February 10, 2015

लघु कथाएँ - सुकेश साहनी

ज़िदगी

पेट में जैसे कोई आरी चला रहा हैं... दर्द से बिलबिला रहा हूँ....। पत्नी के ठंडेकाँपते हाथ सिर को सहला रहे हैं। उसकी आँखों से टपकते आँसुओं की गरमाहट अपने गालों पर महसूस करता हूँ। उसने दो दिन का निर्जल उपवास रखा है। माँग रही है कैंसर ग्रस्त पति का जीवन ईश्वर से। ...ईश्वर? ....आँखों पर जोर डालकर देखता हूँधुँध के उस पार वह कहीं दिखाई नहीं देता...।
घर में जागरण है। फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजनों का धूम-धड़ाका है। हाल पूछने वालों ने बेहाल कर रखा है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई न कोई आकर तसल्ली दे रहा है, ''सब ठीक हो जाएगाईश्वर का नाम लो।....ईश्वर?....फिल्मी धुनों पर आँखों के आगे थिरकते हीरो-हीराइनों के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता....
नीम बेहोशी के पार से घंटियों की हल्की आवाज सुनाई देती है। ऊपरी बलाओं से मुझे मुक्ति दिलाने के कोई सिद्ध पुरूष आया हुआ है...। नशे की झील में डूबते हुए पत्नी की प्रार्थना को जैसे पूरे शरीर से सुन रहा हूँ, ''इनकी रक्षा करोईश्वर!’....ईश्वर?....मंत्रोच्चारण एवं झाड़-फूँक से उठते हुए धुँए के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता...
श्मशान से मेरी अस्थियाँ चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों के आँसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसेवह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजा पाठ (ईश्वर) के लिए अब उस समय नहीं मिलता। ....ईश्वर?...वह उसकी आँखों से झाँक रहा है!


बेटी का  ख़त
बेटी का खत पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उडऩे लगीं।
'खैरियत तो है न?’ पत्नी ने पूछा, 'क्या लिखा है?’
'सब कुशल-मंगल है,’ आवाज में कंपन था।
'फिर पढ़ते ही घबरा क्यों गए?’  पत्नी बोलीफिर उसके हाथ से चिट्ठी लेकर खुद पढऩे लगी।
खत खैरियत वाला ही था। बेटी ने माँ-बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राजी-खुशी लिखी थीअंत में लिखा था-राजू भइया की बहुत याद आती है। पत्र पढ़ने के बाद पत्नी निश्चिंत होकर रसोई में चली गई।
            जब लौटी तो देखा पति अभी भी उस खत को एकटक घूरे जा रहा हैचेहरा ऐसा मानो किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो।
पत्नी को देखते ही उसने सकपकाकर खत एक ओर रख दिया। सहज होने का असफल प्रयास करते हुए बोला, 'सोचता हूँकल रजनी बेटी के पास हो ही आऊँ।
पत्नी ने उसके पीले उदास चेहरे की ओर ध्यान से देखाफिर रुँधे गले से बोली, 'आखिर हुआ क्या हैअभी कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थेफिर अचानक ऐसा क्या जो... तुम्हें मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ!
इस बार वह पत्नी से आँख नहीं चुरा सकाभर्राई आवाज में बोला, 'पिछली दफा रजनी ने मुझे बताया था कि ससुराल वाले उसकी लिखी कोई चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देतेतब मैंने उससे कहा था कि भविष्य में अगर वे लोग उसे तंग करें और वह हमें बुलाना चाहे तो खत में लिख दे- राजू भइया की बहुत याद आती है। इस बार उसने खत में यही तो लिखा है’- कहते हुए बूढ़े बाप की आँखें छलछला आर्इं।

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