July 12, 2018

व्यंग्य

भरोसे का आदमी
 - सुशील यादव
भरोसे का आदमी ढूँढ़ते मुझे साढ़े सत्तावन साल गुजर गए। कोई मिलता नहीं। मार्निग वाक् वालो से मैंने चर्चा की। वे कहने लगे यादव जी....  'लगे रहो.... उनके 'लगे-रहोमें मुझे मुन्ना-भाई का स्वाद आने लगा। मैंने सोचा गनपत हमेशा कटाक्ष में बोलता है। उसकी बातों की तह में किसी पहेली की तरह घुसना पड़ता है।
हममें से कई मार्निग-वाकिये, उनकी कटाक्ष पहेली सुलझाने में या तो अगले दिन की वाक् की प्रतीक्षा करते हैं, या ज्यादा बेसब्रे हुए लोग उनके घर शाम की चाय पी आते हैं। गनपत को इनकी 'अगुवाईचार्जशायद महँगा लगे, मगर भाभी जी, बिन बुलाए को झेलते वक्त जरूर ताने देती होंगी। किचन, ड्राइंग से लगा हुआ होने से गृहणियों को अनेक फायदा होने की, बात में बहुत दमदार असर है। एक तरीके से वे बैंक-लोन,इंश्योरेंस और पास-पड़ोसियों की, गतिविधियों की श्रोता बन कर, अपनी किटी-पार्टी को ज्ञान की लेटेस्ट किश्त जमा करती हैं।
अगली सुबह गणपत 'बातो का एसिड टेस्ट-किटलिए मिला।
यादव जी, आपने बताया नहीं, किस फील्ड में भरोसा चाहिए...? यानी आदमी...
वो स्वस्फूर्त केटेगरी-वाचन में लग गए। देखिये अभी इलेक्शन, नजदीक है नहीं, लिहाजा मानकर चलें कि इस मकसद से दरकार नहीं होगी।
वैसे हमारे पास दमदार ख़ास इसी काम के बन्दे हैं। जबरदस्त भरोसेदार।
आपने फार्म भरा नहीं कि ये शुरू हो जाते हैं।
निर्वाचन-सूची का पन्ना-प्रमुख बनकर, हर पन्ने के आठ-दस लोगों की कुटाई, उठाई और धमकाई वो जबरदस्त कर देते हैं  किउस पन्ने का पूरा मोहल्ला-मेंबरएक तरफा आपको छाप आता है। ये जीत की गारंटी वाले लोग हैं। हमेशा डिमांड में रहते हैं। आपको अगर अगला मेयर लड़ना हो तो बात करूँ ...?
मैंने झिझकते हुए कहा...नहीं  इस किस्म की जरूरत आन पड़ी ,तो जरूर कहेंगे।
वे हुम, करके अगले टेस्ट की ओर बढे, आपको छोटे- मोटे काम जैसे माली- चौकीदार वगैरा चाहिए ,तो मैं बलदाऊ, अरे वर्मा  जी को बोल दूँगा। वे भी इन्तिजाम- मास्टर हैं। भेज देंगे। वे और खुलासा, भरोसा-भेद प्रवचन में लगे थे ,जो शेष घुमन्तुओं के मर्म में उतर रहा था।
मुझे मन ही मन अपने हाथ, गलत जगह डाल दिए होने का शक हुआ। मैंने वाक् में हाथ को झटके दिए।
कहा गणपत भाई, भरोसे का आदमी, जैसा आपने इलेक्शन पन्ना- प्रमुख टाइप बयान किया हमारे लिए मिसफिट है। जिनकी बुनियाद ही धमकी-चमकी वाली हो, वे हमारे काम के नहीं हो सकते। 
उन्हें, जैसे हमने खरीदे या इंगेज किए हैं, वैसे ही कहीं ऊँची बोली या पैसो पर पलट भी तो सकते हैं...?
वे मेरी तार्किक- समझदारी की बात को गौर करने के बाद कहने लगे, आप सही फरमा रहे हैं। हमें किसी ऐंगल से समझौता  करना  तो पड़ेगा...?
अगर सभी, इसी सोच के हों तो आज  पचासों साल से ये इलेक्शनबाज जिताते -हराते रहे हैं। ये  एकाएक लुप्त हो जाने बाले जीव हैं नहीं। वे आगे,  'डाइनासोर के लुप्त होने की डार्विन थ्योरीपे उतरते इससे पहले मेरा घर गया, मैंने गेट खोल के अंदर जूता निकालते हुए अर्धांगिनी से कहा, ये गणपत जी अगले घण्टे दो घण्टे में आएँ तो कह देना मैं पूजा में बैठा हूँ। वे मेरी पूजा में लगने वाले समय को जानते हैं।
ख़ास बात ये कि अनवांटेड के आशंकित- आगमन पर मेरी पूजा, मैराथन स्तर पर होने लगती है। प्रभु रिजल्ट भी तुरन्त देते हैं, वे जो बला माफिक होते हैं, टल जाते हैं।
अगले दिन गणपत अपने कुत्ते का पट्टा, मय-कुत्ते के पकड़े आए।
मैंने कहा आज इसे भी घुमाने ले आए...? वे बोले इसे घुमाने के लिए मेरे पास दूसरे भरोसे के ईमानदार आदमी हैं। आज मैं इसे आपको बताने के लिए लाया हूँ कि इससे ज्यादा भरोसेमन्द कोई हो, नहीं सकता। ये घर की नि:स्वार्थ रखवाली करता है, क्या मजाल इनकी मर्जी के खिलाफ कोई बाउंड्री वाल तक पहुँच सके। हमने इसको भरोसे के लायक बनाने में अपनी इनर्जी भी खूब लगाई है। आप कोई चीज दूर फेंक देखो... जैसे ये जूता... ? उतारिये, कमाल देखिये, 'सीज़नका... आप पाँच कदम चल भी नहीं पाएँगे, ये आपके कदमो में ला के रख देगा...
मेरे संकोच की पाराकाष्ठा मुहाने पर थी। मुझे, पिछले हफ़्ते खरीदे अपने जूते की गति बनती सामने नजर रही थी। मैंने कहा गणपत जी आप अपनी फेंक लीजिये।
वे बोले जादूगर अगर अपनी ट्रिक, अपने सामान से करे ,तो लोग प्रभावित नहीं होते... कोई वाहवाही नहीं देता, कौन आपका जूता गुमा जा रहा है ... ?
दीगर साथ के घुम्मकड़ों ने गणपत की बात का पुरजोर समर्थन किया। सीज़न, जो गणपत की बात और अगले कदम की जैसे जानकारी रखता हो, मेरे जूतों की तरफ घूरकर देखने लगा।
उन्होंने आनन- फानन मेरे जूते  को पूरा जोर लगाकर उछाल मारा।
गणपत के जोश में पिछली गई रातों के फुटबॉल-क्रिकेट  मैच का पुरजोर असर था। उन्होंने धमाके की स्पीड में यूँ फेंका कि जूता सीधे दूर कीचड़ में जा धँसा। उनका 'कुत्ता- भरोसापाँच लोगों के बीच सिद्ध होकर टिक गया या यों कहूँ मेरे जूते  की बलि चढ़ गई।
इसे धोने, और इसके लिए किसी लघुकथा की तात्कालिक पैदायश, घर आने से पहले मुझे करनी थी। मैं उस बयान की रूपरेखा में जुट गया।
तीसरे दिन तक कुत्ता।-प्रकरण की वजह से, भरोसे के आदमी की भूमिका समाप्त नहीं हो पाई।
चौथे दिन, मैंने विराम देने और गनपत को 'ढुँढाई-मुक्तघोषित करने का ऐलान कर दिया। सब को बताया कि मेरे  बॉस को भरोसे का आदमी मिल गया है।
सबने अपनी उत्सुकता दिखाईकि भरोसे के आदमी पर, मैं विस्तार से प्रकाश डालूँ। वे कहने लगे बॉस को किस काम के लिए कैसा आदमी ढूँढा गया है बताओ।
मैंने कहा हमारे बॉस को अगले महीने फॉरेन टूर पर जाना है। वे ऑफिस के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी, घर और परिवार की देखरेख के लिए होनहार-सज्जन-सुशील, मेरे जैसे आदमी की तलाश थी। पूरे ऑफिस ने मेरे नाम की मुहर लगाई तब जाकर वे आश्वस्त हुए। 
आइए घर चलें, आप सभी को चाय पिलाई जाए।
गणपत बोले बड़े उस्ताद हो..भाई..? हमें क्या -पता था बॉस को आप सब्सिट्यूट कर रहे हैं।

सम्पर्क: न्यू आदर्श नगर जोन 1, स्ट्रीट 3, दुर्ग, छत्तीसगढ़, मोबाइल9408807420, 9426764552email :susyadav|@gmail.com

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