July 12, 2018

प्रकृति

पी कहाँ पी कहाँ
बोल रे पपीहरा...
पपीहा वह पक्षी है जो दक्षिण एशिया में बहुतायत में पाया जाता है। यह दिखने में शिकारा की तरह होता है। इसके उडऩे और बैठने का तरीका भी बिल्कुल शिकारा जैसा होता है। इसीलिए अंग्रेज़ी में इसको Common Hawk-Cuckoo कहते हैं।
पपीहे की आवाज बहुत ही रसमय होती है, बल्कि कोयल से भी सुरीला और मीठा गीत गाता है यह पक्षी। उसमें कई स्वरों का समावेश होता है। किसी- किसी के मत से इसकी बोली में कोयल की बोली से भी अधिक मिठास है।
हिन्दी फिल्मों में इस पक्षी को लेकर अनेक गीत रचे गए हैं। कवियों ने भी इस पक्षी को लेकर कई कविताएँ लिखी हैं। कवियों ने मान रखा है कि वह अपनी बोली में पी कहाँ....? पी कहाँ....? अर्थात् प्रियतम कहाँ हैं? बोलता है। वास्तव में ध्यान देने से इसकी रागमय बोली से इस वाक्य के उच्चारण के समान ही ध्वनि निकलती जान पड़ती है। बंगाली लोगों का मानना है कि यह पक्षी 'चोख गेलो’ (मेरी आँख चली गई) कहता है, जबकि मराठी लोगों के अनुसार यह पक्षी अपनी बोली में 'पयोस आता’ (बारिश आने वाली है) कहकर चिल्लाता है। वैसे खूब ध्यान से सुनने पर पपीहा की रागमय बोली में 'पी कहाँके उच्चारण के समान ही ध्वनि निकलती जान पड़ती है।
यह भी प्रवाद है कि यह केवल वर्षा की बूँद का ही जलपीता है, प्यास से मर जाने पर भी नदी, तालाब आदि के जल में चोंच नहीं डुबोता। जब आकाश में मेघ छा रहे हों, उस समय यह माना जाता है कि यह इस आशा से कि कदाचित् कोई बूँद मेरे मुँह में पड़ जाए, बराबर चोंच खोले उनकी ओर एक लगाए रहता है। बहुतों ने तो यहाँ तक मान रखा है कि यह केवल स्वाति नक्षत्र में होने वाली वर्षा का ही जल पीता है और यदि यह नक्षत्र बरसे तो साल भर प्यासा रह जाता है।
इसकी बोली कामोद्दीपक मानी गई है। इसके अटल नियम, मेघ पर अनन्य प्रेम और इसकी बोली की कामोद्दीपकता को लेकर संस्कृत और भाषा के कवियों ने कितनी ही अच्छी -अच्छी उक्तियाँ की है।यद्यपि इसकी बोली चैत से भादों तक बराबर सुनाई पड़ती रहती है; परंतु कवियों ने इसका वर्णन केवल वर्षा के उद्दीपनों में ही किया है।
पपीहा कीड़े खानेवाला एक पक्षी है ,जो बसंत और वर्षा में प्राय: आम के पेड़ों पर बैठकर बड़ी सुरीली ध्वनि में बोलता है। यह वृक्षों पर रहने वाला पक्षी है। पपीहा पेड़ों में ही रहता है और बहुत कम ही ज़मीन पर उतरता है। इसका आवास बाग, बगीचे, पतझड़ी और अर्ध सदाबहार जंगलों में होता है। जब मस्ती में आता है तब वृक्ष की चोटी पर बैठकर जोर से टेर लगाता रहता है।
पपीहा हरे-भरे क्षेत्र या घने जंगलों में पाया जाता है। यह पश्चिम में पाकिस्तान से पूर्व में बांग्लादेश और उत्तर में 800 मी. की हिमालय की ऊँचाई से दक्षिण में श्रीलंका तक पाया जाता है। यह अमूमन साल भर अपने ही इलाके में आवास करता है लेकिन सर्दियों में जहाँ ऊँचाई ज़्यादा हो और इलाका ज़्यादा सूखा होता है, वहाँ से यह पास के इलाकों में प्रवास कर जाता है जहाँ की पर्यावरणीय परिस्थितियाँ ज़्यादा अनुकूल हों। यह हिमालय में 1000 मी. से नीचे पाया जाता है लेकिन उसके ऊपर के इलाके में इसकी बिरादरी का बड़ा कोकिल पाया जाता है।
देशभेद से यह पक्षी कई रंग, रूप और आकार का पाया जाता है। उत्तर भारत में इसका डील प्राय: श्यामा पक्षी के बराबर और रंग हलका काला या मटमैला होता है। दक्षिण भारत का पपीहा डील में इससे कुछ बड़ा और रंग में चित्र-विचित्र होता है। अन्यान्य स्थानों में और भी कई प्रकार के पपीहे मिलते हैं, जो कदाचित् उत्तर और दक्षिण के पपीहे की संकर संतानें हैं। मादा का रंगरूप प्राय: सर्वत्र एक ही जैसा होता है। पपीहा पेड़ से नीचे प्राय: बहुत कम उतरता है और उसपर भी इस प्रकार छिपकर बैठा रहता है कि मनुष्य की दृष्टि कदाचित् ही उसपर पड़ती है।
कोयल की तरह पपीहा भी अपना घोंसला खुद नहीं बनाता। दूसरे चिड़ियों के घोंसलों में अपने अण्डे देता है। मादा अप्रैल से जून के बीच अंडे देती है, जिन्हें वह चुपके से कोयल या छोटी फुदकी के घोंसले में छोड़ आती है। उसके अंडों का रंग भी कोयल के अंडों जैसा नीला होता है।
 प्रजनन काल में नर तीन स्वर की आवाज़ दोहराता रहता है जिसमें दूसरा स्वर सबसे लंबा और ज़्यादा तीव्र होता है। यह स्वर धीरे-धीरे तेज होते जाता हैं और एकदम बन्द हो जाता, और काफ़ी देर तक चलते रहता है; पूरे दिन, शाम को देर तक और सवेरे पौ फटने तक।
बरसात के बाद यह पक्षी दिखाई नहीं देता। वैसे ही इसे सर्दी बिल्कुल पसंद नहीं। इन दिनों यह दक्षिण की ओर चला जाता है, जहाँ सर्दी का प्रकोप कम होता है। पपीहे की एक जाति आम पपीहों से कुछ भिन्न होती है, इसे चातक कहते हैं। कद में ये पपीहे की तरह के होते हैं, बस इनके सिर पर बुलबुल की तरह एक कलगी-सी होती है।
मेघ से पानी की 
याचना करते चातक

हमारे साहित्य में, जहाँ कोयल और पपीहे को इतना प्रमुख स्थान दिया गया है, अफसोस कि वहाँ रूमानी वातावरण पैदा करने वाले छोटे ककू उपेक्षित बने रहे हैं। भारतीय साहित्य में चातक और पपीहा ये दोनों शब्द पर्यायवाची माने गए पारस्परिक समानताएँ भी हैं, असमानताएँ भी। रूप-रंग में इनके काफी भेद हैं; पर बोली में समानता है। चातक मैना से कुछ छोटा, लंबी पूँछ वाला पक्षी है, जिसके बदन का ऊपरी हिस्सा गाढ़ा, चमकीला काला तथा निचला सफेद होता है। पाँव पर बाज जैसे सफेद घने बाल होते हैं। सिर पर बुलबुल की तरह एक काला तुर्रा होता है। देखने में यह काफी आकर्षक है। ये दोनों ही मेघ से पानी की याचना करते हैं अर्थात वर्षाकाल में आकाश में बादल मँडराने लगते हैं ,तो जहाँ पपीहे गला फाड़-फाड़कर पी-पी... की रट लगाते हैं, वहीं चातक बड़ी धीमी आवाज़ में कह उठता है पिउ-पिउ... जब मस्ती में आता है, तब वृक्ष के शीर्ष भाग पर बैठकर ज़ोरों से बोलता रहता है; अक्सर रातों में भी, खासकर चाँदनी रात में। चाँदनी रात में तो इसके तमाम रात बोलने के कारण ही अंग्रेज़ी में इसे मस्तिष्क ज्वर पक्षी (ब्रोन फीवर बर्ड) कहा गया है।
वर्षा का वास्तविक अंत स्वाति नक्षत्र के व्यतीत होने पर ही होता है और तभी इसका बोलना भी बंद होता है। यही कारण है इस कहावत का कि पपीहे अथवा चातक की प्यास स्वाति जल से ही मिटती है। चातक उन पक्षियों में है, जो बसंत नहीं, वर्षाकाल में अपना मुँह खोलता है। मानसूनी हवा का बहना शुरू हुआ नहीं कि चातक धमके। कुछ अफ्रीका की ओर से, कुछ पहाड़ों से। लगता है ये रातों-रात पहुँचते हैं। चातक पपीहा नहीं है, जो कभी तो झाड़ियों पर आकर बैठता है और बड़े वृक्षों से उतरकर ज़मीन पर पाँव धरता है। अधिकांशत: वह वृक्ष के शीर्ष भाग पर बैठा हुआ आकाश के बादलों की ओर देखता तथा पी-पी... की तीव्र ध्वनि से सारे वातावरण को गुंजायमान करता है। ऊपर आकाश में उठने की प्रवृत्ति भी चातक में ही पाई जाती है, पपीहे में नहीं। इसी तरह पर्वतों पर भी चातक के होने का उल्लेख मिलता है। पपीहे इसके ठीक विपरीत, पहाड़ों पर नहीं होते, बल्कि भारत में बंगाल से लेकर राजस्थान तक के क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। और ये एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर भले ही उड़कर जाएँ, उड़ते हुए आकाश में परिभ्रमण कदापि नहीं करते। (संकलित)

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