February 10, 2015

लघुकथाएँः - दीपक मशाल

 फ़ेलोशिप

हॉस्टल से निकलते हुए आज फिर उसकी अमर उम्मीद उसके साथ थी कि इस बार तो जरूर फ़ेलोशिप आ गई होगी। पिछले तीन महीने से उसका अकाउंट लगभग खाली पड़ा थाजबकि अखबार में समाचार था कि एक महीने पहले यूजीसी ने फ़ेलोशिप सम्बन्धित विश्वविद्यालयों को भेज दी हैं। प्रयोगशाला जाने की बजाय वह पहले सीधे बड़े बाबू के ऑफिस पहुँचीप्रणाम बड़े बाबूइस बार तो पैसा आ गया होगा ना?दिल्ली से तो कब का रिलीज हो चुका है। -अरे कहाँ आया मैडम जीआया होता तो हम अकाउंट में पहुँचा न देते। अब आपको काहे जल्दी पड़ी हैअच्छे खासे घर से हैं आपको काहे की कमी। पर मुझे बहुत लोगों का बकाया लौटाना हैं। आप यूजीसी के ऑफिस फोन करके पता क्यों नहीं करते कि इतनी देर क्यों लग रही है?उसने हताश होते हुए सवाल किया करते तो हैंलेकिन कहाँ कोई फोन उठाता है जीपरसों हम खुद ही जा रहे हैं दिल्लीआप वहाँ के बाबू लोगों की मिठाई का कुछ प्रबन्ध कर दें तो काम थोड़ा जल्दी हो जाएगा और क्या है। आपके पापा तो पीडब्ल्यूडी में बड़े साहब हैं। सब समझती ही होंगी। बड़े बाबू ने बत्तीसी दिखाकर अपनी राय देते हुए कह। लड़की अपना आप खो बैठी- बड़े बाबू ये फ़ेलोशिप हमारी योग्यता की कमाई हैऔर हाँ मेरे पापा पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर जरूर हैंलेकिन  उन्होंने अपने मुँह कभी मिठाई का खून नहीं लगने दियावरना हम अब तक किराए के घर मे ना रह रहे होते। अब आप काम कराते हैं या मैं वी.सी. सर से मिलूँबड़े बाबू कालरात्रि के दर्शन कर चुपचाप यूजीसी का नंबर लगाने में लग गए।

 स्वाद
नहीं खाना मुझे ये खानारोज-रोज वही लौकी-तोरई बना देती हो
आज खा ले मेरे राजा बेटा कल तेरे मन का बना दूँगीअभी रात बहुत हो गई ना। आजा तुझे अपने हाथ से छोटे-छोटे कौर करके खिलाती हूँ।
नहीं नहीं नहींमुझे अभी चाहिएआलू के पराठे और बैंगन का भर्ता कहकर उसने छन्न से तश्तरीसब्जी भरी कटोरी और पानी के गिलास को स्टूल से नीचे फेंक दिया।
अरे मुन्ना फेंक तो मतजरा रुक जा अभी बनाए देती हूँ कहकर माँ आँख में आँसू लिये फैली हुई सब्जी और रोटी समेटने लगी अभी माँ गई भी न थी कि उसे एक तेज दहाड़ सुनाई दी।
बाबू ये क्या तरीका है?नहीं खाना तो ढंग से कहते नहीं बनता?
अब खुद समेटिएगा इसे सवेरे?बुढ़ापे में भी हर दिन पकवान चाहिए इनकी चटोरी जीभ को।
 डाँट सुनकर मुन्ना हड़बड़ाकर कोहनियों के सहारे बिस्तर पर अधलेटा सा बैठ गया। फटी-फटी आँखों से बेटे और बहू को देखे जा रहा थाझपकी टूट चुकी थी।

सम्पर्क: श्री राम बिहारी चौरसिया
मालवीय नगरबज़रियाकोंचजिला-जालौन उ.प्र.285205, मो.0033753742132, Email- mashal.com@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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