उन महिलाओं के योगदान से जुड़ी बातें करें जिन्हें हम अक्सर भुलाए रखते हैं । हम जब भी समाज में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं तो उद्यमियों , शिक्षाविदों , साहित्यकारों, विभिन्न कलाकारों या सिनेमा से जुड़ी स्त्रियों की बात करते हैं । सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के विषय में तो हम सब, कुछ अधिक ही जानते हैं । उन्हें ही नहीं उनके परिवारों तक को पहचानते हैं । परंतु क्या हम अपनी महिला वैज्ञानिकों के विषय में जानते हैं ? उनमें से किसी एक का चेहरा पहचानते हैं ? हम भूल जाते हैं भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अद् भुत योगदान देने वाली अपनी महिला वैज्ञानिकों को ।
हमारे देश ही नहीं संसार भर में महिला वैज्ञानिक, पुरुषों के अनुपात में बहुत कम हैं । संसार भर में मात्र अट्ठाईस से तीस प्रतिशत ही वैज्ञानिक शोधों में महिला दिखाई देती हैं । भारत की स्थिति तो मात्र बारह - तेरह प्रतिशत के साथ और भी बदतर है । जब भी हम कक्षा दस या बारह के परीक्षा परिणाम देखते हैं, तो विज्ञान हो या कला, हर बार छात्राएँ, छात्रों से बाज़ी मार लेती हैं । फिर ऐसा क्या हो जाता है कि बड़ी कक्षाओं तक आते - आते विज्ञान तो विज्ञान, लड़कियाँ शिक्षा में ही पिछड़ जाती हैं । क्या उम्र के साथ उनकी बुद्धि कम हो जाती है ? हर्गिज़ नहीं । इस असामानता के कई कारण हो सकते हैं । सबसे पहला तो कह सकते हैं कि जब लैंगिक अनुपात ही हम ठीक - ठाक स्थिति में नहीं ला पाए हैं अभी तक, तो शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में समानता की बात करना बेमाने है । हम अपने समाज में, महिला वैज्ञानिकों को रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, यद्यपि हमारी अनेक महिला वैज्ञानिक इस योग्यता पर खरी उतरती हैं । पितृसत्तात्मक समाज भी महिलाओं के मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच को उभरने न देने का दोषी ज़रूर ही है । यदि किसी परिवार में दो में से एक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता होती है, तो वह निश्चित रूप से अपने पुत्र को ही शिक्षित करता है । पुत्री को विज्ञान की शिक्षा न देकर उसे प्राइवेट रूप से ही शिक्षा दिला देता है । कई बार स्त्री की क्षमता को भी सही तरीक़े से आँका नहीं जाता । यह समझ लिया जाता है कि यह तो लड़की है विज्ञान इसके बस का नहीं । महिला वैज्ञानिकों के साथ भी कम भेद भाव नहीं होता । 1930 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय वैज्ञानिक सी वी रमन को सब जानते हैं; परंतु उन्हीं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर चुकी वैज्ञानिक अन्ना मणि को मुट्ठी भर लोग भी शायद ही जानते हों। भेदभाव आज भी है। इस आधुनिक समय में भी समान कार्य के लिए महिलाओं को समान वेतन तक नहीं दिया जाता, पहचान की बात तो दूर है । वैज्ञानिक शोध अधिक समय और दायित्व की माँग करते हैं । कोई स्त्री वैज्ञानिक बनने की राह पर चल भी पड़ी हो, तो भी, जब उस पर पारिवारिक दायित्व का बोझ आता है, तो घर वाले उसका सहयोग नहीं करते और उसे अपना शोध त्यागना पड़ता है। कई बार देखा गया है कि पति की आय अगर ठीक - ठाक हो जाए, तो भारतीय परिवारों में स्त्री को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है या वह स्वेच्छा से ही नौकरी छोड़ देती है। हमारी पारिवारिक व्यवस्था आज भी काफ़ी कुछ ऐसी ही है । महिलाओं का रोज़गार में न होना देश के लिए बहुत हानिकारक है । यह भी एक जाना - माना सत्य है कि रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी से भारत की जी डी पी का बेहतर हो जाना तय है । सरकार द्वारा कई उपाय किए हैं, ताकि हमारे देश में महिला वैज्ञानिकों की संख्या में वृद्धि हो सके । जैसे उन संस्थाओं को अच्छी रैंकिंग देना, जिनमें महिला वैज्ञानिक अधिक हों । अगर किसी महिला वैज्ञानिक के पास कोई डिग्री है और वह कोई कार्य नहीं कर रही है, वह सत्ताईस से सत्तावन वर्ष की आयु तक किसी भी संस्था से जुड़कर क्षमतानुसार कार्य आरम्भ कर सकती है । सरकार की ओर से महिला वैज्ञानिकों की अधूरी रिसर्च को पूरी करने में सहयोग भी दिया जा रहा है । आर्थिक मदद और तत्संबंधी फ़ेलोशिप भी दी जा रही है। ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ की तर्ज़ पर हर बरस ‘महिला विज्ञान कांग्रेस’ का आयोजन भी किया जाता है । महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए ‘भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ’ की भी स्थापना की गई है । पूरे भारत में दस शाखाओं वाली इस संस्था का मुख्यालय, वाशी नवी मुंबी में है । महिला वैज्ञानिकों के लिए अनेक पॉर्टल्ज़ बनाए जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त अपने क्षेत्र में विशिष्ट रही ग्यारह महिला वैज्ञानिकों के नाम पर सरकार पीठों की स्थापना कर रही है; ताकि इन वैज्ञानिकों के नामों से युवा छात्राओं को प्रेरणा मिल सके और विज्ञान के क्षेत्र में वे अपने रोल मॉडल पा सकें । इन पीठों के लिए अलग - अलग क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं को चुना गया है, जिनमें कृषि, बायोटेक्नोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फाइटोमेडिसिन, बायोकैमिस्ट्री, चिकित्सा, सामाजिक विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान, मौसम विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, भौंतिकी, और फंडामेंटल रिसर्च। इनमें कुछ वैज्ञानिकों के नाम यहाँ लेने प्रासंगिक होंगे ।
1932 में जन्मी डॉ. अर्चना शर्मा एक जानी - मानी साइटोजेनेटिक्स या कोशिकानुवांशिकी की शोधकर्ता थीं । वे साइटोलॉजी के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल, ‘न्यूक्लियस’ की संस्थापक सदस्य थीं । उन्होंने क्रोमोज़ोम के अध्ययन की नई तकनीक का विकास किया था। वे पद्मभूषण से सम्मानित हुईं। जानकी अम्माल अग्रणी बॉटेनिस्ट थीं । गन्ने की नई मीठी प्रजाति और चीनी की मिठास के लिए उन्हें ही श्रेय जाता है। क्रास ब्रीडिंग के शोध के लिए उन्हें संसार भर में मान्यता मिली । जानकी अम्माल को पंडित नेहरू ने मिशिगन से वापस बुला लिया था; ताकि उनके शोध का लाभ भारतीय किसान उठा सकें । 1861 में जन्मी डॉ कादम्बिनी गांगुली चिकित्सक बनने वाली पहली दो महिलाओं में से एक थीं।1941 में जन्मी दर्शन रंगनाथन ऑर्गेनिक कैमिस्ट थीं। उन्हें प्राकृतिक बायोकैमिकल प्रक्रियाओं को करने के लिए जाना जाता है। 1917 में जन्मी डॉ. आसिमा चटर्जी ने ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री और फाइटोमेडिसिन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। मिर्गी के लिए दवाई और मलेरिया की रोकथाम के लिए उनकी बनाई हुई औषधियाँ आज भी काम आती हैं। डॉ इरावती कर्वे को रक्त सम्बन्धों की व्यवस्था पर अध्ययन के लिए क्रन्तिकारी माना जाता है। अन्ना मणि एक मौसम विज्ञानी थीं, उन्होंने सौर विकिरण, वायु ऊर्जा और ओज़ोन पर उल्लेखनीय कार्य किया । उन्हीं के मार्गदर्शन में वह कार्यक्रम बन पाया जिसके कारण भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो पाया। 1922 में जन्मी डॉ. राजेश्वरी चटर्जी पहली महिला इंजीनियर थीं । उन्हें माइक्रोवेव और ऐंटिना इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। उन्होंने महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। रमन परिमला की अलजेब्रा सम्बन्धी उपलब्धियों ने विशेषज्ञों तक को चकित कर दिया था। बिभा चौधुरी भौंतिक विज्ञानी थीं । वे पहली भारतीय महिला शोधकर्ता थीं जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी भाभा द्वारा टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के लिए चुना गया । उन्होंने 1940 के दशक में, एक सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। 1917 में जन्मी कमल रणदीव एक बायोकैमिकल रिसर्चर थीं । इन्हें कैंसर पर शोध के लिए जाना जाता है। वे ‘भारतीय महिला वैज्ञानिक संगठन’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं ।
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| मिसाइल महिला टेसी थौमस |
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| इंदिरा हिंदुजा |
nirdesh.nidhi@gmail.com




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