June 11, 2013

व्यंग्य

हमारी पहली हवाई यात्रा
- अनुज खरे
हवाई जहाज से यात्रा करना आज भी देश में अभिजात्य की निशानी माना जाता है। कल भी माना जाता था। बल्कि तब तो यात्रा अभिजात्य लोग ही करते थे। जैसे देश में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अभिजात्य होना चाहता है, हम भी होना चाहते थे, बल्कि हम तो बचपन से ही इस दिशा में प्रयासरत थे। चांस हाल ही में मिला। यात्रा भोपाल से चंडीगढ़ तक की थी। इससे आगे की कसौली तक की बाय रोड भी थी ; लेकिन यह बात गोपनीय है और कुल कहानी का वज़न कम कर रही है, इसलिए फिर कभी।
तो यात्रा पर जाने से पहले जितने लोगों को टिकट दिखाया जा सकता था, दिखाया गया। जिन्हें टिकट नहीं दिखाया जा सकता था , उन्हें यात्रा विवरण से लगातार लाभान्वित करवाया गया। आखिर आदमी की भी सीमा होती है, कितने लोगों को बताया जा पाता। खैर, हमने तो उपलब्ध हर संसाधन का प्रयोग करके दूर-दूर तक जाकर अपनी यात्रा की जानकारी प्रेषित कर दी। जहाँ नहीं जा पाए वहाँ दूरस्थ यंत्र की मदद से सूचना पहुँचाई गई। दूरसंचार क्रांति का महत्तव पहली बार इस गतिविधि के दौरान ही स्पष्ट हुआ। जो हमारे शुभचिंतक थे उन्होंने हमें बधाई दी। जो विरोधी थे उन्होंने हमारे ओछेपन का मज़ाक उड़ाया। ओछेपन वाली बात हमारे शुभचिंतकों ने ही उन्हें बताई थी यह बात भी हमें बाद में पता चली। खैर, जलन तो देवताओं तक के बीच में भी होती है।
जब विमान में बैठे, तो जिस नजर से एयर होस्टेस नामक पात्र को हमने देखा, उससे भी बुरी नजरों से उन्होंने हमें देखा। उन्होंने विमान में पहली-पहली बार बैठने वालों के नजरिए से काफी निर्देश दिए। जो अंग्रेजी में इतनी वहशी भाव-भंगिमा में दिए गए कि जिसे हमने नहीं सुना। बाद में जो हिन्दी में कहा गया, उसका हमने नोटिस ही नहीं किया। आखिर विमान में बैठा हर आदमी अंग्रेजी में पढ़ रहा था, जब पढ़ नहीं रहा था, तो अंग्रेजी में बात कर रहा था। बाकियों की देखादेखी पढऩे की हमने भी कोशिश की तो अंग्रेजी किताब के चित्र सुंदर दिखने लगे। पहली बार हमें चित्रों की ताकत का अहसास हुआ। लगा कोई किताब केवल चित्रों के सहारे ही पढ़ी जा सकती है। एक चित्र एक हजार शब्दों के बराबर होता है। अभिव्यक्ति किसी भी भाषा की मोहताज नहीं होती, किस्म की बातें याद आई, सच लगीं। एयर होस्टेस नंबर एक को भी हमने थोड़ी बहुत तभी तवज्जो दी, जब वे कुछ खाने को लाईं, अन्यथा तो पूरी यात्रा के दौरान हमने उन्हें मुँह तक नहीं लगाया, रूठे -से रहे बात तक नहीं की। उन पर भी दिखता था कि हमारे अभिजात्य का खासा रौब पड़ा था, क्योंकि उन्होंने भी हमें मुँह नहीं लगाया। आस-पास के लोगों से सर, सर करके बातें करती रहीं, हमारी तरफ देखकर मुस्कुराती रहीं। उनकी इस प्रक्रिया के दौरान हमें मुस्कुराहट के प्रकारों में से व्यंज्य वाली मुस्कुराहट का उप प्रकार तत्काल समझ में आ गया। हालाँकि जब एयर होस्टेस नंबर दो पास से गुजरीं और उन्होंने जिस नज़र से हमें देखा उनसे हमें तत्काल प्यार हो गया, मध्यवर्गीय लोगों यही तो बुरी आदत है कि किसी भी लड़की ने जरा-सी दया नहीं दिखाई कि वे प्रवृत्तिवश इसे प्यार मान बैठते हैं, फिर एयर होस्टेस नंबर तीन ने भी पास से निकलते वक्त इसी तरह की नजरों से देखा, तब हमारे पास उनसे फॉलिंग इन लव हो जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। इस तरह बैठे-बिठाए मामला ट्राएंगल हो गया। हालाँकि जब दोनों ने हमारे अलावा कइयों को भी इसी नज़र से देखा और एयर होस्टेस नं. एक ने इसी दौरान वापस एंट्री मारी, दोनों के सम्मिलित प्रभाव से उपर्युक्त कहानी बिना परवान चढ़े ही खत्म हो गई। हालाँकि उन पर तो हमें इतना गुस्सा आया कि पानी तक बाजूवाले का उठाकर पी दिया, वो तो जब उसने हमें उठाकर बाहर फेंकने वाली निगाहों से देखा , तभी हमारा गुस्सा और प्यार का बुखार उतरा।
विमान का भीतरी दृश्य देश के विकास की सच्ची तस्वीर था। पुरुष समाज खाया-पिया पौष्टिकता की चमक से युक्त था, तो एयर होस्टेसों का गोरा रंग तो इतनी चमक मार रहा था कि समझ ही नहीं आया कि इन्हें कहाँ से आर्डर देकर बनवाया गया होगा। आस-पास के लोग फैशन के साक्षात् प्रतीक लग रहे थे। पड़ोस में ही कुछ मॉडलनुमा महिलाएँ बच्चों के साथ बैठी थीं, वे भयंकर रूप से डायटिंग की शिकार इतनी दुबली-पतली दिख रही थीं कि उनके बच्चे उनसे बड़े लग रहे थे। उन्हें देखकर निश्चिंतता हो गई कि देश के कुछ हिस्सों में शादी के बाद बच्चे पैदा करने की परंपरा प्राय: लुप्त हो चुकी है या खाने में केवल हवा खाकर भी जीवित रहा जा सकता है। जो पुरुष फैशन में लिप्त नहीं थे, वे आस-पास की नारियों को देखते हुए मोबाइल पर अपने कर्मचारियों को डाँट रहे थे, जो बिचारे कर्मचारियों को अफोर्ड नहीं कर सकते थे, वे दाएँ-बाएँ से गुज़रती एयर होस्टेसों को देखकर अपने अधीनस्थों पर ही पिले पड़े थे। मेरे साथ वाली सीट पर बैठे भाई साहब ने तो अपनी किसी कर्मचारी को इतना कसकर डाँटा कि मेरी आत्मा तक अंदर से सर, सर गलती हो गई वाली मध्यवर्गीय हरकत पर उतर आई थी। विमान चला तो नीचे लोग इतने तुच्छ नजर आए जैसा कि ऊँचाई पर जाने वाले हर आदमी को नजर आते होंगे। इस पर हम तत्काल ही ऊँचाई की ताकत के कायल हो गए। ऊपर से बड़े शहर तो फिर भी ठीक हैं, कस्बे और गाँव तो नजर ही नहीं आ रहे थे। इस पर यह भी स्पष्ट हुआ कि आदमी हो या नेता, हवाई हो जाने पर आम आदमी उसकी और वो आम आदमी की नजर से ओझल हो जाता है। हालाँकि कसूर ऊँचाई का रहता है, लोग बड़े आदमियों को अनावश्यक कोसते हैं। हालाँकि वे बिचारे भी क्या करें कभी इतनी ऊँचाई से उन्होंने अपना वजूद देखा नहीं होता है, अन्यथा उनके विचार भी विमान वालों जैसे ही होते। इस तरह यह सिद्धान्त भी काफी हद तक स्पष्ट हुआ कि ऊपर चढऩे वाली कोई भी चीज जैसे दिमाग देर सबेर तकलीफ़ का कारण ही बनती है।
इसी तरह विमान का भीतरी मंज़र भी दो भागों में बाँटा था। आगे वाले-पीछे वाले। आगे बिजनेस क्लास वाले लोग थे, जिनकी नजरों में पीछे वाले पूअर थे। पीछे इकोनॉमी क्लास वाले लोग थे जिनकी नजरों में आजू-बाजू वालों के साथ नीचे वाले वेरीपूअर थे। दोनों तरह के व्यक्तियों की चाल-चलन और नज़रों में इस तरह की विभाजन रेखा के खंभे स्पष्ट गड़े नज़र आ रहे थे। इसे देखकर ही लगा कि देश में विलो पावर्टी लाइन के पैरामीटर ऐसी ही किसी हवाई यात्रा में बिजनेस क्लास में बैठे किसी विद्वान ने बनाए होंगे, क्योंकि जिस तरह देश से प्रतिवर्ष गरीबी और कुपोषण घटता हुआ बताया जा रहा है (हालाँकि गरीब बढ़ रहे हैं) उससे स्पष्ट है कि ऐसे सूचक विमान के अंदर के ऐसे ही किसी सीन को देखकर बनाए जा सकते हैं।यह कयास इतना पुख्ता है कि आगे चलकर कभी रहस्य खुला तो सही ही पाया जाएगा।
इसके पहले हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच का सीन तो गजब रहा। हर बार हमारा बैग जाँच में पाक साफ पाया जाता था। हमें ही रोक लिया जाता था। पता नहीं उन्हें हमारी सूरत में क्या दिखता था कि कई प्रकार की पूछताछ संपन्न करने के पश्चात् भी बिठाए रहते थे। फिर कई प्रकार से अपनी हस्ती के बारे में बताने पर भी जब उन पर रौब नहीं पड़ता था, तभी हमें मजबूरी में अपनी रचनाएँ निकालना पड़ती थीं; जिनकी दहशत के कारण ही हमें छुटकारा मिलता था। हालाँकि हमें यह सोचकर डर भी लगा कि कहीं आतंकवादी भी इसी तरीके से सुरक्षा न भेदने लगें। इसी तरह वहाँ की ड्यूटी फ्री दुकानों में रखे सामान की कीमत पूछकर ही हवाई अड्डे पर लोग इतने शान्त क्यों बैठे हैं, वाली बात स्पष्ट हो गई।
इसी बीच एयर होस्टेस की घोषणा भी सुनाई देने लगी। जो बात उन्होंने हिन्दी में बोली वो हिन्दी-भाषियों को समझ में नहीं आई। जब उन्होंने उसका तर्ज़ुमा अंग्रेजी में सुनाया,तो वो किसी की भी समझ में नहीं आया। कुल मिलाकर लोगों ने खिड़की के बाहर झाँककर खुद ही अर्थ निकाल लिया। जो इस तरह था, कि कोई हवाई अड्डा आने वाला है। चकर-चकर खाना बंद कर दो। सीट बेल्ट बाँध लो। सीटों पर जो सज्जन औंधे मुँह लेटे हैं, वे सीधे हो जाएँ, नहीं तो विमान रुकने पर औंधे
मुँह ही गिरेंगे। सामान उठाएँ, तो अपना ही उठाएँ। हमें जो आपने सेवा का मौका दिया है उसके लिए धन्यवाद। अगर फिर पैसे इकट्ठे हो पाएँ और हवाई यात्रा की गुंजाइश बन ही जाए तो हमारी ही कंपनी के विमान से यात्रा करना। कुल मिलाकर यह स्पष्ट किया गया कि एयर होस्टेसों को घूरने का समय समाप्त हुआ, निकल लो।
तो इस तरह उनके ससम्मान नीचे उतार देने के साथ ही हमारी पहली हवाई यात्रा संपन्न हुई। अब सामान में जगह-जगह एयरलाइंस कंपनियों के टैग लगे हैं। यात्रा के बेकार टिकट को हमने पैसे से भी ज्यादा सँभाल कर रख लिया है। टैक्सी में सामान रख दिया है। हमने मोबाइल मिला लिया है। बात चल रही पड़ी है- यार, जस्ट अभी एयरपोर्ट पर उतरा हूँ, बड़ा हैक्टिक शिडच्यूल था। दो फ्लाइट चैंज करनी पड़ी। हवाई यात्रा के बाद जमीनी यात्रा शुरू हो गई है। बात के बीच-बीच में लगातार टैक्सीवाले पर नजर है, कि उस पर पर्याप्त प्रभाव पड़ रहा है कि नहीं। 
                    
लेखक अपने  बारे में: पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर, घाट-घाट का पानी पिया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया तो इस तरह के व्यंग्यों के रूप में कसर निकाली। कहीं जाते समय ऑटो पंक्चर हुआ तो उतरकर जिस सद्भावना के साथ उसके ड्राइवर के गुणों का विश्लेषण और महिमामंडन किया उसे लोगों ने कालांतर में व्यंग्य के रूप में पहचाना। पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो व्यंग्य अव्यवस्था के खिलाफ इसी ड्राइवरीय सद्भावना की पारी को आगे बढ़ाने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफ़हमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा। शिक्षा- जनसंचार, इतिहास-पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर। विदेश यात्राएँ- इंग्लैंड, इजिप्ट, लीबिया, चीन (हांगकांग, मकाऊ)। कई सम्मान, पुरस्कार एवं फैलोशिप प्राप्त। व्यंग्य संग्रह चिल्लर चिंतन, मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर एक किताब। देशभर के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में 150 से अधिक व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन। संप्रति- कार्यकारी संपादक (dainikbhaskar.com)
 
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