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Apr 1, 2026

दो नवगीतः

 -  डॉ. भावना तिवारी

1. अवसादों का बंद पिटारा

आज शाम की
चाय
साथ में पी लें हम।
 
जुड़े रहें, आँगन- दीवारें
घर- परिवार बनाने में,
आधी उमर बिता दी हमने
रूठे हुए मनाने में,
बेगाने जैसे अपनों से
दुआ-सलाम निभाने में।
 
आओ कुछ पल
अपनी ख़ातिर
जी लें हम।
 
वंदनवारों के फूलों से
आँसू लड़ते रहते हैं,
मुस्कानों से मुँह मोड़े हैं
किस पीड़ा में दहते हैं,
पर्दों के पीछे के जाले
उदासीनता सहते हैं।
 
अवसादों का
बंद पिटारा,
खोलें हम ।
 
कितनी बार
प्रताड़ित सपने
बीच राह में छोड़े हैं,
रिश्ते-नाते मूल न देते
जीवन के दिन थोड़े हैं,
खुद पर भी कुछ
ख़र्च करें अब
पेट काट जो जोड़े हैं।
 
ऋण में डूबी
फ़टी चादरें
सी लें हम।।

2. आकस्मिक अवकाश

पिया तुम
घड़ी आज न देखो
बैठो मेरे पास।
 
सुइयों के संग
चलता जीवन
पहियों पर कटता है।
जाड़ा, गर्मी
या वर्षा हो
सफ़र नहीं घटता है।
दौड़-भाग छोड़ो जी ले लो
आकस्मिक अवकाश।
 
मुट्ठी में दुनिया है; लेकिन
दूर हुए सपनों से
मिलियन, बिलियन
फॉलोअर पर
नहीं मिले अपनों से।
 
खुलती जाए मन की सींवन
रफ़ू करो विश्वास।
 अवधि पीर की
बढ़ती जाती
घर -बाहर में उलझे,
निर्धारित साँचों में
ढलकर
खिंचे -खिंचे हैं
मंझे।
 
नीम चढ़े रिश्ते में घोलें
बतरस सुखद सुवास।

10 comments:

  1. Anonymous03 April

    बहुत सुंदर। सुदर्शन रत्नाकर

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  2. इन दोनों कविताओं को पढ़ना मानो मन के भीतरी कक्षों की यात्रा करना है। कवियित्री ने अत्यंत सरल, सहज और आत्मीय भाषा में जीवन की जटिलताओं, रिश्तों की थकान, और मन की अनकही पीड़ाओं को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है कि पाठक स्वयं को उन पंक्तियों में कहीं न कहीं उपस्थित पाता है।

    ‘अवसादों का बंद पिटारा’ कविता घर-परिवार, रिश्तों और सामाजिक औपचारिकताओं के बीच दबे हुए मन की पुकार है। इसमें वर्षों तक दूसरों के लिए जीते-जीते स्वयं से दूर हो जाने की पीड़ा को बहुत मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। “आओ कुछ पल अपनी खातिर जी लें हम” जैसी पंक्तियाँ पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं। कविता यह संदेश देती है कि जीवन की भागदौड़ में अपने मन के ‘बंद पिटारे’ को खोलना भी उतना ही आवश्यक है जितना दूसरों के लिए जीना।

    ‘आकस्मिक अवकाश’ कविता आधुनिक जीवन की भागमभाग और समय की निरंतर दौड़ के बीच ठहरने की एक मधुर विनती है। “पिया तुम घड़ी आज न देखो, बैठो मेरे पास” जैसी पंक्तियाँ रिश्तों में समय देने की आवश्यकता को बहुत सुंदरता से व्यक्त करती हैं। सोशल मीडिया के ‘मिलियन-बिलियन फॉलोअर्स’ के बावजूद अपनों से दूरी का भाव आज के समय की सच्चाई को सटीक रूप से दर्शाता है। कविता पाठक को याद दिलाती है कि विश्वास, संवाद और साथ बिताया समय ही रिश्तों की असली मरम्मत है।

    दोनों कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरलता में गहराई है। भाषा में अनावश्यक अलंकरण नहीं, बल्कि भावों की सच्चाई है। चित्रात्मकता ऐसी है कि “वंदनवारों के फूलों से आँसू लड़ते रहते हैं” या “खुलती जाए मन की सींवन, रफ़ू करो विश्वास” जैसी पंक्तियाँ मन में स्थायी छाप छोड़ जाती हैं।

    समग्र रूप से, ये कविताएँ केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए हैं। ये पाठक को ठहरने, सोचने, और अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं। रिश्तों में संवाद, स्वयं के लिए समय, और मन की गांठों को खोलने का संदेश अत्यंत सकारात्मक और जीवनोपयोगी है।

    यह रचनाएँ संवेदनशील मन की सशक्त अभिव्यक्ति हैं, जो पाठक के हृदय को छूकर उसे भीतर से समृद्ध करती हैं।

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  3. Anonymous15 April

    बहुत सुंदर!- रीता प्रसाद

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  4. Anonymous15 April

    भाव जगत को आलोड़ित करते बहुत मोहक नवगीत। दोनों ही नवगीत मन की गहराईयो मे उतर गए। बधाई भावना जी -शिवजी श्रीवास्तव

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  5. Anonymous16 April

    Very nice expression of human feelings, congratulations Mam.
    Purshottam Shrivastava 'Puru'.

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  6. डाॅ भावना जी के दोनों नवगीत प्रभावशाली हैं। जीवन की भागदौड़, उठा-पटक के मध्य कुछ पल अपने लिए जीने की इच्छा को बहुत उत्कृष्टता के साथ शब्दों में पिरोया गया है। "पिया तुम घड़ी न देखो आज" जैसी रचना हर भावुक मन की पुकार सी लगी! स्नेह, प्रेम को जीने के लिए कुछ समय अपने लिए भी निकालने की इच्छा की सार्थक अभिव्यक्ति पढ़कर मन प्रसन्न हो गया! हार्दिक बधाई!

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  7. Anonymous17 April

    भावना तिवारी जी के दोनों नवगीत बहुत भावपूर्ण। उन्हें हार्दिक बधाई।
    विभा रश्मि

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  8. राजेन्द वर्मा17 April

    'ऋण मे डूबी
    फटी चादरें
    सी लें हम.
    सुंदर अभिव्यक्ति, बधाई डॉ भावना जी

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  9. Anonymous22 April

    दोनों नवगीत वर्तमान के जीवन-क्षणों का लयबद्ध अनुगायन हैं। भावना जी बहुत अच्छी नवगीतकार है। बधाई

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