पुस्तकः बिजुरी, लेखक: नवनीत नीरव और काजल कुमारी,
चित्रकार: अन्नादा मेनन, प्रकाशक: रूम टू रीड इंडिया ,पृष्ठ: 32
नवनीत नीरव और काजल कुमारी की चित्रकथा बिजुरी रूम टू रीड से प्रकाशित पहली दृष्टि में एक सरल ग्रामीण परिवेश की पशु-कथा प्रतीत होती है; किंतु गहराई से पढ़ने पर यह हमारे समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक प्रश्नों से संवाद करती दिखाई देती है।
चित्रकार अन्नादा मेनन के सशक्त दृश्यात्मक चित्रकारी से यह कहानी संवेदना, असुरक्षा, ईर्ष्या और सह-अस्तित्व की जटिल भाव-भूमि रचती है। इनके चित्र कहानी के भाव-संसार को विस्तार देते हैं। अँधेरी रात का भय, बच्चों की खुसर-फुसर, कीचड़ में धँसी बिजुरी, साथ सोते पाँचों बच्चे चित्रकथा को संवेदनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। रंगों का चयन वातावरण के अनुरूप है।
कहानी की शुरुआत ठंडी, बरसाती और भयाक्रांत रात से होता है। वातावरण में असुरक्षा है आवारा कुत्तों का आतंक, मौसम की मार और जीवित रहने की चिंता। इसी पृष्ठभूमि में गेंदा मादा सूअर को नीलगाय का एक असहाय बच्चा मिलता है। और अपने बाड़े में ले आती है। यहाँ कहानी केवल दया का प्रसंग नहीं रचती, बल्कि मातृत्व की सीमाओं का विस्तार करती है।
बाड़े में बिजुरी का आगमन गेंदा के बच्चों के लिए सहज नहीं है।
“ये हमारी अम्मी हैं, तुम्हारी नहीं!”
यह संवाद स्वामित्वबोध और असुरक्षा को उजागर करता है। यहाँ लेखक बालमन की जटिलता को ईमानदारी से प्रस्तुत करते हैं। नए सदस्य का स्वागत करने के बजाय बच्चे ईर्ष्या और दूरी दिखाते हैं। दूध मिलने जैसी घटना भी भेदभाव का प्रतीक बन जाती है। यह प्रसंग समाज में संसाधनों की असमानता और ‘विशेषाधिकार’ की भावना को दिखाती है।
कहानी की भाषा सरल और संवादप्रधान है। लेखक ने अनावश्यक वर्णन से बचते हुए दृश्यात्मकता को प्राथमिकता दी है, जिससे चित्रों की भूमिका और प्रभाव बढ़ जाता है।
आज हम जिस तरह से अछूते नहीं है। जिस तरह से भारतीय समाज में गाय और सुअर केवल पशु नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक भी हैं। गाय को पवित्रता से जोड़ा जाता है, जबकि सुअर को कई समुदायों में अपवित्र समझा जाता है। पवित्रता के आधार पर पहचान और विभाजन का खेल रचे जाते हैं।
ऐसे समय में एक सूअर द्वारा गाय-वंश के बच्चे की रक्षा और परवरिश का दृश्य अत्यंत अर्थपूर्ण रूपक बन जाता है। कथा बिना प्रत्यक्ष टिप्पणी किए यह संकेत देती है कि जीवन की रक्षा और करुणा का मूल्य धार्मिक प्रतीकों से बड़ा है। यहाँ पवित्र और अपवित्र की सामाजिक धारणाएँ अप्रासंगिक हो जाती हैं। शेष रह जाता है केवल जीवन।
यह कहानी किसी विचारधारा का नारा नहीं लगाती। बल्कि सहज कथा-प्रवाह में यह प्रश्न उठाती है कि क्या मनुष्य द्वारा निर्मित विभाजन प्रकृति के स्तर पर निरर्थक नहीं हैं?
कहानी भावनात्मक स्तर पर परतदार है। बाल पाठक इसे एक रोमांचक कथा की तरह पढ़ सकता है, जबकि वयस्क पाठक इसके भीतर सामाजिक अर्थों को देख सकता है।
बिजुरी बाल साहित्य की उस परंपरा में रखी जा सकती है, जहाँ पशु-पात्रों के माध्यम से मानवीय समाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत किया जाता है। यह कहानी करुणा, स्वीकृति और सह-अस्तित्व का संदेश देती है, बिना किसी वैचारिक आग्रह के।
आज के विभाजित सामाजिक वातावरण में यह कहानी एक शांत, सौम्य और मानवीय हस्तक्षेप की तरह सामने आती है। यह बच्चों को केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें यह बताती है कि भिन्नता भय का कारण नहीं, बल्कि विस्तार का अवसर हो सकती है।
यह दृश्य तारों भरे आकाश के नीचे पाँचों बच्चों का साथ सोना मानो यही कहता है:
जीवन तब सुंदर है, जब हम साथ हों।
इस किताब को इस लिंक में पढ़ सकते है -
https://literacycloud.org/stories/7655-bijuri
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समीक्षक के बारे में -
कुँवर सिंह, किताबें पढ़ने के शौकीन हैं। किताबों के बारे में खूब बातचीत करना पसंद करते हैं। वर्तमान में एकलव्य के प्रकाशन कार्यक्रम में किताबों को पाठकों तक पहुँचाने के काम से जुड़े हैं। साथ ही एकलव्य के “लाइब्रेरी से दोस्ती” कोर्स टीम के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं। पराग टाटा ट्रस्ट के लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स के 2021 बैच के साथी हैं। किताबों की समीक्षाएँ “द बुकरिव्यु पत्रिका”, “उदंती.कॉम मासिक पत्रिका के अगस्त 2022” और “एडुकेशन मिरर” में प्रकाशित हुई है। तीन कविताएँ “हमारी बात”, “समय”, और “सुना, फिर से” समकालीन जनमत पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं।

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