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Sep 5, 2026

आलेखः अ द् भु त योगदान देने वाली भारतीय महिला वैज्ञानिक

 - निर्देश निधि 

उन महिलाओं के योगदान से जुड़ी बातें करें जिन्हें हम अक्सर भुलाए रखते हैं ।  हम जब भी समाज में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं तो उद्यमियों , शिक्षाविदों , साहित्यकारों,  विभिन्न कलाकारों या सिनेमा से जुड़ी स्त्रियों की बात करते हैं । सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के विषय में तो हम सब, कुछ अधिक ही जानते हैं । उन्हें ही नहीं उनके परिवारों तक को पहचानते हैं । परंतु क्या हम अपनी महिला वैज्ञानिकों के विषय में जानते हैं ? उनमें से किसी एक का चेहरा पहचानते हैं ?  हम भूल जाते हैं भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अद् भुत योगदान देने वाली अपनी महिला वैज्ञानिकों को । 

हमारे देश ही नहीं संसार भर में महिला वैज्ञानिक, पुरुषों के अनुपात में बहुत कम हैं । संसार भर में मात्र अट्ठाईस से तीस प्रतिशत ही वैज्ञानिक शोधों में महिला दिखाई देती हैं । भारत की स्थिति तो मात्र बारह - तेरह प्रतिशत के साथ और भी बदतर है । जब भी हम कक्षा दस या बारह के परीक्षा परिणाम देखते हैं, तो विज्ञान हो या कला, हर बार छात्राएँ, छात्रों से बाज़ी मार लेती हैं । फिर ऐसा क्या हो जाता है कि बड़ी कक्षाओं तक आते - आते विज्ञान तो विज्ञान, लड़कियाँ शिक्षा में ही पिछड़ जाती हैं । क्या उम्र के साथ उनकी बुद्धि कम हो जाती है ? हर्गिज़ नहीं । इस असामानता के कई कारण हो सकते हैं । सबसे पहला तो कह सकते हैं कि जब लैंगिक अनुपात ही हम ठीक - ठाक स्थिति में नहीं ला पाए हैं अभी तक, तो शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में समानता की बात करना बेमाने है । हम अपने समाज में, महिला वैज्ञानिकों को रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, यद्यपि हमारी अनेक महिला वैज्ञानिक इस योग्यता पर खरी उतरती हैं । पितृसत्तात्मक समाज भी महिलाओं के मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच को उभरने न देने का दोषी ज़रूर ही है । यदि किसी परिवार में दो में से एक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता होती है, तो वह निश्चित रूप से अपने पुत्र को ही शिक्षित करता है । पुत्री को विज्ञान की शिक्षा न देकर उसे  प्राइवेट  रूप से ही शिक्षा दिला देता है । कई बार स्त्री की क्षमता को भी सही तरीक़े से आँका नहीं जाता । यह समझ लिया जाता है कि यह तो लड़की है विज्ञान इसके बस का नहीं । महिला वैज्ञानिकों के साथ भी कम भेद भाव नहीं होता । 1930 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय वैज्ञानिक सी वी रमन को सब जानते हैं; परंतु उन्हीं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर चुकी वैज्ञानिक अन्ना मणि को मुट्ठी भर लोग भी शायद ही जानते हों। भेदभाव आज भी है। इस आधुनिक समय में भी समान कार्य के लिए महिलाओं को समान वेतन तक नहीं दिया जाता, पहचान की बात तो दूर है । वैज्ञानिक शोध अधिक समय और दायित्व की माँग करते हैं । कोई स्त्री वैज्ञानिक बनने की राह पर चल भी पड़ी हो, तो भी, जब उस पर पारिवारिक दायित्व का बोझ आता है, तो घर वाले उसका सहयोग नहीं करते और उसे अपना शोध त्यागना पड़ता है। कई बार देखा गया है कि पति की आय अगर ठीक - ठाक हो जाए, तो भारतीय परिवारों में स्त्री को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है या वह स्वेच्छा से ही नौकरी छोड़ देती है। हमारी पारिवारिक व्यवस्था आज भी काफ़ी कुछ ऐसी ही है । महिलाओं का रोज़गार में न होना देश के लिए बहुत हानिकारक है । यह भी एक जाना - माना सत्य है कि रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी से भारत की जी डी पी का बेहतर हो जाना तय है । सरकार द्वारा कई उपाय किए हैं, ताकि हमारे देश में महिला वैज्ञानिकों की संख्या में वृद्धि हो सके । जैसे उन संस्थाओं को अच्छी रैंकिंग देना, जिनमें महिला वैज्ञानिक अधिक हों । अगर किसी महिला वैज्ञानिक के पास कोई डिग्री है और वह कोई कार्य नहीं कर रही है, वह सत्ताईस से सत्तावन वर्ष की आयु तक किसी भी संस्था से जुड़कर क्षमतानुसार कार्य आरम्भ कर सकती है । सरकार की ओर से महिला वैज्ञानिकों की अधूरी रिसर्च को पूरी करने में सहयोग भी दिया जा रहा है । आर्थिक मदद और तत्संबंधी फ़ेलोशिप भी दी जा रही है। ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ की तर्ज़ पर हर बरस ‘महिला विज्ञान कांग्रेस’ का आयोजन भी किया जाता है । महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए ‘भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ’ की भी स्थापना की गई है । पूरे भारत में दस शाखाओं वाली इस संस्था का मुख्यालय, वाशी नवी मुंबी में है । महिला वैज्ञानिकों के लिए अनेक पॉर्टल्ज़ बनाए जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त अपने क्षेत्र में विशिष्ट रही ग्यारह महिला वैज्ञानिकों के नाम पर  सरकार पीठों की स्थापना कर रही है;  ताकि इन वैज्ञानिकों के नामों से युवा छात्राओं को प्रेरणा मिल सके और विज्ञान के क्षेत्र में वे अपने रोल मॉडल पा सकें । इन पीठों के लिए अलग - अलग क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं को चुना गया है, जिनमें कृषि, बायोटेक्नोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फाइटोमेडिसिन, बायोकैमिस्ट्री, चिकित्सा, सामाजिक विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान, मौसम विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, भौंतिकी, और फंडामेंटल रिसर्च। इनमें कुछ वैज्ञानिकों के नाम यहाँ लेने प्रासंगिक होंगे । 


1932 में जन्मी डॉ. अर्चना शर्मा एक जानी - मानी साइटोजेनेटिक्स या कोशिकानुवांशिकी की शोधकर्ता थीं । वे साइटोलॉजी के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल, ‘न्यूक्लियस’ की संस्थापक सदस्य थीं । उन्होंने क्रोमोज़ोम के अध्ययन की नई तकनीक का विकास किया था। वे पद्मभूषण से सम्मानित हुईं। जानकी अम्माल अग्रणी बॉटेनिस्ट थीं । गन्ने की नई मीठी प्रजाति और चीनी की मिठास के लिए उन्हें ही श्रेय जाता है। क्रास ब्रीडिंग के शोध के लिए उन्हें संसार भर में मान्यता मिली । जानकी अम्माल को पंडित नेहरू ने मिशिगन से वापस बुला लिया था; ताकि उनके शोध का लाभ भारतीय किसान उठा सकें । 1861 में जन्मी डॉ कादम्बिनी गांगुली चिकित्सक बनने वाली पहली दो महिलाओं में से एक थीं।1941 में जन्मी दर्शन रंगनाथन ऑर्गेनिक कैमिस्ट थीं। उन्हें प्राकृतिक बायोकैमिकल प्रक्रियाओं को करने के लिए जाना जाता है। 1917 में जन्मी डॉ. आसिमा चटर्जी ने ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री और फाइटोमेडिसिन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। मिर्गी के लिए दवाई और मलेरिया की रोकथाम के लिए उनकी बनाई हुई औषधियाँ आज भी काम आती हैं। डॉ इरावती कर्वे को रक्त सम्बन्धों की व्यवस्था पर अध्ययन के लिए क्रन्तिकारी माना जाता है। अन्ना मणि  एक मौसम विज्ञानी थीं, उन्होंने सौर विकिरण, वायु ऊर्जा और ओज़ोन पर उल्लेखनीय कार्य किया । उन्हीं के  मार्गदर्शन में वह कार्यक्रम बन पाया जिसके कारण भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो पाया। 1922 में जन्मी डॉ. राजेश्वरी चटर्जी पहली महिला इंजीनियर थीं । उन्हें माइक्रोवेव और ऐंटिना इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। उन्होंने  महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। रमन परिमला की  अलजेब्रा सम्बन्धी उपलब्धियों ने विशेषज्ञों तक को चकित कर दिया था। बिभा चौधुरी भौंतिक विज्ञानी थीं । वे पहली भारतीय महिला शोधकर्ता थीं जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी भाभा द्वारा टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के लिए चुना गया । उन्होंने 1940 के दशक में, एक सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। 1917  में जन्मी कमल रणदीव एक बायोकैमिकल रिसर्चर थीं । इन्हें कैंसर पर शोध के लिए जाना जाता है। वे ‘भारतीय महिला  वैज्ञानिक संगठन’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं । 

मिसाइल महिला टेसी थौमस
इनके अतिरिक्त समकालीन युग में भी अनेक महिला वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भारतीय विज्ञान की दिशा और दशा दोनों को बदल कर रख दिया। इनमें राकेट वूमन जानी जाने वाली रितु करिघल, चन्द्रयान मिशन २ की निदेशक मुथैया वनिता, मंगल मिशन में मुख्य भूमिका निभाने वाली,जी सैट 10 और 12 की निदेशक रहने वाली अनुराधा टी के, मंगलयान की सफलता गढ़ने वाली मीनल सम्पत, मिसाइल महिला और अग्निपुत्री के नाम से विख्यात टेसी थॉमस। आज उनके सहयोग से बनी मिसाइल भारतीय सीमाओं की रक्षक हैं । इस तरह से उन्होंने भारतीय रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ किया । 2022 में गगनयान लॉंच करने जा रही लतांबिका ए आर, एडवांस लॉंचर टेक्नोलोजी की विशेषज्ञ हैं । किरण मजूमदार शॉ एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं जिन्होंने जैवप्रौद्यौगिकी में विशिष्ट योगदान किया, कैंसर और मधुमेह आदि पर इन्होंने कई शोध किए । इन्हें टाईम मैगज़ीन द्वारा दुनिया भर के सौ प्रभावशाली लोगों में गिना गया और फ़ॉर्चून पत्रिका में एशिया पैसिफ़िक की सबसे प्रभावशाली महिला माना गया । इनके साथ ही इंदिरा हिंदुजा को कौन भुला सकता है, जिन्होंने भारत में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी सम्भव करके ना जाने कितने संतानहीनों को संतान सौंपी । अदिति पंत एक समुद्र विज्ञानी रहीं। उनके शोध के कारण ही अंटार्कटिका पर दक्षिण गंगोत्री स्टेशन की स्थापना हो सकी। यही नहीं, कल्पना चावला, भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स आदि हमारी कई भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने नासा तक पहुँच बनाई है।  

इंदिरा हिंदुजा
यद्यपि सन 2016 से, हर वर्ष ग्यारह फ़रवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ और यूनेस्को द्वारा संयुक्त रूप से ‘महिलाओं और बालिकाओं के लिए विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है; परंतु यह दिवस अभी ‘महिला दिवस’ की तरह ख्याति प्राप्त नहीं है । 

पितृसत्तात्मक समाज की क्रूरता की सीमा कहाँ ठहरती है, कहना मुश्किल है । देश के वैज्ञानिक अनुसंधानों में जी - जान लगाने वाली जानकी अम्माल सहित इन महान महिला वैज्ञानिकों में से कई को सामाजिक उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ा । कादम्बिनी गांगुली को तो  बंगाल की एक पत्रिका ने ‘वेश्या’ तक कह दिया था । परंतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार करने के लिए कार्यरत उनके पति ने उनके इस घोर अपमान पर कोर्ट में केस दायर किया और सम्पादक महेश पाल को छह महीने की सजा दिलाई । महिलाओं के लिए बना दी गई  यह धारणा कि वे विज्ञान या गणित में पिछड़ी हुई होती हैं, जानबूझकर फैलाया हुआ एक भ्रम ही है  । मनुष्य का मस्तिष्क जिस कार्य का निरंतर अभ्यास करता है वह उसी में दक्ष हो जाता है । पिछली अनेक सदियों से स्त्री को अशिक्षित रख़कर घर का कार्य सौंप दिया गया, तो उसका मस्तिष्क उसी में पारंगत हुआ । पुरुष को शिक्षा, जिसमें गणित और विज्ञान से लेकर विभिन्न विषय थे, वे सौंपे गए तो वह उनमें पारंगत हुआ । परंतु समान अवसर पाया तो पौराणिक समय की आपाला, घोषा, लोपामुद्रा,गार्गी आदि से लेकर पिछली सदियों से समकालीन समय तक विज्ञान के क्षेत्र में वे अग्रणी रहीं । समान अवसर पाकर भारतीय महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं । आज के समय में वे हर क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता से अपने विरुद्ध  बनाई गई हर धारणा को ध्वस्त कर रही हैं । वे आज घरेलू कार्यों से लेकर व्यापार, राजनीति,शिक्षा, साहित्य , खेल, चिकित्सा, विज्ञान आदि से लेकर देश की रक्षा पंक्तियों तक में उपस्थित हैं । परंतु स्त्रियों के लिए मुश्किलें अभी और भी हैं । अभी तो देश में एक नारा निरंतर गूँज रहा है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभी तो हमें बेटी को बचाने की ही दुहाई देनी पड़ रही है, जिस दिन इससे छुटकारा मिलेगा, उस दिन दृश्य शीघ्रता से बदलना आरम्भ हो जाएगा । ■

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