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Jan 1, 2026

कविताः बचपन


 -  प्रगति गुप्ता

बचपन जो बसे बस्ते में

कुछ कॉपी, किताबें

कुछ पेन, पेंसिल, रबर

हमने संजोए ,

करीने से एक बक्से में...


कुछ अल्हड़-सी मासूमियतें

झलके सोच-विचारों में

गलतियाँ कर करके भी

फिर गलती की जाए

कुछ ऐसी फ़ितरत होती

बचपन में...


आते-जाते, पढ़ते-सीखते

नक़ल उतारना टीचरों की,

सज़ा मिलते ही

झट मासूम बन आँसू बहाना

होती फ़ितरत बचपन की...


बेवज़ह ख़ूब जोर-जोर से

हँसना-खिलखिलाना चुपके से

अनगिनत आवाजें निकाल

डरा साथियों को

अपना लोहा मनवाना

कितना ख़ूबसूरत था,

सोचे तो बचपन से जुड़ा

अपना ही एक ज़माना था...


छूटा बस्ता-बक्सा

बसता था जिसमें बचपन कहीं

खो गई मासूमियत भी हमारी

चुपके से सरक

छोड़ हमारी उंगलियों की

पोरों को कहीं...


अब रीता है आँगन भी

उस बचपन से जुड़ा

जहाँ टहलता था अल्हड़पन

स्वच्छंद ही बहुत अपना-सा...


8 comments:

  1. Anonymous04 January

    बहुत बहुत आभार प्रकाशन हेतु😇🙏

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  2. बचपन की यादें ताजा हो गयीं।हार्दिक बधाई।

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  3. Anonymous30 January

    यथार्थ कविता

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  4. Anonymous30 January

    बचपन के यथार्थ का सुन्दर चित्रण करती कविता। बहुत-बहुत बधाई आपको। सुदर्शन रत्नाकर

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  5. Anonymous02 February

    बढ़िया

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  6. सच में, बचपन अपनी मासूमियत के साथ बहुत याद आता है। मेरी बधाई

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  7. डॉ सुनीता वर्मा02 February

    बचपन की मासूमियत को फिर से कविता के माध्यम से याद दिलाकर आपने मन को सुखद अनुभूति से भर दिया ।

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