- डॉ. कनक लता मिश्रा
माँ तू रहनातू रहना माँ
तब भी, जब मैं हताश हो जाऊँ,
चाहूँ आसमान छुना
पर ख़ुद को बहुत छोटा पाऊँ
चाहूँ स्वच्छंद उड़ना
पर पंखों में उड़ान न पाऊँ
जमाना चाहूँ अपनी अस्मिता की जड़ें
पर ख़ुद की गहराई न पाऊँ
बहुत कुछ करना चाहूँ
पर कुछ भी न कर पाऊँ
तब भी तू रहना माँ
तू तो रहना माँ
तू ही तो है,
जिसकी आँखों में मै सूरज, हूँ मैं चंदा, हूँ
मैं दुनिया का सबसे नेक बंदा, हूँ
नहीं जानता मैं कि मैं सुन्दर,
सुरूप हूँ या कि मंदा हूँ
पर माँ तेरे लिए तो मैं तेरा चुनिंदा हूँ
बड़ा ही सामान्य सा हूँ,
कुछ भी तो खास नहीं मुझमें
पर एक तू ही तो है जो नहीं कहती
कि तेरे होने से शर्मिंदा हूँ
तू पास हो या दूर रहे
मेरी चेतना में तू बसी है माँ
तेरे होने से मेरा होना है
तू है तो मैं हर हाल में ज़िन्दा हूँ
मेरे लिए तो मेरा ईश्वर,
मेरा रहबर तू ही, तू ही मेरा ख़ुदा
तू तो सबसे प्यारी है, तू है सबसे अलहदा
हरेक कुसूर की सज़ा
सबको ही बराबर दिया करता है ख़ुदा
पर तू तो मेरी हर खामियों की सज़ा
ख़ुद पे ही लिया करती है सदा
तू कहे मुझे मेरा हीरा, मेरा मोती,
मेरी सारी धन संपदा
पर मैं तो तेरी कोख में ही पला बढ़ा
तू तो मेरी अन्नपूर्णा तू ही मेरी अन्नदा।

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