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Feb 1, 2026

कविताः कविता करने के लिए...

  -  डॉ. रमाकांत गुप्‍ता

     जो भी लिखता हूँ कविता बन जाती है।

     पर कब?

     जब किसी मेट्रो शहर के 

     किसी रेलवे स्टेशन पर

     कचरे के ढेर में से 

     सड़ी हुई पावरोटी निकाल कर

     किसी असहाय को देखकर 

     मन में वेदना उद्वेलित होती है,

     उस समय

     तो जो भी लिखता हूँ कविता बन जाती है । 1।


    जब दस घंटे मेहनत कर 

    कोई मजदूर 

    दिहाड़ी के सिर्फ चार सौ माँगता है

    उस रात और अगली सुबह के दो जून के खाने के लिए 

    और नोटों की गड्डी लिए अकड़ता हुआ सेठ

    परवाह किए बिना 

    अगले दिन के लिए टाल देता है

   उस समय 

   उस बेबस को जो टीस सताती है,

   उसे देख 

   जो भी लिखता हूँ वह कविता बन जाती है । 2।


  जब किसी बर्बर बलात्कारी को

  सबूतों की कमी के कारण  

   कोर्ट बरी कर देता है

   तब 

  वह बेबस महिला जो आह निकालती है

  उसे देख  

  जो भी लिखता हूँ वह कविता बन जाती है । 3।


 अब समझ में आया, 

 कविता करने के लिए-

 न पीएचडी की उपाधि, 

 न भाषा में पारंगतता, 

न रस, छंद, अलंकार , 

 न और कोई निपुणता,

 नहीं चाहिए कोई पांडित्य, 

 नहीं चाहिए अशुद्ध वर्तनी के लिए माफी,

 कविता करने के लिए 

 सिर्फ 

एक संवेदनशील हृदय ही है काफी ।4।

मोबा. 9820414276,  ईमेल drramakant2000@gmail.com

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