February 10, 2015

लघुकथाएँ

अप्रत्याशित
सिर दुखने का बहाना कर वह लेट गई ताकि अपने बारे में मम्मी- पापा का वार्तालाप सुन सके, उसकी सहेली शादी का कार्ड देने सुबह स्वयं आई थी और उसे पूरी संभावना थी कि मम्मी आज पापा से जरूर कहेंगी- 'सुनते हो... गली वाले शर्मा की बेटी, गैर जात में ब्याह रचा रही है। राम राम! कितना खराब जमाना आ गया है? छोरी ने मां-बाप की इज्जत ही मिट्टी में मिला दी। ...और भेजो कॉलेज पढऩे? और इतराओ... सिर चढ़ाओ लड़कियों को। उसकी जगह... मेरी तनु होती... तो चीर के रख देती...'
और तब शायद पापा, बीच में सगर्व घोषणा करेंगे, 'खबरदार, जो ऐसे कामों में मेरी तनु को घसीटा। उसकी होड़ करेगा कोई? उसे तो बाहर आना-जाना तक पसंद नहीं। ....बस, उसकी किताबें और उसका कमरा भला। मजाल...कभी किसी छोकरे की ओर नजर भी उठा के देखा हो? ...अरे...उसने.....तो....'
उसकी कल्पना को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। उसने सुना, पापा कह रहे थे, 'तनु की सहेली बड़ी लकी निकली। बिना दान-दहेज, खोज-बीन के, सर्विस लगा इतना अच्छा लड़का घर बैठे ही हाथ लग गया शर्मा को....'
और एक लंबी नि:श्वास छोड़ मम्मी ने उत्तर दिया, 'सबकी तकदीर एक- सी थोड़े ही होती है। हमें भी देखो, वर्षों से परेशान हैं, हजारों रुपए झोंक दिया फिर भी कहीं कोई जोग ही नहीं। तनु का भाग्य, वह कहीं आती-जाती भी तो नहीं है।'
तनु से आगे सुना न गया, लगा, एक तीखी-कटार उसके हृदय को चीरती जा रही है और वह अभी चीख पड़ेगी। बिना मतलब बस यूं ही।
विकल्प
आखिरी निश्चय कर वह तालाब के किनारे बैठ गया। परिवार में महीनों से कड़की चल रही थी। एम.कॉम. होने पर भी उसे छोटी-मोटी किसी तरह की कोई नौकरी नहीं मिल पाई। न किसी 'बड़े' से जान-पहचान, न चांदी की खनखनाहट। खाली डिग्री के भरोसे पूरे दो वर्ष निकल गए... अगले ही माह... ओवर एज भी हो जाएगा। तब?
वह इंतजार करने लगा... कब ये धोबी कपड़े समेटें... और वह छलांग लगाकर हमेशा- हमेशा के लिए...।
लेकिन तभी उसे एक विकल्प सूझा- क्यों न किसी से गोदनामे की रस्म अदा करवा के शिड्यूल्ड कास्ट में नाम लिखवा ले... कई जगह सीटें खाली हैं। ...और पिघलते इरादे सहित वह खड़ा होकर टहलने लगा।

सम्पर्क- निदेशिका, मित्तल हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर, पुष्कर रोड अजमेर- राजस्थान, मो. 09351590002,  ई-मेल: sainidhiraj@rediffmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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