February 10, 2015

लघु कथाएँः - अमर गोस्वामी

21वीं  सदी का सपना






मेरे किशोर होते हुए पुत्र ने एक सपना देखा। उसने देखा कि एक मोटर साइकिल पर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में घने जंगल, छोटी- बड़ी नदियां, छोटे- बड़े नगर, इन सबको पीछे छोड़ता हुआ वह एक भव्य महानगर में जा पहुंचा। महानगर के बीच में बने एक आलीशान नगर- द्वार के पास जब वह पहुंचा तो वहां उसे एक ब्रह्यचारी खड़े नजर आए। उन्होंने रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके गले में रुद्राक्ष की माला और पैरों में मत्स्याकार खड़ाऊ थी। रोशनी का फव्वारा उनके पूरे शरीर पर पड़ रहा था। ब्रह्यचारी ने हाथ के इशारे से रोका। पुत्र रुक गया।
ब्रह्यचारी ने कहा, 'वत्स, तुम न जाने कितने नद- नदी, वन- उपवन, नगर- उपनगर पार करते हुए यहां तक आए हो। तुम्हारी यात्रा पूरी हुई। तुम्हें अब कहीं जाने की जरूरत नहीं। यह महानगरी राजधानी ही सबकी मंजिल है।'
'मगर मुझे तो कहीं और जाना है।'
'यही सबकी मंजिल है, तुम्हारी भी।'
'जो आज्ञा!'
'तुमसे मैं प्रसन्न हूं। एक तोहफा देना चाहता हूं। जरा अपनी बाईं ओर देखो।' पुत्र ने बाईं ओर देखा। एक तरफ स्वर्णाभूषण और मुद्राओं का ढेर था तो दूसरी तरफ एक स्व- चलित स्टेनगन रखी थी। दोनों ही प्रकाश में चमक रहे थे। ब्रह्यचारी ने कहा, 'इन दोनों में से जो चाहो, तुम उठा लो।'
पुत्र ने एक नजर दोनों पर डाली। फिर लपककर स्टेनगन उठा ली। बोला, ब्रह्यचारीजी, यह स्टेनगन मेरे पास रहेगी तो मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी, ऐसे न जाने कितने स्वर्णाभूषण और धन की ढेरियां मेरे कदमों में होगी। बस, आशीर्वाद दीजिए, यह मोटर साइकिल और स्टेनगन सलामत रहे।'
'एवमस्तु!' ब्रह्यचारी ने कहा। अपने सपने की बात सुनकर बेटा हंसने लगा, पर उस दिन से मेरी आंखों की नींद गायब है।
स्त्री का दर्द
वे दोनों शहर से मजदूरी करके और कुछ जरूरत का सामान खरीद लौट रहे थे। स्त्री की गोद में बच्चा था। दोनों की उम्र यही 20-25 वर्ष की रही होगी। ऊबड़- खाबड़ और कंकड़ों- भरी सड़क पर चलते हुए अपने पति के बिवाई- भरे नंगे पैरों को देखकर स्त्री को असुविधा हो रही थी। वह बोली, 'ए, हो दीनू के बाबू! तुम अपनी पनही (जूता) जरूर खरीद लेना।'
'हां।' पुरुष ने कहा।
वे दोनों सोच रहे थे कि पनही खरीदना क्या आसान बात है? इतने दिनों से पैसा जोड़कर माह- भर पहले जो पनही उधार लेकर खरीदा था, उस पर किसी चोर की निगाह पड़ गई। उधार सिर पर था। अब उधार लेकर खरीदने की भी हैसियत नहीं थी।
फिर जहां रोज खाने को रूखा- सूखा जुटाना मुश्किल हो, वहां पनही बहुत ऊंची चीज थी, मगर औरत को अपने पांव में चप्पल और मर्द को नंगे पांव ऊबड़- खाबड़ पथरीले रास्ते पर चलते देखकर असुविधा होती थी। वह कई दिन इसी ऊहापोह में रही, कुछ पैसे चोरी से बचाने की कोशिश की, मगर वे बचे नहीं। उस दिन भी औरत ने कहा, 'न हो तो दीनू के बाबू, यह चप्पल पहन लो।।'
मर्द हंसा, 'जनाना चप्पल पहनें। इससे तो नंगे पैर अच्छे।'
ठीक ही कहा, 'नंगे पैर अच्छे!'
बगल से गंगा नदी बहती थी। चलते हुए औरत मन ही मन कुछ बुदबुदाई, 'हे गंगा मैया अगर जुटा सको तो दोनों को जुटाना नहीं तो इसे भी रख लो।'
औरत ने अपनी चप्पल छपाक से पानी में फेंक दी। अब औरत को मर्द के नंगे पांवों से असुविधा नहीं हो रही थी।

सम्पर्क : डी-139, सेक्टर - 55, जिला - गौतम बुद्ध नगर, नोएडा- 201301, (यूपी), मोबा. 09899010211

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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