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May 1, 2026

कविताः बचा रहे जो आवश्यक है

  - डॉ. पूनम चौधरी 

बचा रहे

जो सच में आवश्यक है।


सवेरा

जब खिड़की पर आए-

सिर्फ़ उजाला नहीं,

भरोसे की 

एक किरण भी लाए,

जो चुपचाप जोड़ सके

टूटे हुए तार।


बचा रहे स्पर्श-

वह,

जो देह से परे

मन तक पहुँचता है,

मुक्त करता है

पीड़ा से,

बेचैनी से,

क्लांति से-

जैसे

माँ का हाथ,

निर्वाक,

सिर पर ठहरा हुआ।


बची रहे

हाथों की कोमलता-

उनमें ऊष्मा हो,

वे जानें

तोड़ना नहीं,

सहेजना;

छिटकना नहीं,

थामे रखना।


बचा रहे स्वाद-

न अधिक मिठास,

न अनावश्यक कड़वाहट,

बस

रोटी की भाप-सा सादा,

जो जीवन को

धीरे-धीरे पकाता रहे।


सीखा जाए

केवल उपयोग नहीं-

मान रखना भी।

बचा रहे मनुष्य,

और उसकी मनुष्यता।


सड़कों का शोर

सिर्फ़ प्रतिध्वनि न हो-

उसमें

अर्थ की एक लौ बचे,

जो

हवा के साथ भी जले,

और

विरुद्ध भी।


निराशा का भी

एक कोना हो-

जहाँ

अँधेरे के भीतर

प्रभात

संभावना बनकर ठहरा रहे।


बचा रहे प्रेम-

उसमें

सरलता हो,

थोड़ी-सी मासूमियत,

थोड़ी-सी नादानी-

जैसे

बच्चे की अकारण हँसी,

जो भीगी आँखों में भी

जगा दे

मुस्कान के जुगनू।


रिश्ते

बोझ न बनें-

ठिकाने हों,

जहाँ लौटकर

भटकनों के बाद

मन

उतार सके 

अपने थकान भरे जूते,

और पा सके विश्रांति।


कवि

जब भी लिखें-

सच लिखें।

चाहे वह चुभे,

चाहे उठाए प्रश्न-

पर

संवेदना कम न हो;

दूसरों के दुःख को

महसूस करने की

क्षमता बची रहे।


और-

जब तक यह जीवन है,

यह आकांक्षा भी बनी रहे।


क्योंकि

जब तक

बचाए रखने की

 इच्छा है,

तब तक

दुनिया में कहीं न कहीं

उम्मीद की एक लौ

जलती रहती है।

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