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Apr 1, 2026

कविताः पर मेरे हुए तो नहीं

 - सुरभि डागर 

   तुम मेरे थे पर मेरे हुए तो नहीं 

   बाँधा था  गंठबंधन पिया, 

   पर तुम बँधे तो नहीं।

   साथ चलना था सातों जनम

   कदम, दो कदम भी  चले तो नहीं 

   मैं आहुति बन स्वाहा हुई 

   तुम मंत्रों के संग हवन 

   हुए तो नहीं।।

   अधूरी रहीं मेरी चूड़ियाँ

   तुम चूड़ी के संग कंगन हुए तो नहीं।।

   बजती रही  पायल मेरी तनहाई में

   तुम पायल के घुँघरू हुए तो नहीं।

   अमावस्या की रातें हुई हैं बहुत 

   तुम पूर्णिमा की रात हुए तो नहीं।

   ज़ख्म गहरे लगे पाँव थमते नहीं 

   तुम मरहम हुए तो नहीं।।

   तुम मेरे थे; पर मेरे हुए तो नहीं।।

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