February 10, 2015

लघु कथाएँः रवि श्रीवास्तव

1.  भूख

बाबा पोटली में एक मोटी रोटी लेकर रोज खेत की ओर निकल पड़ते। यह उनकी सुबह की शुरुआत होती। इस सिलसिले में परिवर्तन आया। वे एक की बजाय दो रोटी लेकर जाने लगे। बहुओं ने सोचा- बाबा की भूख बढ़ गई है। काम भी ज्यादा करने लगे होंगे। कुछ दिनों के बाद बाबा तीन रोटियां लेकर खेत की ओर निकलते। बहुओं में कानाफूसी हुई-'बाबा की भूख बढ़ते जा रही है। कोई ऐसी वैसी बात तो नहीं।' बहुओं की बातें बेटों तक पहुंची।
बेटों ने सोचा- 'इस उम्र में बाबा इतना काम क्यों करते हैं? तीन- तीन मोटी रोटियां पचा लेते हैं। इन्हें तो आराम से रहना चाहिए। घर में साधन है, सम्पन्नता है।' छोटे बेटे की जिज्ञासा बढ़ी। एक दिन वह अपने बाबा के पीछे हो लिया।
बाबा पोटली लेकर घर से निकले। स्कूल के पास गुजरते हुए पेड़ के नीचे रुके। उन्हें रुका देखकर चार लड़के दौड़ कर आए। बाबा ने अपनी पोटली से दो रोटियां निकाली। उसके चार टुकड़े किए। चारों को बांट दिए। बच्चे रोटियां लेकर स्कूल की ओर दौड़े। यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।
बस्ती के  बाहर एक छोटी सी बस्ती है। चारों के मां बाप खदान में गिट्टी तोड़ते हैं। अल सुबह घर छोड़ देते हैं। बच्चों को बाबा की रोटी का ही सहारा रहता है।
छोटे बेटे ने महसूस किया- 'बाबा की भूख पहले से बढ़ गई है। इसके पीछे श्रम नहीं संस्कार हैं।'

2 . मिट्टी तेल और मेरिट

खेल मैदान में वह फूट- फूट कर रो रहा था। एक लड़के ने आकर मुझे सूचना दी। थोड़ी देर पहले रिजल्ट सुनाया गया था। रोने वाला कबीर था। आठवीं की बोर्ड परीक्षा में वह मेरिट में आया था। जिले में उसका नम्बर पांचवा था। वहीं दिनेश आठवें क्रमांक पर था। स्कूल से दो छात्र मेरिट में थे। मैंने पास जाकर रोने का कारण जानना चाहा। मुझे आते देखकर उसने चुप होने की कोशिश की। फिर भी वह जोर - जोर से सुबक रहा था। मैंने उसे जैसे- तैसे शांत किया और रोने का कारण पूछा।
सुबकते- सुबकते उसने कहा- रिजल्ट देते समय बार- बार यही बताया गया कि मैं गरीब हूं। मेरे पिताजी हॉकर हैं। मिट्टी तेल बेचते हैं। मिट्टी तेल बेचकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। मेरी पढ़ाई और मेरिट में आने की तारीफ कम की गई। दिनेश का नम्बर मेरिट में आठवां है। उसके पिताजी की कोई बात नहीं की गई। प्रशंसा भी मुझसे ज्यादा हुई। सर क्या गरीब होना अपराध है। मिट्टी तेल बेचना जुर्म है। वह एक ही सांस में यह सब कह गया। यह कहते हुए उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर आक्रोश था। मैं क्षणभर निरुत्तर रहा। फिर हमेशा की तरह उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा- समाज रोने से नहीं आक्रोश से सुधरता है, कबीर।
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