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Oct 1, 2026

लघुकथाः स्मृतियाँ

   - नमिता सिंह 'आराधना'

 कुछ वर्षों पहले मैं अपने माँ- बाबूजी के पास अपने पैतृक घर गया था, जहाँ मेरा पूरा बचपन गुजरा था। किसी काम से मैंने माँ की अलमारी खोली थी तो आश्चर्य से भर गया था। मेरे बचपन के खिलौने- एक भालू, लंबी पूँछ वाला एक बंदर और एक बदरंग सा गुड्डा जिसके दोनों पैरों के जूते गायब थे, माँ ने सहेज कर अपनी अलमारी में रखे हुए थे।

"माँ, ये क्या…? मेरे बचपन के खिलौने अभी तक आपने सहेजे हुए हैं? इन्हें किसी को दे देती या फेंक देती।" मैं आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा था।

"इन्हें ना मैं किसी को दे सकती हूँ ना ही फेंक सकती हूँ।" माँ ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया था।

माँ की बातों का अर्थ मुझे समझ नहीं आया, तो मैं प्रश्नवाचक निगाहों से उन्हें देखने लगा।

माँ ने उन खिलौनों पर प्यार भरी दृष्टि फेरते हुए ममता से भीगे स्वर में कहा था, "मेरे लिए ये मामूली खिलौने नहीं है बेटा। ये मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि इनमें तेरा बचपन है। मैंने तेरे बचपन को सहेजे रखा है। अब तू तो ज्यादा रहता नहीं है मेरे पास तो इनमें मैं तुझे महसूस करती हूँ। इनसे बातें करती हूँ, इन्हें गोद में बिठाती हूँ तो तेरे पास होने का अहसास होता है।"

माँ की बातें सुनकर एक बेटे का (मेरा) हृदय आर्द्र हो गया था।

कुछ वर्षों बाद माँ नहीं रही।

माँ के नहीं रहने पर जब मेरी पत्नी ने उन खिलौने को फेंकने के लिए अलमारी से निकाल कर बाहर पटक दिया तो मैं उन्हें उठाकर वापस अपनी अलमारी में सहेजने लगा।

पत्नी चिल्लाई, “क्यूँ इतने पुराने और बदरंग खिलौने उठाकर रख रहे हो अलमारी में? अलमारी पहले से ही भरी पड़ी है। जगह कहाँ है? फेंक दो इन्हें।”

मैंने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, “नहीं फेंक सकता। ये मामूली खिलौने नहीं हैं। इनमें मेरी माँ की ममता है। मैं अपनी माँ की ममता को सहेज रहा हूँ।” मेरे स्वर से अपनी माँ के प्रति एक पुत्र का स्नेह और माँ के रिक्त हुए स्थान से उपजी पीड़ा के मिले-जुले भाव छलक रहे थे।

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