- रेखा शाह आरबी
आजकल अपने देश में हर किसी को चमचे की आदत पड़ चुकी है । किसी भी घर में चले जाइए, चमचे दिख ही जाते हैं। गरीब से गरीब आदमी के घर में भी अब तो चमचों ने अपना स्थान बना लिया है। चमचे रखने का अलग बर्तन रहता है । इन्हें सभी बर्तनों के साथ नहीं रखा जा सकता है; क्योंकि जरुरत के वक्त मिल नहीं पाते हैं; इसीलिए इनको अलग रखा जाता है कि जब जैसी जिसकी जरूरत पड़ी, निकालकर इस्तेमाल कर लिया।
लेकिन चमचे अपने देश का कल्चर नहीं है । यहाँ पर तो हम सब पहले अपने हाथों से ही खाने के आदि थे ।उसके लिए चमचों वगैरा का सहारा नहीं लेना पड़ता था। हाथ से खाना सेहत के लिए अच्छा भी था, साफ- सुथरा था। और सबका अपना- अपना हाथ रहता था। सब आत्मनिर्भर थे।
पर यह करमजले अंग्रेज आए और काँटे, छुरी, चमचे की परंपरा लेकर आए और चमचों की आदत लगा गए। कुछ अमीर नकलचियों ने अंग्रेजों की नकल करके काँटे- चमचे- छुरी से खाना प्रारंभ कर दिया। उनकी देखा- देखी अब क्या अमीर और क्या गरीब, सब अपने हाथों से खाना छोड़कर काँटे, छुरी, चमचे से खाने के लिए ही मरे जा रहे हैं। इस तरह चमचे हर घर का हिस्सा बन गए।
चमचों की खपत केवल घरों में ही नहीं होती है; बल्कि चमचों की सबसे ज्यादा खपत राजनीति में होती है। जितनी राजनीति में चमचों की खपत होती है, उतनी शायद ही किसी और क्षेत्र में होती हो। जैसे दुल्हन के सोलह सिंगार होते हैं, वैसे ही चमचा नेता का शृंगार होता है। नेता का पहला और आखिरी शृंगार चमचा ही होता है। नेता बिना चमचों के कांतिहीन और तेजहीन लगने लगते हैं। तो इस तरह कह सकते हैं कि नेता का लाली लिपस्टिक, पाउडर, आई लाइनर, मस्कारा, फाउंडेशन सब कुछ चमचे ही होते हैं। वही उसको चमकाते हैं।
और यदि किसी नेता ने यह शृंगार करने से मना किया, तो जनता उन्हें नेता मानने से मना कर देती है। जनता विश्वास ही नहीं कर पाती है कि भला व्यक्ति एक सम्मानित नेता है, जब तक नेता की गाड़ी के पीछे चमचों की 8 -10 गाड़ियाँ न हों। चाहे या अनचाहे अब जरूरत भी है और जरूरी भी है। चमचे को मना नहीं किया जा सकता है।
नेता चाहे जितना भी जमीन से जुड़ा हुआ हो, ईमानदार हो, चाहे बेईमान हो। पावर में हो या बिना पावर के हो, चमचा तो उसके पास रहता ही है। जिस तरह समोसा बिना आलू का नहीं हो सकता है, उसी तरह नेता भी बिना चमचे का नहीं हो सकता है। नेता यदि राजनीति के दुकान का मालिक है, तो उसके चमचे उसकी दुकान के सेल्समेन है। भला कोई भी दुकान बिना सेल्समेन के कैसे चल सकती हैं। चमचा जनता और नेता के बीच का पुल होता है।
राजनीति में तो चमचे का इतना महत्त्व है कि नेता यदि फटे हुए कपड़े पहन ले; लेकिन उसके आसपास चमचों का मेला लगा हुआ है, तो वह अपने आप को सबसे बेहतर सुन्दर मानता है। चमचे ही तो नेताजी को बताते हैं कि वे कितने महान हैं। वे जनता के भगवान हैं। यह बात नेता और जनता दोनों को चमचे ही बताते हैं। अगर वे न बताएँ, तो जनता को पता ही नहीं चले कि कौन सा नेता, कितना महान है। जनता की तो बात छोड़िए खुद नेता को भी पता नहीं चले। अतः नेताजी खुद कितने अच्छे हैं- यह बात जानने के लिए वह चमचों पर निर्भर रहते हैं। और चमचे बाकायदा सुबह- शाम उन्हें इस बात से अवगत कराते रहते हैं।कभी-कभी चमचे जिस बर्तन में रहते हैं, उसी को खाली कर देते हैं। यह उनके साथ बहुत बड़ी समस्या है। कूड़े का स्वभाव होता है कि जिधर की हवा बहती है वह उधर ही उड़ता है। चमचों का भी यही स्वभाव होता है। जिधर की हवा बहती है, वे उधर के हो जाते है; इसीलिए चमचों का चुनाव भी बहुत होशियारी से करना पड़ता है। वरना लेने के देने नेताजी को पड़ना तय है।
चमचा दुधारी तलवार है। वह जिस बर्तन में रहता है, उसको खाली भी कर सकता है, उसको भर तक भी सकता है। जब चमचे का चुनाव करें, तो बहुत सोच समझ कर करें; क्योंकि चमचे का कभी कुछ बिगड़ता नहीं है। वह जिस भी बर्तन में रहता है उसी बर्तन का सगा बन जाता है। बर्तन को यह सोचना है कि उसमें रखा हुआ चमचा उसका कितना सगा है; क्योंकि पावर में कोई भी रहे, चमचों की हमेशा चाँदी रहती है। राज तो यही करते हैं।
अतः चमचों के महत्व को देखते हुए नेता जन को कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-
चमचे का चुनाव करते समय नेताओं को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे- चमचा इतना तेज तर्रार होना नेता जी के बयान देने से पहले ही चमचा ताली बजा दे और तालियाँ बजवा दे। और मूर्ख इतना होना चाहिए कि नेताजी गड्ढे में कूदें, तो वह उनके साथ ही गड्ढे में कूद जाए। अपने कपड़ों की बिना परवाह किए हुए।
चमचा इतना स्वामी भक्त होना चाहिए कि जैसे सैटेलाइट अपने ग्रह के ही चारों ओर चक्कर लगाती हैं,वैसे ही वह सिर्फ उनकी ही परिक्रमा करता रहे। अगर किसी और की परिक्रमा करने लगे, तो अपनी कक्षा से बाहर फेंकने में नेता को देर नहीं करनी चाहिए ।
नेताजी चाहे कुकुरासन में हो, शवासन में हो या जिस भी आसन में हो- चमचे को अपनी वाक कुशलता से जनता को यह उनकी खूबी बताने का ढंग आना चाहिए, तभी उनका साम्राज्य सलामत रह सकता है।
राजनीति की दुकान दो ही चीजों से चलती है एक तो वादों के और दूसरे चमचों के इरादों से, तो अपने चमचों के इरादों पर भरपूर नज़र रखनी चाहिए और उन्हें खिलाते- पिलाते रहना चाहिए, ताकि वह पलटू राम न बन सके।
चमचों का इतिहास है कि जहाँ कुर्सी है, वहीं पर चमचा-समूह रहता है; इसीलिए चमचों को बाँधकर रखना बहुत ही मुश्किल है । उन्हें बस फायदे की मजबूत डोर से ही बाँधकर रखा जा सकता है । नेता को सिर्फ अपने फायदे के बारे में नहीं चमचों के फायदे के बारे में भी भरपूर सोचना चाहिए।
अगर ये सुझाव अमल में लाए जाएँ, तो नेता के नेतागिरी की दुकान कभी भी बंद होने की नौबत नहीं आएगी।
-नेता हित में जारी। ■
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