- डॉ. पूनम चौधरी
मृत्यु,तू जब भी आना, दबे पाँव आना।
इतना धीरे
कि न टूटे
मेरे घर की हवा का संतुलन।
न काँपे तेरी आहट से
तुलसी की पत्तियों पर ठहरी ओस।
घर के कोनों में न भर देना
अचानक से खालीपन।
बस मेरे स्पंदन को
बन जाने देना स्मृति।
मैं केवल एक देह,
एक नाम,
एक स्त्री नहीं हूँ।
मैं फैली हूँ—
उस दाम्पत्य में
जो शब्दों से नहीं,
साथ बिताए समय के
अवक्षेप से बना है;
जहाँ एक के अंतर्मन में उठा
अल्पतम कंपन भी
दूसरे तक
बिना किसी उच्चारण के
पहुँच जाता है।
उन अदृश्य आश्रयों में,
जहाँ मेरे बच्चे
अपनी पराजय,
अपने भय
और अपने अनकहे दुःख
मेरी हथेलियों पर रखकर
निश्चिंत हो जाते हैं।
अपनी माँ की प्रार्थनाओं में,
जहाँ मैं आज भी
उनकी चिंता का
सबसे कोमल कारण हूँ।
अपने विद्यार्थियों की
उत्सुक आँखों में,
जो अपने
नन्हे हाथों से
वर्णमाला का
पहला स्वर साध रहे हैं।
आँगन का हरसिंगार,
खिड़की की गौरैया,
दरवाज़े पर बैठा वह बूढ़ा कुत्ता—
ये सब मेरे जीवन के बाहर नहीं,
मेरे जीवन के विस्तार हैं,
जो मेरे होने को
किसी परिचय के बिना
पहचान लेते हैं।
इसलिए, मृत्यु,
तू जब भी आना,
दबे पाँव आना।
मुझे पता है,
मेरा जाना भी
इस व्यवस्था का स्वाभाविक क्रम है
किन्तु
हर प्रस्थान का होता है
एक ऋतु-विज्ञान,
हर विदाई की होती है एक गरिमा।
बस तब आना,
जब मेरे हिस्से का प्रेम
पहुँच चुका हो
अपने समस्त आश्रयों तक।
जब मेरी उपस्थिति से बड़ा हो गया हो
मेरे होने का अर्थ।
जब आना,
तो किसी वज्रपात की तरह मत आना।
आना
जैसे पका हुआ फल
शाख से अलग होता है।
आना
जैसे नदी
बिना किसी शोर के
सागर में
अपना नाम विसर्जित कर देती है।
आना
जैसे दीप
अपने होने को
प्रकाश में बदल
फिर स्वयं
निस्पंद हो जाता है।
वैसे ही
मेरे जाने के बाद
मेरे हिस्से की करुणा,
मेरे हिस्से की ऊष्मा,
मेरे हिस्से का विश्वास
उनके जीवन में बना रहे।
और जब कभी
मेरी अनुपस्थिति उन्हें छुए,
तो वह दुःख नहीं,
साहस में बदल जाए।
बस तब
ले चलना—
जब मन में
कुछ भी अवशेष न हो।
न कोई ऋण,
न कोई अनुताप,
न कोई मोह,
न कोई आकुल पुकार।
केवल यह संतोष हो
कि जीवन ने जो मेरे हाथों में सौंपा था,
उसे थोड़ा और सार्थक बनाकर
लौटा दिया। ■


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