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Jun 1, 2026

दो कविताएँः

 - सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

1. दक्षिण यात्रा के पूर्व 

मैं खुद में उतारना

चाहती हूँ

अध्यात्म की बातें

आत्मा के जागृत

होने की बातें

त्राटक, साधना

उपासना की बातें

इंगला, पिंगला और

सुषुम्ना के बीच बहती

साँसों की नदी के बारे में

मेरुदंड के अवस्थित

सातों चक्र के बारे में

ध्यान की अवस्था में

शून्य मन

शून्य तन

और उस निराकार के बारे में

शरीर, जगत

को धारण करने वाले

पंच तत्त्व की

बातें

भृकुटि के बीच अवस्थित

अपने ही तीसरे नेत्र की बातें

दक्षिण दिशा की

यात्रा के पूर्व

ब्रह्मांड के शून्य

संग मिल पूर्ण हो

जाने के बारे में

2. अंतर्यात्रा

कभी तुम

खामोश हो जाओ

और बोलने दो

खामोशी को

शांत हो जाओ

और

हलचल होने दो

शून्यता में

कभी रुक जाओ

औऱ चलने दो

स्थिरता को

कानों पर हाथ रख लो

और कहने दो

खामोशी को

हमेशा एक निश्चित

सीध में चलना ही

गति नहीं  होती

कभी दिशा के विपरीत

मुँह कर रुक जाना भी

गति होती है

यह गति होती है

स्वयं खुद की

अगर किसी दिन 

तुम खुद के

बुद्ध बनना चाहो

तो

नदी के विपरीत दिशा में

तैर जाना

सारे जन्मों का तीर्थ

तुम्हारे ही उद्गम के

मुहाने पर

तुम्हारी प्रतीक्षा में

खड़ी मिलेगी।


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