- सन्तोष सुपेकर
“चलो, ओके मुकेश भैया” -चाय की दुकान के मालिक कमलेश सेठ का स्वर उसे बहुत पीड़ा दे गया, “पहुँचो कहीं और। कोई और काम देख लेना अब। ओके?”
“जी सेठ जी, राम राम।”
आज रोड के उस पार की विशाल बहुमंज़िला इमारत, जिसमें अनेक दफ्तर, दुकानें थीं, गिरा दी गई थीं और इसी कारण बन्द हो गई उसकी चाय की दुकान भी, जहाँ वह पिछले चार सालों से नौकर था और दिन भर चाय के गिलास भर- भरकर, ग्लास स्टैंड में रखकर, सामने की इस बड़ी इमारत में चक्कर लगाता रहता था।
और इतने वर्षों में चाय के भरे अधभरे गिलासों वाला स्टैंड ले- लेकर कई– कई बार इस व्यस्त रोड को पार करना, इमारत की चारों मंज़िलें बार- बार चढ़ना उतरना उसे कभी भारी नहीं पड़ा।
“और आज सब खत्म हो गया!” ख्यालों से निकलकर खाली हाथ वह बाहर आया और रोड क्रॉस करने लगा ।
“अरे? ये क्या?” रोड उसे आज पहली बार बहुत ज्यादा व्यस्त लग रहा था और चाहते हुए भी वह रोड पार नहीं कर पा रहा था। ” कोई जुलूस– उलूस निकला है क्या इधर से?” सोचता हुआ वह बार- बार रोड के बीच जाने लगता और बार- बार घबराकर पीछे हट जाता ।
ऐसा करते हुए काफी देर हो गई थी उसे और अब तो आते जाते लोग भी उसे मूर्ख समझ घूरने लगे थे ।
“ये क्या हो रहा है आज? क्या किया जाए अब? ” परेशान- सा वह सोच ही रहा था कि तभी कुछ सूझा उसे, और उसने गर्दन हिलाई, “ओह हाँ, ये ठीक रहेगा!” फिर उसने अपने सीधे हाथ को नब्बे डिग्री मोड़ा और महसूस किया कि उसके हाथ में ग्लास स्टैंड है, जिसमें कुछ भरे, कुछ खाली चाय के गिलास रखे है। हाथ पर कुछ वजन- सा महसूस होते ही एकाएक उसे, व्यस्त सड़क खाली- सी दिखाई देने लगी और फिर हाथ मोड़कर , बड़े आराम से वह सड़क पार कर गया... , पिछले सुनहरे दिनों की तरह।■
सम्पर्कः 31, सुदामा नगर, आगर रोड़, उज्जैन, मो. 942481609

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