June 11, 2013

डोगरी कविताएँ

- शिवदेव मन्हास
कब तक?
गाँव- कस्बों ने
सँजो रखी हैं
अपनी तहज़ीब की
कई तस्वीरें
बड़ों का आदर
महिलाओं की खुसर-पुसर
बच्चों के खेल
दोस्ती के उदाहरण
दुश्मनी के किस्से
गर्ज़मंद की मदद
अतिथि सत्कार...
पर अब सड़कों ने
शिक्षा ने
मीडिया ने
सरकारी तंत्र ने
भ्रमित कर दिया है
गाँव- कस्बों को।
महानगरीय शिकारी से
कब तक बचा पाएगा खुद को
मासूम देहाती। 

भीख या सीख
भीख माँगते भिखारी को
भीख दूँ या सीख
भीख दूँगा तो वह भिखारी ही रहेगा
सीख दी तो वह मुझको भी
खुद-सा मान जाएगा
मेरे बारे में
न जाने क्या-क्या बड़बड़ाएगा

बड़ों का कबाड़
आम की गुठलियाँ बेकार होती हैं
बड़ों के लिए
फैंक देते हैं
पिछवाड़े में
कुछ दिनों के बाद
उनमें कोंपलें निकल आती हैं
तो उनको उखाड़कर,
फोड़कर
बच्चे बना लेते हैं पीपनियाँ
बड़ों का कबाड़
अक्सर खेल का सामान बनता है
बच्चों का।  
            
संपर्क:अध्यक्ष, स्नातकोत्तर डोगरी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू-180006,मोबाइल : 9419208751,

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