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May 1, 2026

आलेखः मनोरंजन के बहाने आतंक का पाठ पढ़ते बाल-गोपाल

 -  प्रमोद भार्गव

अमेरिकी दैनिक 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी खबर के अनुसार, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो गेम किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं। अतएव, आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है, तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिए आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है। इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएँ।

इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की 'काउंटर-टेररिज्म कमेटी' ने किया है। इसके अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आँकड़ा तीन गुना अधिक है। नीदरलैंड के हेग स्थित 'इन्टरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म' के अनुसार, यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों की जांच में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं। अनेक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से किशोरों और बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं। ये प्रशिक्षित बच्चे कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

हालाँकि, भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है। मुंबई के 26/11/2008 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है। इस सच्चाई का खुलासा संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। पाकिस्तान के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली’ अखबार में पहले ही यह मुद्दा उठा दिया था— “कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं। हमने इस धंधे को व्यापार का जरिया बना लिया है, वह भी अपनी ही कौम के किशोर एवं युवाओं के जीवन को दाँव पर लगाने का खेल खेलते हुए!”

पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है। इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है, नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है। फिलहाल विश्व में लोकप्रिय डिजिटल खेलों में मोबाइल प्रीमियर लीग (एमपीएल), फेंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म, माइनक्राफ्ट, रोब्लॉक्स, ड्रीम-11, कोरियन लवर गेम और लूडो किंग हैं। ये सभी खेल भारत समेत लगभग सभी देशों में उपलब्ध हैं। भारत से संचालित होने वाली खेल कंपनियों में चीन सहित कई देशों की कंपनियों की पूँजी लगी हुई है। इन खेलों के अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और स्पेन बड़े खिलाड़ी हैं।

हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। इन बहनों को ऑनलाइन ‘टास्क बेस्ड कोरियन लवर गेम’ खेलने की लत लग गई थी। इसी आत्मघाती खेल को खेलते हुए इन बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। इस घटना से साफ होता है कि ये खेल कितने खतरनाक हैं।

कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बढ़ते चलन के चलते दुनिया के विद्यार्थियों की मुट्ठी में एंड्रॉयड मोबाइल जरूरी हो गया था। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इसके बढ़ते चलन पर निरंतर चिंता प्रकट कर रहे हैं। अभिभावक बच्चों में गेम देखने की बढ़ती लत और उनके स्वभाव में आते परिवर्तन से चिंतित व परेशान हैं। वे बच्चों का मनोचिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद इस लत से मुक्ति दिलाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। दरअसल, बच्चों का मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन पर बढ़ता समय आँखों की दृष्टि को खराब कर रहा है। साथ ही, बच्चे अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों की गिरफ्त में भी आ रहे हैं। यहाँ तक कि बच्चे पोर्न फिल्में देखते भी पाए गए हैं।

अब ऐसे वीडियो खेल भी आभासी दुनिया (Virtual World) के लिए बनाए जाने लगे हैं, जहाँ खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड के चर्च और मस्जिदों पर हुए हमलों को भी खेलों का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये उपाय बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी बनाए जाने की दृष्टि से किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में किशोर और युवाओं को लुभाने के लिए ‘एक्टिव क्लब्स’ नाम के समूह बनाए जा रहे हैं। ये ऐसे समूह हैं जो खेलते हुए नस्लीय युद्ध की तैयारी में जुट जाते हैं और नस्लीय भावना से लड़ते दिखाई देते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लबों द्वारा 15 से 17 साल के नादान किशोरों को लक्षित किया जा रहा है। इन्हें देखते हुए किशोर अपनी गोरी या काली पहचान से जुड़कर नस्लवादी मानसिकता की गिरफ्त में आकर आतंकी बनने की दिशा में अनायास मुड़ जाते हैं।

ऑनलाइन खेल आंतरिक श्रेणी में आते हैं, जो भौतिक रूप से मोबाइल पर एक ही किशोर खेलता है, लेकिन इनके समूह बनाकर इन्हें बहुगुणित कर लिया जाता है। वैसे तो ये खेल सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन ब्लू ह्वेल, पबजी, माइनक्राफ्ट और रोब्लॉक्स जैसे खेल उत्सुकता और जुनून का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि मासूम बालक के दिमाग की परत पर नकारात्मकता की पृष्ठभूमि रच देते हैं।

मनोचिकित्सकों और स्नायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खेल बच्चों के मस्तिष्क पर बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। ये प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीव्र व तीक्ष्ण होते हैं; इसलिए ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट होते हैं। दरअसल, व्यक्ति की आंतरिक शक्ति से आत्मबल दृढ़ होता है और जीवन क्रियाशील रहता है; किंतु जब बच्चे निरंतर एक ही खेल खेलते हैं, तो दोहराव की इस प्रक्रिया से मस्तिष्क कोशिकाएँ परस्पर घर्षण के दौर से गुजरती हैं। नतीजतन दिमागी द्वंद्व बढ़ता है और बालक मनोरोगों से लेकर नस्लीय गिरफ्त में आता जाता है, जो उसे आतंक की राह में धकेलने का काम कर देते हैं।

ये खेल हिंसक और अश्लील होते हैं; इसलिए बच्चों के आचरण में आक्रामकता और गुस्सा देखने को मिलता है। दरअसल, इस तरह के खेल देखने से मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न करने वाले डोपामाइन जैसे हार्मोनों का स्राव होने लगता है। इस द्वंद्व से भ्रम और संशय की मनःस्थिति निर्मित होने लगती है और बच्चों का आत्मविश्वास छीजने के साथ विवेक अस्थिर होने लगता है, जो उन्हें आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर देता है। हालाँकि, डोपामाइन ऐसे हार्मोन भी सृजित करता है जो आनंद की अनुभूति के साथ सफलता की अभिप्रेरणा देते हैं; किंतु यह रचनात्मक साहित्य पढ़ने से संभव होता है, जो अब अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं और घरों से बाहर होता जा रहा है। यह एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है।

सम्पर्क: शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.) 

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