June 11, 2013

हाइकु

लगाओ पौधे
- अनिता ललित
1
सोंधी महक,
स्वच्छ वातावरण
कहाँ खो गया?
2
धूल, ईधन,
बारूद से दूषित
जग हो गया!
3
प्लास्टिक हँसे,
पेड़ों के ठूँठ रोएँ
जो हवा चले!
4
वृक्षों के लहू
सींचे जब धरती
प्रकृति रोए!
5
हँसती सृष्टि,
महकती प्रकृति
अब चीत्कारे!
6
ना काटो वन,
घुटने लगीं साँसें
सुलगे घन!
7
युद्ध है सर्प,
प्रदूषण है डंक,
कुचलो फन!
8
भुला दुश्मनी,
जलाओ नेह-दीप
बुझा बारूद!
9
धुआँ ही धुआँ,
तनाव के घेरे में
विक्षिप्त मन!
10
महके माटी,
प्रकृति- गोद झूले
ये देखे स्वप्न!
11
जले नकाब,
धरा के सौंदर्य का
बचाओ उसे!
12
लगाओ पौधे,
सजाओ हरीतिमा
सहेजो उसे!
13
स्वर्ण कलश
सिंधु में ढुलकाती
उषा पधारी!
14
सृष्टि सदा ही,
स्फूर्ति से है हँसती
उदय-अस्त!
15
कवि- कल्पना,
नहीं बँधे सीमा में
जो खोले पंख!
16
सीमा ना जाने,
हर बंधन तोड़े
प्रेम- लहर!
17
है सीमाहीन,
ममता का आकाश,
बच्चे हैं तारे!
18
मासूम आँखें
ले कल के सपने
फिरें बेचैन ।
19
जो देखें कल
अनुभवी नज़रें
होतीं बेचैन।
20
थाम लो हाथ,
दुनिया को दें मात
हम जो साथ!
21
शब्दों में गर
दुख सिमट सके
क्यों आँसू बहें?
22
दिल से बहे,
जब प्रेम की धार
जीवन खिले!
23
साँस है 'धागा’ ,
उम्र पिरोए 'मोती’ ,
जीवन 'माला’ !
24
एक कहानी,
सपनों की रवानी,
ये ज़िन्दगानी!    
 
लेखक के  बारे में: जन्म- 6 सितम्बर, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), शिक्षा- एम. ए. इंग्लिश लिटरेचर!
अभिरुचि- जो भी मेरे दिल को छू जाए... वो संगीत, कविता, कहानी, लेख मुझे पसंद हैं और वही सुनना, पढऩा तथा लिखना मुझे बहुत पसंद है! लिखने का शौक मुझे शेली और कीट्स को पढ़ते-पढ़ते हुआ! हाइकु, ताँका व चोका मंच पर आकर बहुत कुछ सीखने को मिला! कम शब्दों में अपने भावों को व्यक्त करने का अनोखा अवसर मिला! मैनें मई 2012 में अपना ब्लॉग शुरू किया। अभी तक मैंने कुछ कविताएँ, कहानियाँ तथा कुछ लेख लिखे हैं ।
 मेरे ब्लॉग का लिंक है- http://boondboondlamhe-anita.blogspot.in/  Email- anita.atgrace@gmail.com, संपर्क: 1/16 विवेक खंड, गोमतीनगर,लखनऊ, (उ.प्र.) 

2 Comments:

Ashok Saluja said...

मुबारक हो ....
बहुत सुंदर ,बहुत खुबसूरत,बहुत अर्थपूर्ण ,बहुत सार्थक ,बहुत मार्मिक ....
स्वस्थ रहो !

Anita (अनिता) said...

हार्दिक धन्यवाद व आभार.... अशोक जी!

~सादर!!!

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