- डॉ. पूनम चौधरी
बचा रहे
जो सच में आवश्यक है।
सवेरा
जब खिड़की पर आए-
सिर्फ़ उजाला नहीं,
भरोसे की
एक किरण भी लाए,
जो चुपचाप जोड़ सके
टूटे हुए तार।
बचा रहे स्पर्श-
वह,
जो देह से परे
मन तक पहुँचता है,
मुक्त करता है
पीड़ा से,
बेचैनी से,
क्लांति से-
जैसे
माँ का हाथ,
निर्वाक,
सिर पर ठहरा हुआ।
बची रहे
हाथों की कोमलता-
उनमें ऊष्मा हो,
वे जानें
तोड़ना नहीं,
सहेजना;
छिटकना नहीं,
थामे रखना।
बचा रहे स्वाद-
न अधिक मिठास,
न अनावश्यक कड़वाहट,
बस
रोटी की भाप-सा सादा,
जो जीवन को
धीरे-धीरे पकाता रहे।
सीखा जाए
केवल उपयोग नहीं-
मान रखना भी।
बचा रहे मनुष्य,
और उसकी मनुष्यता।
सड़कों का शोर
सिर्फ़ प्रतिध्वनि न हो-
उसमें
अर्थ की एक लौ बचे,
जो
हवा के साथ भी जले,
और
विरुद्ध भी।
निराशा का भी
एक कोना हो-
जहाँ
अँधेरे के भीतर
प्रभात
संभावना बनकर ठहरा रहे।
बचा रहे प्रेम-
उसमें
सरलता हो,
थोड़ी-सी मासूमियत,
थोड़ी-सी नादानी-
जैसे
बच्चे की अकारण हँसी,
जो भीगी आँखों में भी
जगा दे
मुस्कान के जुगनू।
रिश्ते
बोझ न बनें-
ठिकाने हों,
जहाँ लौटकर
भटकनों के बाद
मन
उतार सके
अपने थकान भरे जूते,
और पा सके विश्रांति।
कवि
जब भी लिखें-
सच लिखें।
चाहे वह चुभे,
चाहे उठाए प्रश्न-
पर
संवेदना कम न हो;
दूसरों के दुःख को
महसूस करने की
क्षमता बची रहे।
और-
जब तक यह जीवन है,
यह आकांक्षा भी बनी रहे।
क्योंकि
जब तक
बचाए रखने की
इच्छा है,
तब तक
दुनिया में कहीं न कहीं
उम्मीद की एक लौ
जलती रहती है।

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