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Oct 1, 2026

कविताः माँ तुम थी तो

  - अनीता सैनी 

माँ

तुम्हारे जाते ही रीत गई थी

मेरे भीतर की गागर 

एक झटके में धुँधला गईं थीं आँखें 

और अटक कर रह गईं थीं साँसें 

आज समझ में आया था क्या होता है

कमर टूटने का असल अर्थ 

सारी खुशियाँ जा बैठी थीं 

तालाबंद कोठरी में 

जड़ों से कटी मेरी देह 

घिरकर रह गई थी अनाम ख़ौफ़ में 

जाते हुए इतना भी न सोचा तुमने

कौन सुलझाएगा मेरी मुड़ी-तुड़ी

उलझी मुश्किलों को 

तुम थीं तो जब-तब कुम्हार सी

थपथपा दिया करती थीं मेरे अंतर्मन को

भले कैसी भी रही हों परिस्थितियाँ

बचाती रहीं तुम 

ऊबड़-खाबड़ होने से मेरा अंदर

बातों-बातों में कैसे माप लेती थीं तुम 

मेरे मन की थाह

अपनी दूरदर्शिता की मथनी से मथकर

कैसे छाँट देती थीं सारी परेशानियों को

शायद कोई जादू थीं तुम 

कैसे मेरे हारे मन को भी 

दिला देती थीं जीत का अहसास 

तुम थीं तो निश्चिंत थी मैं 

तुम्हारे होते कभी ढूँढा ही नहीं मैंने

अपने होने का अर्थ

तुम्हें खोकर जाना कीमती वस्तु का मोल

आती-जाती साँसों सी तुम

पल-पल स्मृतियों में रहती हो माँ 

तुम्हारे जाने से बाद बढ़ गई है मेरे

अव्यक्त शब्दों की भीड़ और सूख गए हैं 

मेरे आँसू  दुख की सघनता में।

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