- बसंत राघव
ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... फिर वही आवाज़, बिल्कुल वही आवाज़, जानी-पहचानी सी। लाठी टेक-टेक कर चलने वाली मंगतिन बुढ़िया। कुछ पल बाद फिर दरवाज़े पर खड़ी हो जाएगी सतजुगिया डोकरी... मैं चौकन्ना हो गया हूँ। आँखें बिछ गई हैं दरवाज़े की ओर। फिर ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... लेकिन कोई नहीं है वहाँ। अब तक तो आ जाना था उसे। ताज्जुब है, शायद लौट रही हो मुझे ग़ैरहाज़िर जानकर, यही सोच रहा था।
समय की बड़ी पाबंद है बुढ़िया। बिल्कुल इसी समय, चाहे मूसलाधार पानी गिर रहा हो, चाहे सूरज आग बरसा रहा हो या भयावह ठंड हड्डियों में बर्फ़ भर रही हो—वह अपने भीख माँगने के काम में एक दिन भी नागा नहीं करती। फिर आज क्या हुआ उसे? मेरे मानस-पटल में अनेक सवाल उग रहे हैं।
अनायास मैं उठ बैठा हूँ। कुछ कौंधा है मेरे ज़हन में। "रामधनिया! ओ रामधनिया! मत डरा मुझे, ख़बरदार—फिर कभी..."
ओह! सरासर भ्रम है मेरा। रामधनिया कभी नहीं आएगी, अब आ ही नहीं सकती वह। हत्तेरे की, मैं भी कैसा पागल हूँ! कल शाम तो फूँका था उसे गाँव वालों ने। सच में मेरा दिमाग खराब हो गया है। मैं फिर से बिस्तर पर सो जाता हूँ। चित्त को स्थिर करने की नाकाम कोशिश करता हूँ।
हवा बड़ी तेज़ चल रही है। बरामदे में आज एक भी बच्चा नहीं है। लगता है सब अपने-अपने घर लौट गए हैं। गहरा सन्नाटा पसरा है। ध्यान को एकाग्र नहीं कर पा रहा हूँ। कितना मार्मिक प्रसंग छेड़ दिया मन ने। नाहक भ्रम—केवल भ्रम-जाल के चलते ठुक-ठुक की आवाज़ जो मैंने सुनी, वस्तुतः वह मेरे अवचेतन की प्रतिध्वनि थी। मैंने चादर सिर तक खींच ली है। मेरे दोनों हाथ फिर से सीने पर आ गए हैं। यह क्रिया बिल्कुल अनजाने तौर पर हुई है। मैं तो शांत चित्त बिस्तर में पड़े रहना चाहता था, लेकिन—बलात् अचेतन मस्तिष्क की कारस्तानी! ओह! सेरेब्रल हैमरेज—विस्फोट!
मुझे लगा मैं भयावह दुष्कल्पनाओं से घिरता जा रहा हूँ। तभी भीतर से आवाज़ आई—मत सोचो अनाप-शनाप। मैं अपने आप से बुदबुदा उठता हूँ—यह क्या हो रहा है आज मुझे? एकदम तुच्छ-सी बातों को इतना तूल क्यों दे रहा हूँ मैं?
ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... फिर वही आवाज़—लयबद्ध, अनवरत, चिरश्रुत। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठता हूँ। चादर स्वयमेव मेरे शरीर से नीचे गिर गई है। डर के मारे मेरा रोआँ-रोआँ खड़ा हो गया है।
"रामधनिया!" मैं प्रायः चीख उठा हूँ। आँगन से अभी-अभी एक गौरैया फुर्र से उड़ गई है। आवाज़ बाहर से नहीं, मेरे भीतर की घाटियों में गूँज गई है दूर-दूर। वही आवाज़, बिल्कुल वही, मैंने सुनी है इन्हीं कानों से। पिछले कई सालों से सुनता आ रहा हूँ—ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... "हे राम, दे-दे राम, देवा दे राम, देने वाला दाता राम!"
रामधनिया की बूढ़ी चरमराती आवाज़ नित्य खनकती दरवाज़े पर, और चादर फेंक कर मैं झुँझलाता हुआ उठता हूँ। खटिया चरमरा जाती है, गोया गाली देती हो रामधनिया को असमय आने पर। डरावनी मूर्ति—अशुभ सी, कंकाल सी खड़ी हो गई हो जैसे।
"उफ़! चांडालिन, चांडालिन! मौत भी नहीं आवे राँड को, सिहर उट्ठे परान देखके। सराप लग्गे है करमजल्ली को!" (गाँव की औरतें अक्सर उसे देखकर फुसफुसातीं)।
मैं महसूस करता हूँ, दिल में कहीं पीड़ा है—घनीभूत, संचित। मैं भीख देता—एक मुट्ठी चावल मात्र। एल्युमीनियम का बड़ा सा तसला अक्सर खाली ही होता था, ठीक अपनी धारिका के उदर जैसा। पर वह तो कल शाम ही जा चुकी है, हमेशा के लिए निकल चुकी है अनंत यात्रा पर। रात जब मैं निकला था मैदान की तरफ़, तो निहारी थी उसकी धू-धू जलती हुई चिता। उसकी चटखती हुई हड्डियों की आवाज़ सुनी थी मैंने। इतना बड़ा भ्रम आज तक कभी हुआ नहीं मुझे। अब तो मुझे यह आशंका भी होने लगी है कि मैं कहीं सरक तो नहीं गया हूँ?
रामधनिया भला अब क्यों आने लगी? पार हो गई वह, छूट गई सारे जंजाल से बेचारी। अच्छा हुआ, रोज़-रोज़ की भीखमँगाई से फ़ुरसत पा गई वह। ठुक-ठुक की आवाज़ जो आती थी उसकी चार-फ़ुटिया लाठी से, उसे भी तो लोगों ने फेंक दिया था रामधनिया की चिता में। लोगों ने सोचा, अगर लाठी रह जाएगी तो भटकेगी बेचारी डोकरी।
"हे राम" और "ठुक-ठुक" की ध्वनि अब सदा-सदा के लिए मौन हो चुकी है; लेकिन मैं अपने इस महाभ्रम को ढूँढने लगा हूँ—कारण-अकारण। और कारण मिल गया है। कल इसी समय तो वह आई थी भीख माँगने, रोज़ की तरह। पर भीख मिलने के बाद भी वह खड़ी रही थी ठंड में। मेरे पूछने पर कहा था उसने—"बड़ी चाह है बाबू, चाहा पिए बर जी करत हे—चायपत्ती थोरिक दे देते का? अउ होही त कुछु जुन्ना गरम ओन्हा दे देते। घात जाड़ लागत हे बाबू।"
न जाने क्यों मैंने उसे झिड़क दिया था। वह वैसे ही उल्टे पाँव लौट गई थी; लेकिन उसके जाने के बाद सच में मुझे बहुत-बहुत पछतावा हुआ था। और जब शाम को सुना कि वह नहीं रही, तो सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ। लेकिन नियति की क्रूर सच्चाई यही थी।ओह! स्मृति का कोई आयाम छू गया है मानस को। मैंने फिर उठा ली है चादर। मन भारी हो गया है; लेकिन ठंडी हवा असमय चल रही है—साँय-साँय, साँय-साँय... भुतहा एकांत के ख़ौफ़ को और भी घना करती हुई। तेज़ झोंका बाहर अधमरे पपीते के पेड़ को बुरी तरह से हिला रहा है। कम्बख़्त फिर वही चिर-परिचित आवाज़—ठुक-ठुक, ठुक-ठुक...
मैं फिर से विचलित हो गया हूँ। खुद को बहुत मुश्किल से सहेजा था, फिर बिखर गया हूँ। लेकिन इस बार नहीं उठा हूँ। खटिया से उठने की ज़रूरत भी नहीं है। घबराने की भी ज़रूरत नहीं है।
"ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... दे-दे राम, देवा दे राम, देने वाला दाता राम... घात जाड़ हे बाबू—चाहा पिए बर थोरिक चायपत्ती दे देते का? अउ होही त जुन्ना गरम ओन्हा..."
ठुक-ठुक, ठुक-ठुक... वह लौट रही है—लाचार, अशक्त, पीड़ित, बेआबरू होकर। ओह! काश कि मुझे पता होता वह उसकी अंतिम याचना थी, अंतिम इच्छा थी उसकी—चाय पीने की... वह भी मुझसे आखिरी बार... धिक्कार, धिक्कार! एक कप चाय इतनी बड़ी चीज़ हो गई? नियामत? धत्त!
मैं चाहकर भी उठ नहीं पा रहा हूँ। हाथ-पैर बिल्कुल भारी हो गए हैं। साँसों की रफ़्तार तेज़ हो गई है। मैं जड़वत हो गया हूँ। अनजाने भय से निजात पाने की छटपटाहट, प्यास और प्यास, पैशाचिक जकड़न तीव्र से तीव्रतर। मैं निढाल सा हो गया हूँ। सारी देह पसीने से तरबतर। बिल्कुल भीतरी गहराई से एक शक्ति उठी है—आतंक से बाहर हो गया मैं अचानक।
चेतना में महज़ गूँज बाकी है। ठुक-ठुक की नामुराद आवाज़ और मैं फिर एक बार उठ खड़ा हुआ हूँ झटके से—चरमरा उठी है खटिया। दीवार पर टँगे दर्पण पर ठहर गई है नज़र। मैं अकबका गया हूँ एकबारगी।
एक शरारती गौरैया न जाने कब से ठुकठुका रही है दर्पण को—अपनी ही छाया को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर! या और कुछ? मुझे दया आई उस नासमझ पर (और अपने आप पर)। उसकी चोंच से रिस रही हैं... खून की बूँदें।
सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं. 30, कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़- 96001, छत्तीसगढ़, ईमेल- basantsao52@gmail.com, मो. 8319939396


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