इन दिनों मैं पहाड़ों की ओर रोड ट्रिप पर हूँ। जब भी घर या दोस्तों से बात होती है और वे जब उधर का हाल बताते हैं कि यहाँ तो पारा 45-46 डिग्री से भी ऊपर पहुँच गया है, तो एक अजीब-सी द्वंद्वात्मक स्थिति मन में जन्म लेती है। एक ओर मैं हूँ, जो इस भीषण गर्मी से राहत पाने, अपने घुमक्कड़ी शौक को पूरा करने, पहाड़ों की ठंडी हवा में सुकून ढूँढने निकल पड़ी हूँ; दूसरी ओर वे लोग हैं, जो उसी तपिश में झुलस रहे हैं।
सच तो यह है कि मुझे घूमने का शौक है। मौका मिले, साथ मिले, तो बस निकल पड़ती हूँ। इस बार की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है- रायपुर से सिलीगुड़ी, फिर कालिम्पोंग, गंगटोक में चंगू लेक और नाथुला दर्रा होते हुए दार्जिलिंग की ओर बढ़ रही हूँ। यहाँ का मौसम मन को हर पल ठंडक देता है। बादलों की ओट में लिपटे पहाड़, हल्की बारिश की फुहारें और ठंडी हवा के झोंके- सब कुछ किसी स्वप्नलोक जैसा लगता है। यहाँ आकर मन प्रसन्न है, आत्मा जैसे तरोताज़ा हो गई हो।
लेकिन जैसे ही नीचे के इलाकों का हाल सुनती हूँ, मन ठहर जाता है। सोचने को विवश हो जाती हूँ- क्या हम सिर्फ़ इस ठंडक का आनन्द लेने के लिए यहाँ आए हैं, या उस तपिश से आँख चुराने के लिए भी, जो अब हर साल और भयावह होती जा रही है?
छह दशक का जीवन बीत चुका है। बचपन से लेकर अब तक हर साल गर्मियाँ देखी हैं। लू के थपेड़े भी नए नहीं हैं; लेकिन पिछले एक- दो दशकों में जो बदलाव आया है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। अब गर्मी सिर्फ़ असहनीय नहीं रही, बल्कि खतरनाक होती जा रही है। हाल ही में देश के कई हिस्सों से खबरें आई हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़- जहाँ तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच गया। कई शहरों में ‘हीट वेव’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ जगहों पर तो मौत की खबरें भी सामने आई हैं।
वैज्ञानिक भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं। बदलते मौसम और धरती के लगातार गर्म होने की समस्या अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की सच्चाई बन चुकी है। दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है, बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है- ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है।
पर सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उत्तर बहुत जटिल नहीं है- हम स्वयं हैं।
विकास की दौड़ में हमने प्रकृति को पीछे छोड़ दिया है। सड़कों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को चीर दिया जा रहा है, रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों पर कंक्रीट के भारी भारी पिलर खड़े किए जा रहे हैं। बिजली बनाने के लिए अब भी कोयले पर ज्यादा निर्भरता है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं; लेकिन उनके लिए पर्यावरण के कड़े नियमों का पालन अक्सर नहीं दिखता।
विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों की ओर हम गर्मी से राहत पाने आते हैं, वहाँ भी वही कहानी दोहराई जा रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों को कंक्रीट से ढका जा रहा है। होटल, रिसॉर्ट, सड़कें- सब कुछ इस तरह बढ़ रहे हैं कि पहाड़ों की असली बनावट ही खतरे में पड़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जल- स्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता भी खतरे में पड़ रही है।
मौसम विभाग और दुनिया की कई संस्थाएँ बार-बार कह रही हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू और भी तेज़ और लंबे समय तक पड़ सकती है। सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सब चिंता सिर्फ़ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सरकारों की जिम्मेदारी रह गई है, क्या हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। हम अक्सर कहते हैं- “सरकार कुछ नहीं कर रही।” लेकिन क्या हम स्वयं कुछ कर रहे हैं?
क्या हमने अपने स्तर पर पेड़ लगाने की कोशिश की? क्या हमने बिजली और पानी के इस्तेमाल में संयम बरता? क्या हमने प्लास्टिक का उपयोग कम किया? क्या हमने अपने शहरों में हरियाली बचाने की कोशिश की? सच यह है कि हम समस्या को समझते हैं, उस पर चर्चा भी करते हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कदम उठाने से बचते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ।
विकास जरूरी है; लेकिन वह प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना होना चाहिए। तरक्की तो हर किसी को चाहिए; पर हमें ऐसी तरक्की करनी होगी, जिसमें हम आगे भी बढ़ें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। सरकारों को भी कड़े नियम बनाने होंगे- जंगलों की कटाई पर नियंत्रण, निर्माण कार्यों के लिए कठोर पर्यावरणीय स्वीकृति, सूरज, हवा और पानी से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना होगा; लेकिन इसके साथ-साथ, आम नागरिक के रूप में हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जैसे- जब हम यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति का सम्मान करें। कूड़ा न फैलाएँ, स्थानीय संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग न करें। ऐसे पर्यटन को अपनाएँ , जिससे घूमना भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
आज जब मैं इन पहाड़ों की ठंडी हवा में साँस ले रही हूँ, तो यह सोचकर संतोष होता है कि अभी भी प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है और देती ही जा रही है; लेकिन यह संतोष तभी तक है, जब तक हम इसे सहेज कर रख सकें। यदि हमने अभी भी चेतावनी को अनसुना किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब ये पहाड़ भी तपने लगेंगे और हमें राहत पाने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।
इसलिए जरूरी है कि हम सिर्फ़ चिंतित न रहें, बल्कि सक्रिय भी हों; क्योंकि यह सिर्फ़ मौसम का बदलाव नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।

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