जंगल में घर बहुत ही कम हैं
बोले कैसे वास करेंगे?
घर में जंगल जब उग जाएँ
जीने की क्या आस करेंगे।
- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
इस अंक में
अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या ‘सच’ से भी भाग रहे हैं? - डॉ. रत्ना वर्मा
आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल - प्रमोद भार्गव
मनोविज्ञानः बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ - स्रोत फीचर्स
कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ! - अंजू खरबंदा
भाषाः पाँच सौ प्रतियाँ और करोड़ों के प्रतिनिधि - जयप्रकाश मानस
चिंतनः टूटना, बिखरना, समेटना और सँवरना - डॉ. महेश परिमल
यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा - मांडवी सिंह
लघुकथाः साँझा दर्द - सुदर्शन रत्नाकर
लघुकथाः 1. कूप मण्ड़ूक, 2. बैल - सुकेश साहनी
कविताः बचा रहे जो आवश्यक है - पूनम चौधरी
व्यंग्यः प्लास्टर वाली टाँग - डॉ. मुकेश 'असीमित'
किताबेंः युवा क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराती कृति - प्रो. सुरंगमा यादव
आलेखः प्रेम शब्द का घटता अर्थ और भाषा की जिम्मेदारी - हिना श्रीवास्तव

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