September 26, 2013

पुस्तक

घर-परिवार की धूप-छाँव तले सुखद शाम

-       प्रांजल कुमार

'घर परिवार' कल्याणी केशरवानी जी की पहली प्रकाशित कृति है। हालांकि अस्सी और नब्बे के दशक में उनके पारिवारिक आलेख पत्र पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक उन्हीं आलेखों का संग्रह है। उनके आलेखों में अपने और आस-पास घटने वाली घटनाओं का सहज सरल विश्लेषण और निराकरण होता है ,जिससे आम पाठक उसे अपने परिवार की समस्या मानकर खुश हो जाता था। घर है तो परिवार है ... और घर -परिवार में चार बर्तन है तो उसमें टकराव होगा ही। परिवार में इगो, मतभेद, शंका-कुशंका और पति-पत्नी के झगड़े धीरे-धीरे इतने विकराल हो जाते हैं कि परिवार बिखर जाता है  और कभी कभी तो इसके दुष्परिणम होते हैं। दहेज, भौतिक सुख -सुविधा की अनुलब्धता, बच्चे नहीं हुए या लड़के की चाह में लड़कियों की फेहरिस्त आदि अनेक कारणों से परिवार में अशांति हो जाती है और परिवार में पति-पत्नी अजनबी जैसे रहने के लिए मजबूर होते हैं। किसकी चाह नहीं होती कि उसका पति उसक बेइन्तिहा चाहता रहे, उसकी हर चाहत को खुशी खुशी पूरी करे लेकिन न जाने ऐसा क्या होता है कि यह चाहत धरी रह जाती है। रोज-रोज की छोटी-छोटी समस्याएँ विकराल रूप धारण करके परिवार की शांति में जहर घोल देता है। दिन भर के कामकाज के बाद दो घड़ी का सुकून और प्रेम -भरा साथ भी दूभर हो जाता है ; क्योंकि वही चाहत जो कभी एक दूसरे के लिए थी, अब कुछ और चाहने लगता है। इसके लिए लेखिका का सुझाव है कि वैवाहिक सम्बन्धों को मधुर बनाए रखने और पति-पत्नी को खुश रखने की दिशा में सबसे कारगर उपाय है संयम। गुस्सा किसे नहीं आता और जब आता है तो दूध के उफान की तरह। मुँह से निकली बातें तरकश से निकले तीर की तरह वापस नहीं आती। ऐसे समय में संयम से काम लिया जाए ,तो बात नहीं बिगड़ नहीं पाती। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में संयम अधिक होता है। घर को घर बनाए रखने की चिंता भी उसी को अधिक होती है।
आज के भौतिकतावादी युग में जहाँ पति-पत्नी दोनों को घर की चार दीवारी को लाँघने पर मजबूर कर दिया ,वहीं परिवार को बड़े बूढ़ों और बच्चों से अलग कर दिया है। संयुक्त परिवार की बात अब कपोल कल्पित लगते हैं। पत्नी सारा दिन खटने के बाद जब घर लौटती है तो बच्चे-बूढ़े सब अपना बोझ उनके साथ शेयर करने को बेताब रहते हैं। थोड़ा- सा खाली समय जिसमें बच्चों की देखरेख और ममता चाहिए, पति को सेवा चाहिए, परिवार को व्यवस्था चाहिए और अतिथियों को सत्कार...। थके पाँव, सीमित समय और चारों ओर व्यस्तता, ऐसे में सुखद शाम की बात धरी की धरी रह जाती है। बड़े बुजुर्गो की अनुभवी झिड़की और बच्चों को मन लुभावनी शरारतें भी बोझ लगने लगता है।
प्रस्तुत पुस्तक 'घर परिवार' में 28 पारिवारिक आलेख संगृहीत हैं जो परिवार की विभिन्न समस्याओं को लेकर लिखी गयी है। अपने आलेखों में कल्याणी जी ने सुखी और समृद्ध परिवार के लिए महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं ,जो घर परिवार के छाँव तले सुखद शाम की बात को साकार करती है। इससे यह पुस्तक हर घर और परिवारजन के लिए उपयोगी बन गई है। घर परिवार को रेखांकित  करता पुस्तक का मुख पृष्ठ । इसे और आकर्षित बनाता है।


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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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