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Feb 1, 2026

कहानीः कद्रदान

 - गंभीर सिंह पालनी

नौकरीपेशा लोग सेवानिवृत्त होने पर अपनी जिंदगी की नई पारी की शुरुआत करते हैं। मैं भी ऐसे लोगों में से एक हूँ। 

 अपने अनुभवों के आधार पर मैं यह बात कह सकता हूँ कि नौकरी के दौरान हमें बहुत से लोग मिलते हैं; उनसे हमारे संबंध भी बनते; हैं लेकिन हमें तब बड़ा ताज्जुब होता है जब हम ये पाते हैं कि इनमें से बहुत सारे संबंध तो हमारे सेवानिवृत्त होते ही बिखर जाते हैं। इनसे इतर कुछ ही संबंध ऐसे होते हैं, जो बाद में भी बचे रहते हैं।

 सेवानिवृत्त होने के बाद नए संबंध बनाने को लेकर मेरे मन में अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहता। अब मैं बहुत सँभलकर ही इस मामले में कोई नया कदम उठाता हूँ । 

मैं अपने जीवन में कुछ ऐसे अनुभवों से गुजरा,  जिनसे सीख पाकर, अपने सेवानिवृत्त होने से थोड़ा पहले से ही संबंधों को लेकर बहुत ज्यादा सँभलकर चलने लगा था; विशेष कर श्याम दास जी के साथ जुड़े प्रसंग के बाद। 

यह उन दिनों की बात है जब मैं बैंक की भीमताल स्थित शाखा में प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। मेरी कार सर्विस के लिए रुद्रपुर गई हुई थी। उसे लेने के लिए मुझे रुद्रपुर जाना था। भीमताल से रुद्रपुर के लिए सीधी सवारी नहीं मिलती। वहाँ तक जाने के लिए, रास्ते में पड़ने वाले हल्द्वानी शहर तक की कोई सवारी पकड़नी होती है । 

 उस दिन बैंक का कार्य-दिवस बीत जाने के बाद मैं बैंक के सामने से गुजर कर हल्द्वानी की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे खड़ा होकर,  किसी सवारी की प्रतीक्षा कर रहा था। 

मुझे गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी थी; इसलिए काफी देर तक किसी सवारी की प्रतीक्षा करने के बाद जब मुझे लाल रंग की एक प्राइवेट कार आती हुई दिखलाई पड़ी, तो मेरे मन में यह विचार आया कि क्यों न इससे लिफ्ट माँगने की कोशिश करके देखूँ। हो सकता है कि कोई सहृदय व्यक्ति हल्द्वानी तक जा रहा हो और मुझे बैठा ले।  मैंने लिफ्ट माँगने के लिए हाथ का इशारा किया।

  मुझे बड़ा अच्छा लगा कि उक्त कार मेरे पास पहुँचकर रुक भी गई। कार के रुकते ही मैं कार ड्राइव कर रहे सज्जन के पास गया और उनसे अनुरोध किया , “ सर,  क्या मुझे हल्द्वानी तक लिफ्ट देंगे?”

 उत्तर मिला, “ साठ रुपये लगेंगे।”

  उसके मुँह से ऐसा सुनकर मैंने अनुमान लगाया कि यह व्यक्ति कार का स्वामी नहीं; बल्कि कोई ड्राइवर है। तभी मैंने गौर किया कि उस ड्राइवर के बगल वाली सीट पर अपने ही बैंक की भवाली शाखा के प्रबंधक श्री श्याम दास जी बैठे हुए हैं। 

 उन्हें देखते ही मेरे मुँह से एकाएक निकल पड़ा – “श्याम सुंदर दास जी, नमस्कार! लगता है कि आप भी हल्द्वानी जा रहे हैं।” 

 “जी, हाँ।….आप भी बैठिये।”--- श्याम सुन्दर दास जी ने कहा। मुझे लगा कि यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सफर में साथ के लिए अपने ही बैंक में मेरे समकक्ष पद पर ही कार्यरत दास जी अनायास ही मुझे मिल गए हैं। अब तो इनके साथ बातचीत करते हुए सफर अच्छा कट जाएगा।

  मैं कार के पीछे वाला दरवाजा खोलकर सीट पर बैठ गया। देखा, दो सवारियाँ और भी बैठी थीं। 

 मेरे कार के भीतर बैठते ही श्याम सुन्दर दास जी ने कहना शुरू किया, “...और भाई साहब, कैसे हैं आप!....आपकी कहानियों का नया संग्रह कब तक आ रहा है? एक बात बतलाऊँ,  मैं आपका जबरदस्त फैन हूँ। .... सच कहूँ ; हमारे समाज में तो लेखक की कोई कद्र ही नहीं है; लेकिन मैं तो तहेदिल से साहित्यकारों की कद्र करता हूँ। सच बात तो यह है कि मैं आपका कद्रदान हूँ।…इसलिए आप से मेरा एक बार फिर से करबद्ध निवेदन है कि जब भी आपका नया कहानी - संग्रह आएगा, अपने ऑटोग्राफ के साथ उसकी एक कॉपी मुझे जरूर दीजिएगा।…. हम लोग एक ही बैंक में काम करते हैं; इसलिए आप पर मेरा इतना हक तो बनता ही है।”  

  हल्द्वानी शहर के रोडवेज बस अड्डे के पास पहुँचकर कार रुकी, तो मैंने उतर कर ड्राइवर को साठ रुपये थमाए;  श्याम सुन्दर दास जी को नमस्कार किया और रुद्रपुर की बस पकड़ने के बस अड्डे के भीतर चला गया। 

  मैंने सोचा कि निकट भविष्य में जब भी मेरा कोई नया कहानी- संग्रह आएगा, तो उसकी एक प्रति श्याम सुन्दर जी को अवश्य भेंट करूँगा, फिर चाहे उनकी तैनाती कहीं भी हो और ढाई - तीन सौ रुपये मूल्य की वह पुस्तक उन तक कोरियर से भेजने के लिये मुझे अपनी जेब से सौ रुपये खर्च भी करने पड़ें। मेरे प्रति जो आदर- भाव उन्होंने मेरे लेखक होने के नाते प्रदर्शित किया था– उससे मेरा मन गदगद हो उठा था।

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   साहित्यिक पत्रिकाएँ तो सब लोग नहीं पढ़ते; लेकिन समय- समय पर स्थानीय समाचार- पत्रों के रविवारीय परिशिष्टों में मेरी रचनाओं के प्रकाशित होते रहने की वजह से यह बात हमारे बैंक में कार्यरत ज्यादातर व्यक्तियों की जानकारी में थी कि मैं बैंक में प्रबंधक के पद पर कार्यरत होने के साथ-साथ एक लेखक भी हूँ।

   बैंक की विभिन्न शाखाओं में कार्यरत स्टाफ में से चंद लोग ऐसे भी थे जो मेरी किसी कहानी के कहीं प्रकाशित होने के कई महीने बाद भी यदि मुझे कभी किसी ऑफिसियल मीटिंग या यूनियन मीटिंग में मिल पड़ते तो गर्मजोशी से बधाई देने के साथ- साथ उस कहानी की विषय- वस्तु को लेकर मुझ से चर्चा भी करते। उन्हीं व्यक्तियों के अगल- बगल खड़े कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो दूसरों की देखा- देखी,वमुझे बधाई दे तो देते थे लेकिन उनके मुँह से ‘बधाई’ सुनकर साफ- साफ ऐसा लगता था कि मानों यह औपचारिकता निभाना उनकी मजबूरी हो। मेरी रचनाओं के प्रकाशित होने पर अपनी पाठकीय प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करने वाले बैंक स्टाफ की संख्या कुल संख्या का मात्र पाँच प्रतिशत ही रही होगी लेकिन बाकी बचे पचानबे प्रतिशत स्टाफ के व्यवहार में इस संबंध में सदैव एक तरह का ठंडापन ही देखने को मिलता।

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   उक्त लाल कार में बैठकर भीमताल से हल्द्वानी तक की यात्रा किए हुए कई महीने बीत चुके थे लेकिन उस यात्रा की स्मृतियाँ मेरे लिये अब भी ताजा ही थीं। वह यात्रा मेरे लिए इसलिए भी अविस्मरणीय बन गयी थी; क्योंकि उसमें मुझे यह जानने को मिला था कि  जिस संस्था में मैं काम करता हूँ, उसमें श्याम सुन्दर जी जैसे मेरे कद्रदान भी हैं।

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   कुछ महीनों बाद एक दिन हल्द्वानी बस अड्डे पर एकाएक मेरी भेंट सुरेश से हुई जो कभी किसी शाखा में मेरे साथ चपरासी के पद पर कार्य कर चुका था। उसने बतलाया कि वह आजकल बैंक की भवाली शाखा में ही कैशियर के पद पर कार्यरत है। उसकी बातों से मैंने सहजता ही यह अनुमान लगा लिया कि वहाँ कार्यरत शाखा प्रबंधक श्याम सुन्दर जी से उसका कुछ मनमुटाव चल रहा है। शायद यही कारण था कि वह मुझसे कुछ राय लेने के उद्देश्य से, मुझे उनके विषय में कई बातें बता बैठा। उसने यह भी बतलाया कि श्याम जी ने हमारे बैंक द्वारा अपने स्टाफ को निजी उपयोग हेतु कार खरीदने के लिए ऋण दिए जाने की स्कीम के अंतर्गत कुछ वर्ष पूर्व एक लाल रंग की कार खरीदी है। इस कार से वे प्रतिदिन हल्द्वानी से भवाली और भवाली से हल्द्वानी आना- जाना करते हैं। कार को चलाने के लिए उन्होंने एक ड्राइवर रखा हुआ है,  जो हल्द्वानी से लाकर उन्हें सुबह बैंक में छोड़ देने के बाद, दिन भर यहाँ - वहाँ सवारियाँ ढूँढता है और कार को टैक्सी की तरह चलाता है। शाम को पैसा श्याम दास जी को दे दिया करता है। इसके अलावा श्याम सुन्दर जी ने कुछ होटल स्वामियों से भी मौखिक अनुबंध किए हुए हैं। उन होटलों में ठहरे  पर्यटकों को भी उक्त कार से भ्रमण करवाकर अच्छी- खासी कमाई की जाती है। यही नहीं, वे तो बैंक का कैश एक कस्बे से दूसरे कस्बे तक ले जाने के लिए भी अपनी उक्त निजी कार का ही इस्तेमाल करते हैं,  जबकि वैसा करना बैंक की नियमावलियों का सरासर उल्लंघन ही माना जाएगा।

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    सुरेश से श्याम सुन्दर जी के क्रिया- कलाप और कार्य- शैली के बारे में सुनकर मैं दंग रह गया कि एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत व्यक्ति भी ऐसा कर सकता है; लेकिन इस सच्चाई को जानकर मेरे मन को ज्यादा आघात पहुँचा कि  उक्त लाल कार उनकी निजी थी।

  मेरा मन कहने लगा कि उस दिन स्वयं को मेरा कद्रदान बतला रहे श्याम सुन्दर जी ने वे सारी झूठी बातें बनाने की बजाय अपने उस ड्राइवर से यह कहना चाहिए था कि ये तो हमारे स्टाफ के व्यक्ति हैं, इसलिए इनसे किराया लेने की कोई जरूरत नहीं। 

         मैंने तो हल्द्वानी तक जाने के लिए, बतौर किराये साठ रुपये किसी भी टैक्सी वाले को देने ही थे; यदि श्याम सुन्दर जी वैसा कहकर किराया लेने से मना कर भी देते तो भी मैं साठ रुपये उनके ड्राइवर को जबर्दस्ती थमा ही देता। 

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  नजर कुछ कमजोर हो जाने के कारण अब मैं लंबी दूरी की यात्राएँ  करते समय स्वयं कार ड्राइव करने से बचने लगा हूँ। 

  यह सरल- सी बात तो आप सभी आसानी से समझ सकते हैं कि कहीं जाने के लिए पूरी टैक्सी बुक करके जाना काफी महँगा पड़ता है। मेरे जैसे जरूरतमंद कई लोग रहे होंगे, उन्हीं में से कुछ जीनियस किस्म के व्यक्तियों ने कुछ वर्ष पहले इस समस्या का समाधान एक नया मोबाइल ऐप बनाकर निकाला,  जिसका उपयोग अब धड़ल्ले से किया जाने लगा है। इस ऐप से जुड़े निजी कार मालिक अपनी कार का नंबर उक्त ऐप पर शेयर कर देते हैं और यात्रा करने के इच्छुक व्यक्ति शेयर किराए के आधार पर कार - स्वामी के साथ गंतव्य तक की यात्रा का लाभ उठा सकते हैं। 

   रुद्रपुर से देहरादून जाने के लिए एक दिन  मैंने ऐसे ऐप के जरिए कार में अपनी सीट बुक की। कुछ देर बाद ही कार- स्वामी का नाम और मोबाइल नंबर मुझ तक पहुँच गया।

  कार स्वामी राहुल चौधरी को कॉल करके मैंने उनसे कहा कि क्या वे मुझे देहरादून में मेरे शिमला बाई पास स्थित आवास तक भी छोड़ देंगे,  तो उन्होंने कड़क आवाज में जवाब दिया कि मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगा। मैं कोई टैक्सी ड्राइवर नहीं हूँ कि लोगों को उनके घरों तक छोड़ता फिरूँ। …..मैं आपको देहरादून के आई.एस.बी.टी. बस अड्डे के पुल के पास उतार दूँगा; क्योंकि वहाँ पास ही में मेरा घर है । 

  मैंने सोचा कि चलो ठीक ही है;  यूँ भी तो ये बंदा कोई ज्यादा धनराशि नहीं माँग रहा है। आज के जमाने में साढ़े पाँच सौ रुपये की रकम कोई ज्यादा मायने नहीं रखती। आई.एस.बी.टी. बस अड्डे से पचास- साठ रुपये में ई-रिक्शा तय करके मैं अपने आवास पर पहुँच जाऊँगा। 

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         हमारा गाँव रुद्रपुर से हरिद्वार की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही, रुद्रपुर से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मैंने राहुल चौधरी जी को फोन करके कहा कि मैं उन्हें अपने गाँव के बाहर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित ढाबे के सामने खड़ा मिलूँगा। 

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 मेरे पास एक चौड़े मुँह वाला जूट का बैग था,  जिसमें मेरे नये कहानी- संग्रह की कई प्रतियों के अलावा और भी कई किताबें थी।

राहुल चौधरी की कार पहुँचने पर मैंने उनसे कार की डिक्की खोलने के लिए कहा,  ताकि मैं अपना बैग उसमें रख सकूँ।

 उन्होंने मेरे उक्त बैग को उठाकर कार की डिक्की में रखवाया। उसके बाद मैं आगे वाली सीट पर उनके बगल में बैठ गया। देखा कि कार में हम दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं है।

 मेरे कार के भीतर बैठते ही राहुल चौधरी जी ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या मैं कोई सेल्स- पर्सन हूँ। 

मुझे उनके द्वारा ऐसा कहा जाना अच्छा नहीं लगा। मैंने जवाब में “नहीं ” कहा और नाराजगी भरे लहजे में कहा, “आपने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं यहाँ-वहाँ सामान सप्लाई करने का काम करने वाला सेल्स - पर्सन हूँ?” 

   उत्तर मिला –“आपके बड़े से बैग में सामानों के कई पैकेट देखकर।”

यह सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा और मैंने राहुल चौधरी को अपने बारे में विस्तार से बतलाना शुरू किया कि उन्हें मेरा बैग देखकर मेरे बारे में गलतफहमी हो रही है कि मैं कोई सेल्स पर्सन हूँ,  जबकि मैं तो एक बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर बरसों तक कार्यरत रह चुका हूँ और उस पद से सेवानिवृत्ति के बाद पूरी तरह से साहित्य - सेवा में जुटा हुआ हूँ। मैं एक प्रतिष्ठित लेखक हूँ। कल ही मेरी कहानी की रिकॉर्डिंग आकाशवाणी केंद्र, देहरादून में होनी है, इसलिए आज मैं देहरादून जा रहा हूँ।….रही बात इस बैग में रखे पैकेटों की,  तो उन पैकेटों में मेरे हाल ही में प्रकाशित उस कहानी- संग्रह की कई प्रतियाँ हैं, जिसका विमोचन पिछले महीने देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में संपन्न हुआ है। उनके अलावा उक्त बैग में कुछ अन्य पुस्तकें भी हैं।

   मेरी बातें सुनकर राहुल चौधरी जी की के बोलने का लहजा बदल जाता है और उनके मुँह से यह सुनते हुए मुझे मिठास का अनुभव होता है, “ विद्यार्थी जीवन में कहानी और उपन्यास पढ़ने में मेरी भी बहुत रुचि थी। अब भी कभी- कभार पढ़ लेता हूँ ।...आप किस तरह के विषयों पर कहानियाँ लिखते हैं?...विद्यार्थी जीवन में मैं सोचा करता था कि क्या मैं कभी किसी लेखक से मिल सकूँगा। 

सच बतलाऊँ कि इस जिंदगी में आज पहली बार किसी लेखक से मिला हूँ। बहुत अच्छा लगा कि आज आप से मेरी भेंट हो गई।”

   राहुल चौधरी ऐसा कह तो रहे हैं; लेकिन मैं मन -ही- मन थोड़ा घबरा भी रहा हूँ। सोशल मीडिया से प्रायः इस तरह की जानकारी मिलती रहती है कि इस तरह किसी अनजान व्यक्ति के साथ अकेले सफर करने पर लूटपाट की घटनाएँ भी घटित हो जाती हैं। क्या पता यह व्यक्ति अपनी मीठी बातों का जाल मुझे फँसाने के लिए फेंक रहा हो। 

   इसी तरह की कई बातें सोचता हुआ मैं अपने भीतर और भी ज्यादा घबराहट महसूस करने लगता हूँ। कार एक ढाबे पर रुकती है,  तो मैं सोचता हूँ कि कुल चार-साढ़े चार घंटे के सफर में इस बंदे को भला कैसी भूख लग गई?  मैं सोच रहा हूँ कि चुपचाप अपना बैग उतार लूँ और किसी अन्य वाहन में बैठकर आगे की यात्रा शुरू करूँ। 

 तभी मैंने देखा कि ढाबे तक जाकर राहुल चौधरी तुरंत ही लौट आया है। उसने कहा- “कॉफी पीने की इच्छा थी,  पर वो तो यहाँ मिल ही नहीं रही। ….चलो छोड़ते हैं, अब देहरादून पहुँचकर ही अपने घर पर पियूँगा। 

  इसके साथ ही कार चल पड़ी।

   देहरादून पहुँचते- पहुँचते बादल घिर आए। तेज बारिश होने लगी। कार जब आई.एस.बी.टी. पुल के नीचे पहुँचती तो राहुल चौधरी ने मुझसे कहा, “एकाएक बहुत तेज बारिश होने लगी है। क्या आपको गाड़ी- वाड़ी से लेने कोई यहाँ पर आएगा?”

  मैं उन्हें जवाब दिया, “ नहीं, नहीं। मुझे लेने तो कोई नहीं आएगा; लेकिन मैं कोई ऑटो करके उससे अपने आवास पर चला जाऊँगा।”

  सहसा राहुल चौधरी के मुँह से मैंने जब यह सुना तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ, “ ऐसा करते हैं कि मैं ही आपको आपके घर तक छोड़ देता हूँ।”

 अपने आवास के गेट के सामने पहुँचने से पहले मैंने मन-ही-मन में तय कर लिया था कि इस बंदे के साथ साढ़े पाँच सौ रुपये किराया तो पहले से तय है ही, इसके अलावा यदि मैं अपने आवास तक के लिए कोई भी ऑटो करता,  तो मुझे उसे कम - से - कम डेढ़ सौ रुपये तो देने ही पड़ते। अतएव मैं कुल मिलाकर सात सौ रुपये का भुगतान इस बंदे को कर दूँगा। कुछ ना- नुकुर करेगा,  तो पचास रुपये और दे दूँगा। 

  मैं अपने आवास के सामने कार से उतरता हूँ। कार - स्वामी से पूछता हूँ – “बतलाइए कि आपको कुल कितने रुपये दे दूँ?”

 जवाब मिलता है, “ नहीं,  नहीं रुपये देने की कोई जरूरत नहीं है। आज मुझे एक लेखक के साथ सफर करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है।”   

   मैं अपने बैग में से निकालकर अपने कहानी- संग्रह की एक प्रति उन्हें भेंट करता हूँ।

         राहुल चौधरी जी कहते हैं– “ऑटोग्राफ प्लीज।”■

             Email-   gambhir.palni@gmail.com


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