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Apr 1, 2026

यात्रा वृत्तांतः उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर

 - डॉ. आरती स्मित 

यात्राएँ कहीं की हो, रोमांच पैदा करती हैं। मध्य प्रदेश कई कारणों से मेरा प्रिय स्थल रहा है, हालाँकि स्वरूप बदल रहा है, कहानियाँ बदल रही हैं, तब भी वह प्रांत आदि मानव का प्रांत होने के साथ ही अपनी स्थापत्य कलाओं, प्राचीन गुफाओं और एक बड़े हिस्से में आदिदेव महादेव की नगरियों के कारण मुझे अति प्रिय है। 

  साहित्य अकादेमी, भोपाल के आमंत्रण पर ‘गंज बसौदा’ जाने हेतु सहमति के पीछे एक बालसुलभ ललक थी- दसवीं सदी में स्थापित, शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते  उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर जाने और शिव के उस प्रतीक के दर्शन-पूजन की, जिनका अभिषेक करने प्रतिवर्ष शिवरात्रि की प्रात: रश्मियाँ धरती पर उतरती हैं। यह गल्प लग सकता है, किंतु यह सच है। इस मंदिर के इतिहास में कई गल्प भी शामिल हुए होंगे, किंतु यह उस महान कलाकार के ज्ञान का प्रत्यक्ष नमूना है। दसवीं सदी का वह शिल्पकार कितना विलक्षण रहा होगा, यह अनुमान लगाना भी कठिन जान पड़ता है।

   दिल्ली से गंज बसौदा की रेलयात्रा कुछ कष्टप्रद रही। किंतु स्थानीय संयोजक युवा कवि ध्रुव शर्मा द्वारा गंज बसौदा में की गई व्यवस्था बेहद व्यवस्थित और उत्कृष्ट थी। नीलकंठ महादेव के नाम पर ही होटल का नामकरण किया गया था—नीलकंठ। कार्यक्रम के सफल समापन के उपरांत अगले दिन ११ मार्च २०२५ को स्थानीय युवा सन्नी, उसकी बहन रोशनी, युवा कवयित्री शिखा, प्रगति एवं कार्यक्रम में शिरकत करने आए युवा साथी संदीप एवं राहुल के साथ यह यात्रा आरंभ हुई। इस प्रकार, एक से दो और दो से सात यात्री हो गए। दो स्कूटी एवं एक मोटर बाइक से बिना हेलमेट के १८ किलोमीटर की यात्रा भी रोमांचक रही। 

   गंज बसौदा यों तो विदेश निर्यात किए जाने वाले उम्दा पत्थर एवं उत्तम गुणवत्ता वाले गेहूँ के लिए प्रसिद्ध है, किंतु स्थानीय जन के बीच वहाँ के कुछ मंदिर प्रसिद्ध हैं जिनमें से एक राम मंदिर भी है। हालाँकि उस परिसर में शक्ति मंदिर भी है और गुरु गोरखनाथ के भव्य मंदिर निर्माण-कार्य चल रहा था। राम मंदिर तक की लघु यात्रा शिखा की स्कूटी से हुई थी। यहाँ से रोशनी के साथ यात्रा आगे बढ़ी। हमने स्टॉल से चेहरा और सिर ढँक रखा था। फिर भी गर्म हवा अपना प्रभाव जमाने में सफल रही। गंज बसौदा से उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर के लिए कोई सवारी गाड़ी या निजी गाड़ी आती-जाती नहीं दिखी। न बस, न ऑटो। रास्ता भी कुछ दूर के बाद शांत ही था। आसपास घर भी न के बराबर। सड़कें कहीं-कहीं बिगड़ी हालत में मिलीं। दोनों ओर खेत में लहराती सुनहरी फसल पथिकों का मन मोह लेते हैं। मंदिर के निकट पहुँचने का संकेत उसके गोपुरम से मिल जाता है जो रास्ते से दिखता है। 

   लगभग चालीस मिनट बाद हमें दूर से मार्ग की दायीं दिशा में भील राजा का कोट (क़िला) दिखने लगा जिससे राजा भोज के वंशज वीरसेन ने आक्रमण करके जीता था और उस इलाक़े पर आधिपत्य स्थापित किया था। बाद में मंदिर के पुजारी श्री महेंद्र शर्मा ने आक्रमण से लेकर उदयपुर की स्थापना एवं मंदिर निर्माण से जुड़ी लंबी कथा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए बताया, अब भी उस क़िले के भीतर के कुछ अवशेष बचे हुए हैं जिन्हें देखा जा सकता है।

      मंदिर के प्रवेश द्वार से कुछ पूर्व दोनों ओर फूल-प्रसाद की दुकानें हैं, जहाँ भक्त अपनी पसंद और इच्छानुसार फूल-प्रसाद आदि लेते हैं। प्रवेश द्वार के पास ही जल की मशीन लगी हुई है, जहाँ से शिवलिंग पर चढ़ने के लिए भी जल भर लिया जाता है। जलते तलवों की चीख सुनते हुए हम जल्दी-जल्दी मुख्य मंदिर में प्रवेश हेतु चलने लगे किंतु दृष्टि रह-रहकर परिसर में आठों कोनों में बने वेदीमंडप एवं मुख्य मंदिर के गोपुरम की शिल्पकला में अटकती रही। प्रत्येक खंभे पर बारीक नक़्क़ाशी एवं देवी-देवताओं के अलग-अलग आकार की मूर्तियाँ तराशी हुई थीं, जो एक-दूसरे से जुड़कर गोपुरम का स्वरूप धारण कर रही थीं। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा ने बताया, “प्रत्येक खंभा अलग-अलग पत्थरों पर शिल्पकला उकेरने के बाद लोहे के तार से भीतर ही भीतर परस्पर इस प्रकार जोड़ा हुआ है कि खंभा एक पत्थर से बना होने का भ्रम होता है।” मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थर की कई सीढ़ियों के ऊपर है, जहाँ मंदिर दो हिस्सों में प्रतीत होता है। खुले चबूतरे के बाद दोनों ओर के मोटे-मोटे खंभों पर नीचे से लेकर लगभग ढाई-तीन फीट तक शिलालेख हैं, वे पत्थर ही अन्य से कुछ अलग दिखते और दीवारों से मेल खाते हैं। उसके ऊपर बारीक शिल्पकला का अद्भुत नमूना, कहीं बड़ी मूर्तियाँ भी और उन मूर्तियों के किसी अंग में जाली-- उसी पत्थर से। 

    एक भी कोना खाली न दिखा जहाँ कुछ निर्मिति न हो। गर्भगृह के द्वार पर द्वारपाल बने हैं और इससे बाहरी द्वार पर यक्ष, गण आदि बने हुए हैं। एक स्थल पर विष्णु के मस्तक के स्थान पर बकरे का मस्तक, इसी प्रकार गणपति कई रूपों में दिखाई दे जाते हैं। उनकी छोटी-सी प्रतिमा में बनी सूँढ़ के भीतर गोलाई से छिद्र बना है, जिसमें धागा या पतली डोर घुस सके, इतनी जगह है। इसी प्रकार हाथी तथा अन्य कलाकृतियों में भी। चारों ओर कलाकृतियों से से घिरे खंभों और दीवारों के बीच नंदी अपना स्थान ग्रहण किए है। सीलिंग पर एक स्थान पर फूल की खिली पंखुरियों के भीतर की ओर उकेरी गई शिल्पकला को देखने के लिए मोबाइल के कैमरे को सेल्फ़ी मोड पर ले जाकर उस स्क्रीन पर देखना संभव होता है। यह तरीक़ा हमें पुजारी जी ने ही बताया। गर्भ गृह में उतरकर शिवलिंग के ऊपर चढ़े पीतल की खोल में बने भोलेनाथ की छवि भी कुछ अलग-सी है मानो पुरुष के अंतस की स्त्रैण प्रकृति का मूर्त रूप हो। प्रतिदिन उन्हीं का अभिषेक-सिंगार होता है। उस खोल के नीचे मूल शिवलिंग का एकाध इंच हिस्सा दिखाई पड़ता है। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा के कथनानुसार, शिवरात्रि के दिन प्रात:बेला में सूर्यकिरणें सीढ़ियाँ चढ़ती हुई शिवलिंग को स्पर्श कर, उसी दिशा में ऊपर दीवार तक जाती हैं। इसलिए उस खोल को केवल शिवरात्रि के दिन ही हटाया जाता है। उस दिन समस्त श्रद्धालु मूल शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं। खोल या आवरण पहनाने का कारण शिवलिंग के पत्थर को क्षय से बचाने का प्रयास मात्र है। दसवीं सदी से आज तक शिवलिंग ही नहीं, मंदिर का आंतरिक हिस्सा भी ज्यों का त्यों है। बाहरी हिस्से में गोपुरम की कुछ मूर्तियों के अंग भंग दिखाई देते हैं। इस मंदिर से जुड़ी कई विलक्षण बातों एवं कथाओं में से एक कथा यह भी है, जिसे सत्यकथा मानी जाती है। राजा भोज के वंश के राजा वीरसेन को स्वप्न में शिव मंदिर बनाने का आदेश मिला था। कथा लंबी है। जिसमें किसी कारण के तहत निश्चित समय मंदिर पूरा हो जाना था। प्रधान शिल्पकार ने एक ही रात में यह मंदिर खड़ा किया। शिल्पकारी के बाद वे पत्थर परिसर में ला-लाकर रखते थे। मंदिर जोड़ते-जोड़ते ऊपर गोपुरम तक वे गए। रात भर वे काम करते रहे, भोर होने तक वे उतर न पाए और सूर्य की किरणों के स्पर्श के साथ वे भी पत्थर के हो गए। आज भी मंदिर के शीर्ष पर पत्थर का एक आदमी उतरने की जुगत सोचता नज़र आता है। इस गोपुरम में बनी कुछ मूर्तियाँ शिल्पकार की अनूठी चिंतनदृष्टि का परिणाम कही जा सकती हैं। जैसे कि गणपति का स्त्री रूप, कहीं नर-नारी रूप में गणपति, कहीं अर्धांगेश्वर के रूप में महादेव एवं विष्णु एक साथ तो कहीं शक्ति अलग ही रूप में …. ऐसी कई विशेषताएँ जो अन्य गोपुर की कलाकृतियों से इसे भिन्न करती है। पर्यटकों द्वारा इसे स्वयं देख-समझ पाना तो कठिन होता होगा, पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा जी ने स्वयं एक-एक विशिष्ट प्रतिमा दिखलाई और उसके निर्माण के पीछे शिल्पकार की दृष्टि पर संवाद किया। 

     मंदिर की विशिष्टता के साथ ही पुजारी जी के गुणों का उल्लेख किए बिना यह वृत्तांत पूरा न होगा। उनकी उदारता से पलकें भीगने का समय तब आया जब उन्होंने आग्रह करके एक कोने में रखी अपनी चप्पल पहन लेने को कहा ताकि धूप से मेरे पैर न जलें और स्वयं नंगे पाँव धूप में चलते हुए, परिसर का एक-एक कोना दिखाते और ख़ूबी बताते चले। 

     परिसर में ही फ़र्श पर पूरे मंदिर का नक़्शा बना हुआ है जो धुँधला गया है। मंदिर का कार्य निर्विघ्न पूरा हो, इसलिए आठों दिशाओं में वेद मंडप बनाए गए जिनमें नियमपूर्वक यज्ञ होता था। प्रमुख मंडप अन्य वेदी मंडप से बड़ा और मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने है। राजा उदयसेन के नाम पर यह प्रांत उदयपुर कहलाया। जहाँ से सूर्य किरणें भूमि से मंदिर के लिए उर्ध्वमुखी होती हैं, उस स्थान से गर्भगृह का शिवलिंग (तेज़ प्रकाश से अँधेरे में देखने के कारण) नहीं दिखा किंतु जलता दीया दिखा। शिवलिंग के ठीक पीछे शक्ति की प्रतिमा स्थापित है जो कुछ अलग सी है। शक्ति की प्रतिमा ढाई-तीन सौ वर्ष मात्र पुरानी है। 

     चलते-चलते पुजारी जी ने बताया कि जब से यह मंदिर बना है, यानी दसवीं सदी से अब तक एक वंश के ही पुजारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा का दायित्व निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे। सबसे अच्छी बात लगी कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह न तो पुजारियों ने कोई वीआईपी द्वार बनाया है, न वीआईपी पंक्ति और न ही वे भक्तों को मूर्ख बनाकर लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं। कहीं दान पेटी नहीं दिखी। कुछ लोग सुकून के लिए परिसर में बैठे दिखे। न कोई रोक-टोक, न ही किसी के द्वारा कोई अभद्रता। हमने कुछ तस्वीरें लीं। तीन बज चुके। फिर हमने उस पावन भूमि को प्रणाम किया और परिसर से बाहर निकल आए। स्थानीय जन ने बताया, पुजारी जी इस तरह किसी को समय नहीं देते। आपको तो उन्होंने अपने भोजन की बेला बीतने देकर एक-एक महत्त्वपूर्ण बात बताई। इसे शिव की कृपा ही कहा जा सकता है क्योंकि हमने देखा, लोग मंदिर घुसते-निकलते या कहीं बैठकर सुस्ताते रहे और फिर परिसर से बाहर हो गए। 

     एक बार फिर स्कूटी पर आनंद भरा सफ़र शुरू हुआ। अब हृदय इत्मीनान से की गई पूजा, मंदिर के कलात्मक सौंदर्य, उसके इतिहास, संबद्ध कथाओं तथा मंदिर के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने की बातों से पूर्ण आनंद में रहा। वापसी में भील राजा के कोट (दुर्ग) ने भी आने का आमंत्रण दिया। अब भी कुछ निशानियाँ बची हैं। आदिवासी राजाओं का हर जगह परास्त होते जाने और उनके सल्ला-गंगरा को सनातन धर्म में शिवलिंग माने जाने की सोच भी एक कोने में तारी रही। ठीक चार बजे हम होटल नीलकंठ के सामने थे, जहाँ मुझे ठहराया गया था और जहाँ से कुछ घंटों में विदा होकर दिल्ली की यात्रा शुरू होनी थी। 

   दिल्ली के व्यस्त और शोरभरी दिनचर्या में जब भी उस मंदिर की शांति भीतर उमड़ती है, चेतना नीलकंठ महादेव को निकट पाती है।  ■

सम्पर्कः डी 136, द्वितीय तल, गली नम्बर 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली 110092

मो. 8376836119, ईमेल : dr.artismit@gmail.com


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