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Dec 3, 2025

अनकहीः AI के नए दौर में आज के युवा...

-डॉ. रत्ना वर्मा

आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ तकनीक, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारे काम-काज, शिक्षा, रोजगार और सोच को तेज़ी से बदल रही है। दुनिया ही नहीं, भारत भी इस परिवर्तन के केंद्र में है। इन दिनों इसे लेकर एक बड़ी चिंता देश के सामने उपस्थित है- युवा बेरोज़गारी की।

 निजी क्षेत्रों में, विशेषकर आईटी कंपनियों में पिछले महीनों में बड़ी संख्या में युवाओं की नौकरियाँ प्रभावित हुई हैं। यह स्थिति चिंतनीय भी है और सच्चाई भी। तकनीक के तेज़ बदलाव ने कई ऐसे काम कम कर दिए, जिन्हें मशीनें तेज़ और कम कीमत में कर सकती हैं। जब बड़ी कंपनियाँ मशीनों को इंसानों की जगह लगाने लगती हैं, तो यह एक सामाजिक संकट का भी आरंभ होता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है- जो युवा अभी प्रभावित हो रहे हैं, उनका क्या होगा?

आधुनिकता और तकनीक का समर्थन करने वालों का तर्क यह होता है  कि यह सब विकास का संकेत है, आगे इससे नई नौकरियाँ आएँगी; लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज जिन युवाओं की नौकरी छीनी जा रही है, वे इस तरह के तर्क को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।  कोई उनकी वेदना नहीं समझता, आज नौकरी से जो  बाहर हो रहे हैं-  जिनके परिवार उनकी आय पर निर्भर हैं, जिन्होंने घर के लिए, शिक्षा के लिए ऋण लेकर रखा है, जिनपर और न जाने कितनी जिम्मेदारियाँ हैं,  उनको अचानक जब नौकरी के लायक नहीं हो कहकर बाहर कर दिया जाएगा, तब सोचिए- उनपर क्या बीतेगी। यह उनके लिए हताशा, अविश्वास और आर्थिक असुरक्षा का दौर होगा, जो समाज में अपराध और नशे जैसी अनेक प्रकार की विसंगतियों को जन्म देगा।  यह स्थिति आने वाली पीढ़ी के आत्मविश्वास को भी कमजोर करेगी। निजी क्षेत्र को यह समझना होगा कि  मनुष्य की मेहनत देश की आर्थिक उन्नति में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। तकनीक की यह रफ्तार समाज की तैयारी से कहीं अधिक तेज चाल से चल रही है, जो चिंतनीय है।

 सवाल यह भी उठता है कि जब इस नई तकनीक से रोजगार की संभावनाएँ और बढ़ेंगी, तो फिर जो पहले से ही आपके पास नौकरी कर रहे हैं, उन्हें निकालने के बजाय आप उन्हें इस नई तकनीक में प्रशिक्षित क्यों नहीं करते? आखिर क्यों किसी कर्मचारी का 8–10 वर्ष का अनुभव तकनीक की एक नई लहर के सामने इतना बेकार हो जाता है? आपने उन्हें अपनी कंपनी में उनकी काबिलीयत को देख- परखकर ही नौकरी पर रखा था ना? फिर अचानक वे नाकाबिल कैसे हो जाते हैं?

मुझे याद है, जब कम्प्यूटर का आगमन  हुआ था, तब हम समाचार- पत्र में काम करने वाले लोग कलम और कागज पर ही काम करने के आदी थे;  परंतु हमें इस नई तकनीक को सीखने का समय दिया गया; बल्कि कहना चाहिए काम करते हुए ही हमें उसकी ट्रेनिंग दी गई और हमने इस नई तकनीक को सीखा। आज देखिए पूरी दक्षता से समाचार- जगत् में नई तकनीक से काम हो रहा है। शुरू में दिक्कतें आईं थीं; पर बाद में सबने स्वीकारा और सीखा। य बात अलग है कि जो लोग इस नई तकनीक को अपना नहीं पाए, वे सब पिछड़ गए। आप यह भी देख ही रहे हैं कि कम्प्यूटर ने किस तरह शिक्षा से लेकर नौकरी, व्यवसाय सब में अपनी जगह बना ली है।  यह तो तय है कि नई तकनीक को सीखना ही होगा; पर बिना सिखाए ही किसी को नौकरी से निकाल देना, उनको बेरोजगार कर देना, तो सही नहीं कहा जा सकता है।

आज सामने आए इस गंभीर रोजगार के संकट को देखते हुए ही संभवतः सरकार ने 2026–27 से कक्षा 3 से ही AI का पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा की है; ताकि आने वाली पीढ़ी शुरू से ही समय की ज़रूरतों के अनुरूप तैयार हो सके। यह भविष्य की दृष्टि से अच्छा कदम हो सकता है। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि अब AI कोई अलग तकनीक नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का ही हिस्सा बनने जा रही है।

यह तो सर्वविदित है कि इस नई तकनीक को आने से रोका नहीं जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे कंप्यूटर के आगमन पर हुआ था; परंतु AI के सपने दिखाने वालों को यह समझना होगा कि समाज केवल तकनीक से नहीं चलता, भावनाओं, सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता से भी चलता है।

जब लोग देख रहे हैं  कि मशीनें उनकी जगह ले रही हैं, कंपनियाँ उन्हें आऊटडेटेड घोषित कर रही हैं और सरकार हर समस्या का समाधान नई तकनीक में ढूँढ रही है, तो असुरक्षा तो बढ़ेगी ही। विकास का रास्ता तकनीक हो सकता है; पर देश के लोग पहले आते हैं। इसलिए ध्यान रखना होगा कि  मशीनें सुविधा तो दें; लेकिन इंसानों का महत्त्व कम न हो। तकनीक विकास की गति तय करे; लेकिन समाज उसकी दिशा तय करे।

एक आधुनिक राष्ट्र अपनी दिशा केवल मशीनों के आधार पर तय नहीं करता। राष्ट्र उस रास्ते को चुनता है, जिसमें मानव सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक तरक्की साथ- साथ चलें।  यदि परिवर्तन को संवेदनशीलता से नहीं सँभाला गया तो, इसका असर सिर्फ रोजगार पर नहीं, पूरी सामाजिक व्यवस्था पर पड़ेगा।  तकनीक को अपनाना समय की ज़रूरत है, पर समाज को अनदेखा करके तरक्की करना कतई उचित नहीं है।





10 comments:

  1. Anonymous04 December

    एक बार फिर से आपने एक गम्भीर मुद्दे पर लेखनी चलाई है। यह सच है समाज केवल तकनीक से नहीं चलता। भावनाओं, सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता से चलता है। AI से बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।जो मनुष्य को दीमक की भांति अन्दर ही अन्दर खोखला कर देगी। माननव की सोच पर भी प्रभाव पड़ेगा। बिना पर परिश्रम, बिना सोच के उसकी बुद्धि कुंद हो जाएगी। स्वस्थ, स्थिर समाज के लिए आर्थिक उन्नति और सुरक्षित जीवन आवश्यक है।इस तकनीक के बारे में जो भी कदम उठाजाए, वह मानव हित के लिए हो, अहित के लिए नहीं। जागरूक करता सम्पादकीय। हार्दिक बधाई रत्ना जी। सुदर्शन रत्नाकर

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    1. डॉ. रत्ना वर्मा05 December

      हार्दिक आभार आपका सुदर्शन जी।आपने अपने सार्थक विचार व्यक्त किए हैं।अवश्य इसका प्रभाव पड़ेगा और सब इस बात को गंभीरता से लेंगे।सादर धन्यवाद 🙏

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  2. सुंदर अंक

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  3. Anonymous06 December


    सुश्री रत्ना जी,
    कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आप का विश्लेषणात्मक लेख बेहतरीन लगा। सचमुच नई तकनीक से विकास की नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। हर आने वाली तकनीक आर्थिक समृद्धि के लक्ष्य को लिए होती है और उसका प्रभाव समाज के निचले तबके पर सब से अधिक पड़ता है। बहरहाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे लिए कैसी साबित होगी यह तो समय यह करेगा। एक बार फिर सुन्दर लेखन के लिए आप को साधुवाद

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  4. राष्ट्र और समाज को सजग और जागरूक रहने हेतु प्रेरित करता हुआ एक बेहतरीन लेख....🙏👏👏

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  5. Anonymous09 December

    सार्थक लेख !
    -छवि निगम

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  6. Anonymous09 December

    श्रद्धेय रत्ना जी,
    नमस्कार
    एआई के मानवीय जुड़ाव को बढ़ावा देना चाहिए, न कि उसकी जगह लेना चाहिए !
    मानवीय जुड़ाव और प्रेम मूलभूत हैं !
    एआई इसके कुछ हिस्सों की नकल कर सकता है, लेकिन यह हमेशा खालीपन महसूस कराता है !
    प्रतिरूपण और कैटफ़िशिंग जैसे मुद्दे अभी भी आम हैं और एआई में पहचान उपकरणों और सत्यापन में निरंतर निवेश की मांग करते हैं !
    एआई के लिए युवा मस्तिष्कों के निर्माण हेतु एक कई राष्ट्रीय पहल शुरू हो चुकी हैं !
    माता-पिता और बच्चों को प्रेरित भविष्य के लिए तैयार करने हेतु अन्यत्र तैयारी शुरू हो चुकी हैं !
    भावात्मक लगाव छोड़कर सकारात्मक पहलू भी अहम है
    सादर !
    डॉ दीपेंद्र कमथान
    बरेली !

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  7. Anonymous09 December

    Its true / at th same time we cannot deniye it.

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  8. Anonymous09 December

    यह स्थिति निस्संदेह चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि हर बड़े तकनीकी बदलाव ने इतिहास में नए कौशल, नई नौकरियाँ और नई संभावनाएँ भी जन्म दी हैं। आज यदि AI कुछ भूमिकाएँ बदल रहा है, तो वही AI युवाओं के लिए नए उद्योग, नए स्टार्टअप मॉडल और नई सीखने की दिशाएँ खोल भी रहा है। यह दौर कठिन जरूर है, पर यह युवाओं को भविष्य की मांग के अनुरूप और अधिक सक्षम, कौशलयुक्त और प्रतिस्पर्धी बनने का अवसर भी दे रहा है। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को हटाना नहीं—मनुष्य को अधिक सशक्त बनाना है, और भारत के युवा इस बदलाव को नेतृत्व देने की क्षमता रखते हैं।

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  9. समसमायिक एवं गंभीर विषय पर शानदार लेख
    हार्दिक बधाई 🌹🌹

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