September 26, 2013

कविता


सज्जन कितना बदल गया है


- लाला जगदलपुरी

दहकन का अहसास कराता,
चंदन कितना बदल गया है;
मेरा  चेहरा मुझे डराता,
दरपन कितना बदल गया है!

            आँखों ही आँखों में
            सूख गयी हरियाली अंतर्मन की;
            कौन करे विश्वास कि मेरा
सावन कितना बदल गया है! 

पाँवों के नीचे से खिसक-
खिसक जाता-सा बात-बात में;
मेरे तुलसी के बिरवे का
आँगन कितना बदल गया  है!

            भाग रहे हैं लोग मृत्यु के
            पीछे-पीछे, बिना बुलाये;
            जिजीविषा से अलग-थलग यह
            जीवन कितना बदल गया है!

प्रोत्साहन की नयी दिशा में
देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ;
दुर्जनता की पीठ ठोंकता
सज्जन कितना बदल गया है!

 ( काव्य-संकलन मिमियाती ज़िंदगी दहाड़ते परिवेश से) 

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