February 10, 2015

लघुकथा -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 संचेतना एवं अभिव्यक्ति
रचना जीवन की अभिव्यक्ति है। जीवन का प्रवाह ही रचना का प्रवाह है और यही उसका मानदण्ड भी। किसी भी विधा का मूल्यांकन बाहर से थोपे गए मानदण्डों से नहीं हो सकता। विकासशील विधा को कुछ निश्चित तत्त्वों की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता; क्योंकि उसकी संभावनाएँ और क्षमताएँ चुकी नहीं हैं। कविता, कहानी, उपन्यास  आदि के साथ यही बात है। लघुकथा भी इससे परे नहीं है। यह सामयिक प्रश्नों का उत्तर देने के साथ-साथ जीवन के शाश्वत मूल्यों से भी जुड़ी है। लघुकथा अपनी संक्षिप्तता, सूक्ष्मता एवं सांकेतिकता में जीवन की व्याख्या को नहीं वरन् व्यंजना को समेट कर चली है। कोई विषय लघुकथा के लिए वर्जित नहीं है; लेकिन विषय- चयन से अभिव्यक्ति तक की यात्रा चुनौतीपूर्ण है। इस चुनौती को लघुकथाकारों ने सहर्ष स्वीकार किया है।
युगबोध से साक्षात्कार, अनुभवों की उर्वरता , अनुभूति की सघनता एवं संवेदना का संश्लिष्ट प्रभाव लघुकथा की संचेतना का आधार बन सकते है। मानव बाह्य जगत् से जितना जुड़ा है; उतना ही वह अन्तर्जगत् में भी जी रहा है। बाहरी संसार के नदी, पर्वत, पशु-पक्षी उसके मन से जुड़े हैं; तो वह मानव होकर भी मानवेतर पात्रों से जुड़ा है। गतिशील होकर भी वह स्थिर,गतिशील मूर्त्त-अमूर्त्त सभी का सगा- सम्बन्धी है; अत: लघुकथा से इन पात्रों को निर्वासित नहीं किया जा सकता। ऐसे पात्रों का सही निर्वाह न होने पर रचना कमजोर तो हो ही जाएगी।
व्यंग्य को लघुकथा के लिए वर्जित या अनिवार्य नहीं माना जा सकता। विद्रुपताओं पर प्रहार करने के लिए व्यंग्य की आवश्यकता पड़ सकती है। कभी-कभी व्यंग्य रचना में आद्योपांत पिरोया हुआ हो सकता है तो कभी कथा के समापन बिन्दु के साथ व्यंजित होता है। हमें व्यंजनावृत्ति द्वारा बोधित अर्थ और चुटकुले में अंतर करना होगा। जो संकेतितार्थ को नहीं पकड़ पाते; उन्हें कोई लघुकथा चुटकुला लगे तो क्या किया जा सकता है?
लघुकथा में वर्णन और विवरण का अवकाश नहीं होता; वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया जाता है; अत: रचना को धारदार बनाने के लिए भाषिक संयम की नितान्त आवश्यकता है। जहाँ कई वाक्यों की बात कम से कम वाक्यों में कहीं जा सके, कथन स्फीत न होकर संश्लिष्ट हो; वहाँ भाषिक संयम स्वत: आ जाएगा। दिनभर की व्यस्तता को प्रकट करने के लिए बहुत सारी बातों का वर्णन किया जा सकता है; परन्तु लघुकथा में इसी बात को कम से कम शब्दों में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। 
कथ्य में प्रखरता लाने के लिए प्रतीकों का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन प्रतीकों को सिद्ध करने के लिएकथ्य  बुनना उचित नहीं है। प्रतीकार्थ प्रस्तुत अर्थ का सहायक हो, उसे उलझाने वाला न हो। कथ्य की माँगपर ही प्रतीक का प्रयोग होना चाहिए। प्रतीक-प्रयोग से यदि कथ्य की संवेदना आहत होती है; तो यह दोष प्रयोक्ता का है, प्रतीक का नहीं। बच्चे के हाथ में धारदार चाकू दे दिया जाए तो वह अपना हाथ भी काट सकता है। अच्छे प्रभाव के लिए प्रतीक को तात्कालिकता के प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है: दुर्बोध प्रतीक रचना को कमजोर ही कर सकते हैं। मिथकों का प्रयोग भी बहुत सारे लघुकथाकारों ने किया है। जरा-सी असावधानी पूरे मिथकीय परिप्रेक्ष्य को ध्वस्त कर सकती है। कथ्य के अनुरूप ही मिथक का चयन करना चाहिए। मिथकों की अपनी एक मर्यादित स्थिति है, उसमें रद्दोबदल करना रचना के साथ धोखा करना है। 
कथानक का अपना अस्तित्व है। कथ्य ताज़ा दम है या बासी यह लघुकथा को एक हद तक ही प्रभावित करता है। कथानक की प्रस्तुति प्रचलित कथानक को भी सशक्त बना सकती है। प्रस्तुति ठीक न होने पर नया कथ्य भी प्रभावशून्य सिद्ध होगा। 
भाषा को लेकर लघुकथा में ढेर सारी भ्रांतियाँ हैं, सच तो यह है कि संवेदना की भाषा और अभिव्यक्ति की भाषा के बीच एक अन्तराल है। संवेदना के स्तर पर जी लेने के बाद ही लिखने की बारी आती है, पहले नहीं। लिखने के लिए थोड़ा पीछे मुडऩा पड़ता है;  अत: अनुभूति के साथ एक अनकहा समझौता करना पड़ता है। भाषा में सरलीकरण की क्रिया या आम बोलचाल की भाषा कोई सायास कार्य नहीं है;  वरन् सतत अभ्यास का प्रतिफल है। सायास होने पर भाषा की सहजता जरूर नष्ट होगी। जिस विधा की सारी संभावनाएँ चुक गई हों, भाषा को पंगु बनाना हो उसके लिए सरलीकरण प्रमुख हो सकता है। भाषा किसी रचना के ऊपर नहीं थोपी जाती। भाषा कथ्य के भीतर से ही उपजती है। भाषा केवल पात्रानुकूल ही नहीं होती वरन् परिस्थिति, मानसकिता एवं परिदृश्य के भी अनुकूल होती है। एक ही पात्र हर्ष, शोक या भय में एक जैसी भाषा प्रयुक्त नहीं करेगा। पत्नी, अधिकारी, पुत्र और नौकर के सामने भाषा का स्वर और स्तर भिन्न-भिन्न हो जाएगा। आज का जीवन बहुत जटिल है, मानसिक गठन और भी अधिक जटिल। इसका प्रभाव अभिव्यक्ति पर पड़े बिना नहीं रह सकता। संस्कृतनिष्ठ भाषा न कोई खतरा और न दबाव; क्योंकि भाषा की वास्तविक निष्ठा कथ्य से है, फारसी या संस्कृत से नहीं। सरल भाषा में यहाँ तक की आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई ढेर सारी नई कविताएँ दुर्बोध है। यह दुर्बोधता भाषा के कारण नहीं आई वरन् कवि की जटिल, विचार-संकुल अनुभूतियों के कारण आई है। लघुकथाकारों में एक वर्ग ऐसा है, जो भाषा के प्रति बिल्कुल लापरवाह है। अच्छी-भली रचना कमजोर भाषा के घेरे में आकर अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकती।
लघुकथाओं में बाह्य-संघर्ष तो खूब मिलता है। शायद इसका कारण वे विषय हैं, जिनमें जनसाधारण की आवाज बनकर लघुकथा ने अपना रास्ता तय किया है। परन्तु एक लम्बे अर्से तक एक ही दिशा में दौड़ लगाना हितकर नहीं। लघुकथा को नए आयाम खोजने पड़ेंगे। अन्तद्वन्द्व एवं अन्त:संघर्ष को लेकर कई रचनाएँ सामने आई हैं। इस तरह के विषयों में भाषा अतिरिक्त अनुशासन की माँग करती है। 
अब आवश्यकता है कि नए से नए विषयों का संधान किया जाए; जिससे लघुकथा गिने-चुने विषयों के दायरे से बाहर आकर अपने सशक्त रूप की छाप छोड़ सके। यह तभी संभव है; जब पूर्वाग्रह-मुक्त होकर लघुकथाओं पर विचार किया जाए।
उदन्ती के इस अंक में नए-पुराने 32 लघुकथाकारों की  67 लघुकथाएँ दी गई हैं; जो अपने कथ्य और प्रस्तुति से विधागत विशेषताओं और वैविध्य को प्रस्तुत करती हैं। आशा है लघुकथाओं पर केन्द्रित यह अंक पसन्द आएगा।                                                        000

1 Comment:

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत सटीक और सार्थक आलेख...हार्दिक बधाई...|

प्रियंका

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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