों की है, हमारी उसी लालच और गलतियों के कारण ही यह मौसम चक्र बुरी तरह टूट रहा है। हम कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं, जंगलों को काटकर सड़कें बिछा रहे हैं, नदियों का दम घोंट रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि मौसम हमें अपनी ठंडी छाँव दे। यह भला कैसे संभव है? अपनी ही धरती को भीतर तक झुलसा कर हम सुखद और शांत मौसम की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में हमें ये सारे मौसम अपने सही चक्र में चले और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ इनका स्वागत आनंद मनाते हुए कर सकें, तो पहले हमें अपनी धरती को, प्रकृति को सिर्फ भुनाना बंद करना होगा।
दरअसल हम कभी उस पल को जीना ही नहीं सीखते जो हमारे हाथ में है। यही वजह है कि हम बहुत तेज दौड़कर सबकुछ बहुत जल्दी पा लेना चाहते हैं और यही छटपटाहट आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का सच बन चुकी है- जब हम बच्चे होते हैं तो हमें बड़े होने की जल्दी रहती है कि कब स्कूल की बंदिशें, होमवर्क का बोझ और बड़ों की डाँट-डपट खत्म हो और आज़ादी का आसमान मिले। फिर जब पढ़ाई के उस सुनहरे दौर से बाहर निकलते हैं, तो दिन-रात एक ही धुन सवार हो जाती है कि कब एक अच्छी- सी नौकरी मिल जाए, खूब पैसा कमाएँ, अपनी मनमर्जी से जीवन जिएँ, समाज में रुतबा बन जाए। इसके बाद जब नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों का वह मनचाहा मुकाम मिल जाता है, तब हम उस पल का आनंद लेने के बजाय फिर अतीत की ओर मुड़कर देखने लगते हैं कि हमारा वह बेफिक्री वाला बचपन ही सबसे अच्छा था, जहाँ न कोई ईएमआई का तनाव था और न ही कोई जिम्मेदारी। कहने का तात्पर्य यही है कि हम हमेशा अगले पड़ाव की अंधी तलाश में वर्तमान को अधूरा छोड़ते चले जा रहे हैं।
इस निरंतर आगे भागने और जो हाथ में है उसे कमतर आँकने की आदत ने हमें भीतर से बहुत अधीर, असंतुष्ट और रोबोट जैसा बना दिया है। हमने जिंदगी को एक मशीन समझ लिया है, जहाँ बस चौबीसों घंटे बिना रुके, बिना सोचे-समझे किसी अनजानी रेस के पीछे भागते चले जाना है। जबकि यह सनातन सत्य है कि जीवन जीने की अपनी एक बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। जैसे प्रकृति किसी बीज को रातों-रात पेड़ बनाकर फल देने के लिए मजबूर नहीं करती, वह उसे हर मौसम को सहने और धीरे-धीरे पनपने का समय देती है, वैसे ही हमें भी अपनी उम्र के हर पड़ाव को, उसकी हर खूबी और कमी के साथ स्वीकार करते हुए सहजता से पार करते चले जाना चाहिए। लेकिन आज का इंसान अपनी इस सहजता को भूलकर दूसरों के साथ एक ऐसी आत्मघाती होड़ में शामिल हो गया है, जिसकी न तो कोई मंजिल है और न ही कोई अंत। पड़ोसी की गाड़ी, सहकर्मी का प्रमोशन या सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली चमक देखकर हम अपने आज के सुकून को दांव पर लगा देते हैं।
प्रकृति का अपना एक अटूट नियम है। जून की यह तपिश और लू भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जितनी जुलाई की रिमझिम बौछारें। यह धूप सिर्फ हमारे बदन को नहीं तपाती, बल्कि खेतों में खड़ी फसलों को पकाने, मिट्टी के भीतर के हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने और पूरी पृथ्वी के जल-चक्र को संतुलित रखने के लिए बेहद आवश्यक है। यदि जून में यह प्रचंड गर्मी नहीं पड़ेगी, तो समुद्र का पानी भाप बनकर आसमान में नहीं जाएगा और अगर भाप नहीं बनेगी तो सावन के बादल कहाँ से आएँगे? ठीक इसी तरह, जिंदगी के संघर्ष, कठिनाइयाँ और हमारे हिस्से में आई जिम्मेदारियों की धूप भी हमें भीतर से तपाकर परिपक्व बनाती है। अगर हम इस धूप की तपन को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर लें, तो इसके बाद मिलने वाली सफलता या सुख का आनंद अपने आप दोगुना हो जाएगा।दरअसल भविष्य के सुंदर और काल्पनिक ख्वाब बुनने में हम इतने मशगूल रहते हैं कि आज के यथार्थ की धूप को सहने का हौसला और धीरज खो देते हैं। जो बीत गया वह सिर्फ यादें हैं, उन पर हमारा कोई वश नहीं है। जो आने वाला है वह केवल एक अनिश्चित संभावना है, जिसके बारे में हम सिर्फ कयास लगा सकते हैं। लेकिन जो पल, जो दिन और जो रिश्ते इस समय हमारे ठीक सामने मौजूद हैं, वही हमारा वास्तविक जीवन है। तो जब तक हम हर स्थिति और हर मौसम के साथ सामंजस्य बिठाना नहीं सीखेंगे, तब तक हम चाहे मनचाही बरसात पा लें या जीवन का कोई बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लें, हमारे मन के किसी कोने में एक छटपटाहट हमेशा बनी रहेगी। और यह छटपटाहट तभी दूर होगी जब हम कहीं पहुँचने की हड़बड़ी छोड़कर, इस सुंदर सफर की खिड़की से बाहर देखते हुए आज पर ठहरकर खुलकर सांस लेना नहीं सीख जाएँगे। जिंदगी कल नहीं, बल्कि इसी वक्त, इसी पल में है।


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