ऋचा के कमरे से बाहर आते ही नीरव दाँत पीसते हुए बुदबुदाया, "ये अंदर मैथ्स की ट्यूशन ले रही थीं या इन हाईस्कूल के स्टूडेंट्स का दिमाग खराब कर रही थीं, हैं!"
ऋचा की आवाज शांत थी, "क्लास खत्म करके पाँच मिनट तो मैं बच्चों से रोज बात करती ही हूँ; लेकिन आज अचानक आकर आपने ऐसा क्या सुन लिया?"
नीरव और झल्ला गया, "अरे उनको ये सब खबरें-वबरें बाँचना... और क्या! और ये सब वाहियात उलटी-सीधी सुर्खियाँ.. ये सब डिटेल उन्हें बताने की जरूरत ही क्या है? जरा ये तो सोचो तुम हमारे राहुल और पीयूष को भी तो साथ पढ़ाती हो। क्या असर पड़ेगा उन पर?"
ऋचा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा, "असर ये पड़ेगा कि मेरे सारे विद्यार्थियों की तरह वे भी संवेदनशील बनेंगे। कल ये सब खौफनाक सुर्खियाँ ही गायब हो जाएँ, इसके लिए मैं आज को सुधार रही हूँ। मैं उन्हें लड़कियों की इज्जत करना, उनकी तकलीफ महसूस करना सिखा रही हूँ, बस।"
नीरव के पंजे का दबाव उसकी बाँहों पर बढ़ता चला जा रहा था- “बंद करो ये सब बकवास..." आगे कुछ कहते हुए अचानक वह खड़ा का खड़ा रह गया। उसका हाथ नीचे गिर गया। सामने बैग टाँगे हुए उसका बेटा राहुल खड़ा उसे एकटक देख रहा था और नीरव पहली बार उससे नजरें नहीं मिला पा रहा था। ■

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