- भीकम सिंह
1दूर है कंत
रुआँसे लौट रहे
सारे बसंत।
2
उपेक्षित हैं
किसान की कथाएँ
खेत क्या गाएँ।
3
मेघों के स्वर
बगावत के हैं तो?
क्या करें घर।
4
ढूँढते पाँव
सुबह और शाम
खेतों में गाँव।
5
सैंकड़ों बार
स्मृतियों ने बाँधे हैं
बन्दनवार
6
चुप ही रहूँ
अँधेरों के खिलाफ
क्या सच कहूँ ?
7
जगते दीये
अँधियारा बैठा है
होठों को सिये।
8
दरो-दीवारें
आँगन के भी तारे
माँ ही क्यूँ हारे।
9
बीड़ी फूँकता
खेतों में बैठकर
गाँव का डर।
10
नभ को हारे
चाँद जस का तस
दिखाता तारे।

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