- डॉ. भावना तिवारी
1. अवसादों का बंद पिटारा
आज शाम की
चाय
साथ में पी लें हम।
जुड़े रहें, आँगन- दीवारें
घर- परिवार बनाने में,
आधी उमर बिता दी हमने
रूठे हुए मनाने में,
बेगाने जैसे अपनों से
दुआ-सलाम निभाने में।
आओ कुछ पल
अपनी ख़ातिर
जी लें हम।
वंदनवारों के फूलों से
आँसू लड़ते रहते हैं,
मुस्कानों से मुँह मोड़े हैं
किस पीड़ा में दहते हैं,
पर्दों के पीछे के जाले
उदासीनता सहते हैं।
अवसादों का
बंद पिटारा,
खोलें हम ।
कितनी बार
प्रताड़ित सपने
बीच राह में छोड़े हैं,
रिश्ते-नाते मूल न देते
जीवन के दिन थोड़े हैं,
खुद पर भी कुछ
ख़र्च करें अब
पेट काट जो जोड़े हैं।
ऋण में डूबी
फ़टी चादरें
सी लें हम।।
पिया तुम
घड़ी आज न देखो
बैठो मेरे पास।
सुइयों के संग
चलता जीवन
पहियों पर कटता है।
जाड़ा, गर्मी
या वर्षा हो
सफ़र नहीं घटता है।
दौड़-भाग छोड़ो जी ले लो
आकस्मिक अवकाश।
मुट्ठी में दुनिया है; लेकिन
दूर हुए सपनों से
मिलियन, बिलियन
फॉलोअर पर
नहीं मिले अपनों से।
खुलती जाए मन की सींवन
रफ़ू करो विश्वास।
अवधि पीर की
बढ़ती जाती
घर -बाहर में उलझे,
निर्धारित साँचों में
ढलकर
खिंचे -खिंचे हैं
मंझे।
नीम चढ़े रिश्ते में घोलें
बतरस सुखद सुवास।


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