- हरेराम समीप
1
आग लगी साहित्य में, बढ़ती जाए आँच
जलते शब्दों को अगर, बाँच सके तो बाँच
2
शब्द खो रहे मायने, दिल खो रहे उसूल
नई सोच की आँख में, भरी जा रही धूल
3
किया हुआ है आजकल, शब्दों ने विद्रोह
लिखता हूँ कविता मगर, लिख जाए व्यामोह
4
जहाँ मिले घर में जगह, रह लेतीं चुपचाप
ये साहित्यिक पुस्तकें, ज्यों बूढ़े माँ-बाप
5
जिस दिन दृढ़ विश्वास से, खड़े हो गए आप
तभी ख़त्म हो जाएगा, सदियों का संताप
6
अभी सफ़र लम्बा बहुत, तू मत खोज पड़ाव
पौधा बढ़कर पेड़ हो, तब तो देगा छाँव
7
जीवन जीने के लिए, लड़ना है हर हाल
पर्वत से आती नदी, बनकर वाटरफाल
8
जिसको अपने आप पर, है पूरा विश्वास
रहती है हर युद्ध में, जीत उसी के पास
9
अँधियारे की जंग से, पीठ दिखा मत भाग
पत्थर से पत्थर रगड़, पैदा होगी आग
10
चला गया जाने कहाँ, वही युवा आवेश
कब से उसकी खोज में, घूम रहा है देश
एक छोर पर जिंदगी, मौत दूसरे छोर
इन दोनों के बीच में, तनी साँस की डोर
12
सब अगवानी कर रहे, पंछी, नदी, पहाड़
सूरज आने को हुआ, तम के खोल किवाड़
13
करे धूप से सामना, आँधी से मुठभेड़
बेलिबास होता नहीं, कभी आस का पेड़
14
उसने रखी सहेजकर, बची-खुची उम्मीद
रोते-रोते सो गई, फिर आँखों में नींद
15
तुझे मिलेगी वह खुशी, पूरी होगी खोज
आशा की उँगली पकड़, चलता चल हर रोज़
16
मन की कंदीलें जलीं, भरने लगा उजास
अवसादी परिवेश में, लौट रही फिर आस
17
दुनिया भर से आपको, अगर चाहिए प्यार
भीतर-बाहर माँज लो, अपना यह किरदार
18
यूँ तो था वह उम्र भर, मामूली मज़दूर
लेकिन वो हर पल रहा, ओछेपन से दूर
19
घर की खिड़की बंद रख, कभी न जाना भूल
यह अंधड़ का दौर है, भर जाएगी धूल
20
केवल सुखदायी नहीं, होते सारे ख़्वाब
संग रहें उद्यान में, काँटे और गुलाब


No comments:
Post a Comment