February 10, 2015

लघुकथाएँ - सुभाष नीरव

बीमार
चलो, पढ़ो।
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढऩे लगी- अ से अनाल... आ से आम... एकाएक उसने तुतलाते हुए पूछा- पापा, ये अनाल क्या होता है ?
यह एक फल होता है, बेटे। मैंने उसे समझाते हुए कहा, इसमें लाल- लाल दाने होते हैं, मीठे- मीठे!
पापा, हम भी अनाल खायेंगे... बच्ची पढऩा छोड़कर जिद-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फार एप्पिल... एप्पिल माने...
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डाक्टर ने सलाह दी थी- पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
लेकिन मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच- विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था- पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़े जा रही थी, ए फार एप्पिल... एप्पिल माने सेब...
पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ? जैसे मम्मी ?...
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, उसके चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नजरों से देखते हुए पूछा- मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा?

                               सहयात्री
बस रुकी तो एक बूढ़ी बस में चढ़ी। सीट खाली न पाकर वह आगे ही खड़ी हो गयी। बस झटके के साथ चली तो वह लडख़ड़ा कर गिर पड़ी। सीटों पर बैठे लोगों ने उसे गिरते हुए देखा। जब तक कोई उठकर उसे उठाता, वह उठी और पास की एक सीट को कस कर पकड़कर खड़ी हो गई।
जिस सीट के पास वह खड़ी थी, उस पर बैठे पुरुष ने उसे बस में चढ़ते, अपने पास खड़ा होते और गिरते देखा था। लेकिन अन्य बैठी सवारियों की भाँति वह भी चुप्पी साधे बैठा रहा।
अब बूढ़ी मन ही मन बड़बड़ा रही थी- कैसा जमाना आ गया है! बूढ़े लोगों पर भी लोग तरस नहीं खाते। इसे देखो, कैसे पसरकर बैठा है। शर्म नहीं आती, एक बूढ़ी- लाचार औरत पास में खड़ी है, लेकिन मजाल है कि कह दे, आओ माताजी, यहाँ बैठ जाओ...।
तभी, उसके मन ने कहा, क्यों कुढ़ रही है?... क्या मालूम यह बीमार हो, अपाहिज हो? इसका सीट पर बैठना जरूरी हो। इतना सोचते ही वह अपनी तकलीफ भूल गयी। लेकिन मन था कि वह कुछ देर बाद फिर कुढऩे लगी, क्या बस में बैठी सभी सवारियाँ बीमार-अपाहिज हैं ?... दया- तरस नाम की तो कोई चीज रही ही नहीं।
इधर जब से वह बूढ़ी बस में चढ़ी थी, पास में बैठे पुरुष के अन्दर भी घमासान मचा हुआ था। बूढ़ी पर उसे दया आ रही थी। वह उसे सीट देने की सोच रहा था, पर मन था कि वहाँ से दूसरी ही आवाज निकलती, क्यों उठ जाऊँ ? सीट पाने के लिए तो वह एक स्टाप पीछे से बस में चढ़ा है। सफर भी कोई छोटा नहीं है। पूरा सफर खड़े होकर यात्रा करना कितना कष्टप्रद है। और फिर, दूसरे भी तो देख रहे हैं, वे क्यों नहीं इस बूढ़ी को सीट दे देते?
इधर, बूढ़ी की कुढऩ जारी थी और उधर पुरुष के भीतर का द्वंद। उसके लिए सीट पर बैठना कठिन हो रहा था। क्या पता बेचारी बीमार हो?.. शरीर में तो जान ही दिखाई नहीं देती। हड्डियों का पिंजर। न जाने कहाँ तक जाना है बेचारी को! तो क्या हुआ?.. न, न! तुझे सीट से उठने की कोई जरूरत नहीं।
माताजी, आप बैठो। आखिर वह उठ ही खड़ा हुआ। बूढ़ी ने पहले कुछ सोचा, फिर सीट पर सिकुड़ कर बैठते हुए बोली- तू भी आ जा पुत्तर, बैठ जा मेरे संग। थक जाएगा खड़े- खड़े।

सम्पर्क- 372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर, नई दिल्ली-110023, मो. 9810534373, 
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1 Comment:

SUMIT PRATAP SINGH said...

सार्थक लघु कथाएँ।

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