February 10, 2015

लघुकथाएँ

 भूकंप
बेटा सोलह वर्ष का हुआ तो वह उसे भी अपने साथ ले जाने लगा।
'कैसे हाथ- पाँव टेढ़े- मेढ़े कर चौक के कोने में बैठना है, आदमी देख कैसे ढीला-सा मुँह बनाना है। लोगों को बुद्धू बनाने के लिए तरस का पात्र बनकर कैसे अपनी ओर आकर्षित करना है। ऐसे बन जाओ कि सामने से गुजर रहे आदमी का दिल पिघल जाए और सिक्का उछलकर तुम्हारे कटोरे में आ गिरे।'
वह सीखता रहा और जैसा पिता कहता वैसा बनने की कोशिश भी करता रहा। फिर एक दिन पिता ने पुत्र से कहा, 'जा, अब तू खुद ही भीख माँगा कर।'
पुत्र शाम को घर लौटा। आते ही उसने अपनी जेब से रुपये निकाल कर पिता की ओर बढ़ाए, 'ले बापू, मेरी पहली कमाई।'
'हैं! कंजर पहले दिन ही सौ रुपये! इतने तो कभी मैं आज तक नहीं कमा कर ला सका, तुझे कहाँ से मिल गए?'
'बस ऐसे ही बापू, मैं तुझसे आगे निकल गया।'
'अरे कहीं किसी की जेब तो नहीं काट ली?'
'नहीं, बिलकुल नहीं।'
'अरे आजकल तो लोग बड़ी फटकार लगाकर भी आठ आने- रुपया बड़ी मुश्किल से देते हैं, तुझ पर किस देवता की मेहर हो गई?'
'बापू, अगर ढंग से माँगो तो लोग आप ही खुश हो कर पैसे दे देते हैं।'
'तू कौन से नए ढंग की बात करता है, कंजर! पहेलियाँ न बुझा।
पुलिस की मार खुद भी खाएगा और हमें भी मरवाएगा। बेटा, अगर भीख माँग कर गुजारा हो जाए तो चोरी-चकारी की क्या जरूरत है। पल भर की आँखों की शर्म है, हमारे पुरखे भी यही कुछ करते रहे हैं, हमें भी यही करना है। हमारी नसों में भिखारियों वाला खानदानी खून है हमारा तो यही रोजगार है, यही कारोबार है। ये खानदानी रिवायतें कभी बदली हैं? तू आदमी बन जा। '
'बापू, आदमी बन गया हूँ, तभी कह रहा हूँ। मैंने पुरानी रिवायतें तोड़ दी हैं। मैं आज राज मिस्त्री के साथ दिहाड़ी कर के आया हूँ। एक कालोनी में किसी का मकान बन रहा है। उन्होंने शाम को मुझे सौ रुपये दिए। सरदार कह रहा था, रोज आ जाया कर, सौ रुपये मिल जाया करेंगे।'
पिता हैरान हुआ कभी बेटे की ओर देखता, कभी रुपयों की ओर। यह लड़का कैसी बातें कर रहा है! आज उसकी खानदानी रियासत में भूकंप आ गया था, जिसने सब कुछ उलट- पलट दिया था।

बाहर का मोह

वह ससुरी कहाँ मानने वाली थी। उसके सिर पर तो बाहर का भूत सवार था। कैनेडा रहते पति ने फोन पर कहा, 'तू जिद न कर। घर पर माँ-बाउजी व बच्चों को सँभालने की जिम्मेदारी तेरी है। मैंने लौट ही आना है साल बाद। बाहर सैर- सपाटा नहीं है। यहाँ तो सिर खुजलाने तक का वक्त नहीं मिलता। यहाँ बेकार की कोई रोटी नहीं देता। हाँ, गर तू वहाँ नहीं रह सकती तो तुझे कोई न कोई कोर्स करना पड़ेगा। फिर ही तुझे यहाँ आने का फायदा है।'
वह शहर जाने लगी। सुबह तैयार हो, सज- संवर कर चल पड़ती। पीछे बूढ़े सास- ससुर, बहू की डाँट से डरते चूल्हा- चौका भी करते और उसके बच्चों को भी सँभालते।
'यार! यह संत सिंह की बहू रोज सज- संवर कर किधर जाती है? घर पर सास- ससुर को तो कुत्ते-बिल्ली समझती है।' एक दिन बहू को गली में जाते देख एक आदमी ने दूसरे से कहा।
'कहते हैं, शहर जाती है वहाँ कोई कोर्स-कूर्स करती है, कहते हैं फिर बाहर जाकर काम आसानी से मिल जाता है।'
'कोर्स! अब? दो बच्चों की माँ होकर कौनसा कोर्स करने चली है? घर तो ठीक- ठाक है, खाने-पीने को सब कुछ है, बाहर से घरवाला काफी पैसे भेज रहा है, सौ सुविधाएँ हैं।'
'सुना है कोई नैनी का कोर्स कर रही है।'
'नैनी! यह क्या बला हुई?'
'अरे तुझे नहीं पता! उधर कैनेडा में सभी लोग अपने काम पर चले जाते हैं। पीछे उनके बूढ़े और बच्चों के नाक- मुँह पोंछा करेगी, सेवा सँभाल करेगी और क्या।'
'अच्छा यह कोर्स इसलिए होता है दुर फिटे- मुँह हमारे लोगों के। यहाँ से जाकर गोरों के बच्चे-बूढ़े सँभालते हैं। इससे तो अच्छा है कि अपने बच्चों और सास- ससुर को सँभाल ले ससुरी कैनेडा की।'
सम्पर्क: गुरबख्श सिंह मैमोरियल अस्पताल, नडाला,
जिला- कपूरथला (पंजाब) 144 624,  मो. 9815186532
Email-  karamjitnadala@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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