- प्रगति गुप्ता
बचपन जो बसे बस्ते में
कुछ कॉपी, किताबें
कुछ पेन, पेंसिल, रबर
हमने संजोए ,
करीने से एक बक्से में...
झलके सोच-विचारों में
गलतियाँ कर करके भी
फिर गलती की जाए
कुछ ऐसी फ़ितरत होती
बचपन में...
आते-जाते, पढ़ते-सीखते
नक़ल उतारना टीचरों की,
सज़ा मिलते ही
झट मासूम बन आँसू बहाना
होती फ़ितरत बचपन की...
बेवज़ह ख़ूब जोर-जोर से
हँसना-खिलखिलाना चुपके से
अनगिनत आवाजें निकाल
डरा साथियों को
अपना लोहा मनवाना
कितना ख़ूबसूरत था,
सोचे तो बचपन से जुड़ा
अपना ही एक ज़माना था...
बसता था जिसमें बचपन कहीं
खो गई मासूमियत भी हमारी
चुपके से सरक
छोड़ हमारी उंगलियों की
पोरों को कहीं...
अब रीता है आँगन भी
उस बचपन से जुड़ा
जहाँ टहलता था अल्हड़पन
स्वच्छंद ही बहुत अपना-सा...



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