मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 1, 2026

अनकहीः कब मिलेगी नारी को वास्तविक बराबरी?

 डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ ही दिनों में आदिशक्ति की आराधना का पावन पर्व नवरात्र का शुभारंभ होने वाला है। इन नौ दिनों में पूरा देश देवी दुर्गा की भक्ति, गरबा की उमंग और अनुष्ठानों के उल्लास में सराबोर हो जाता है। कन्या पूजन और कन्या भोज के द्वारा मासूम बच्चियों में साक्षात् जगद्जननी का रूप निहारना हमारी सांस्कृतिक सभ्यता और सदियों पुरानी समृद्ध विरासत का हिस्सा रहा है। हमारे संस्कारों ने स्त्री को हमेशा जननी और देवी के सर्वोच्च पद पर आसीन किया है।

लेकिन इस पावन आस्था के आवरण के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई बहुत भयावह है। जिस देश में देवी की पूजा की परंपरा रही है, उसी समाज में सदियों से नारी की अवहेलना, उस पर अत्याचार और दोहरे दर्जे का अन्याय भी समानांतर चलता आ रहा है। जब 21वीं सदी और बराबरी के इस आधुनिक दौर में भी हम नारी के साथ बर्बर भेदभाव और उत्पीड़न की ख़बरें पढ़ते हैं, तो मन अफ़सोस और ग्लानि से भर जाता है।

हाल ही में आई कुछ खबरों ने समाज के इस दोहरे चरित्र को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से आई एक दिल दहला देने वाली घटना में एक माह की मासूम बच्ची को सिर्फ इसलिए पानी से भरे टब में डुबोकर मार दिया गया और पीठ पर भारी ईंट रख दी गई; क्योंकि वह परिवार की दूसरी बेटी थी। हत्या के बाद चुपचाप अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गई; लेकिन स्थानीय आशा कार्यकर्ता की सतर्कता से यह खौफनाक सच सामने आ गया। इस अमानवीय कृत्य पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने आरोपी दादा की जमानत याचिका खारिज करते हुए जो टिप्पणी की, वह समाज के मुँह पर करारा तमाचा है। माननीय कोर्ट ने अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए कहा- ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 80 साल बाद भी देश में लोग लड़के को प्राथमिकता देते हैं।’

 जिस देश में नवरात्र के दिनों में हम नौ दिनों तक छोटी-छोटी कन्याओं के पैर धोकर उन्हें भोजन कराते हैं, उसी देश में आज भी बेटी होने के अपराध में एक माह की मासूम को तड़पा-तड़पाकर मार दिया जाता है। यह घटना साबित करती है कि आधुनिकता और विकास की बातें केवल कागजी हैं; हमारी सामाजिक जड़ों में आज भी बेटा और बेटी का भेदभाव गहराई तक समाई हुई है।

पर यह सिर्फ नवजात बच्चियों के जीने के अधिकार का मुद्दा नहीं है, बल्कि जो बेटियाँ जीवित बच जाती हैं, उनके साथ भी जीवन के हर मोड़ पर भेदभाव किया जाता है। यदि हम सोचते हैं कि शिक्षा और आधुनिकता ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा कर दिया है, तो वैश्विक आँकड़े हमारी इस गलतफहमी को दूर कर देते हैं।

हाल ही में जारी यूएन वीमेन की जेंडर स्नैपशॉट 2026 की रिपोर्ट हमारी आँखें खोलने के लिए काफी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और अवसर मिलने की मौजूदा रफ्तार यही रही, तो पूरी दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार पाने में 171 साल और लगेंगे। वहीं, दुनिया भर की संसदों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर प्रतिनिधित्व मिलने में लगभग 63 साल का समय लग जाएगा।

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जीवन के हर क्षेत्र में- चाहे वह राजनीति हो, कॉर्पोरेट जगत् हो या विज्ञान और तकनीक का क्षेत्र- महिलाओं को पीछे ही धकेला जा रहा है।- दुनिया भर की संसदों में महिलाओं के पास केवल 27.4 प्रतिशत सीटें हैं वहीं सरकार के बड़े मंत्रालयों में महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है -वित्त व आर्थिक मामलों में 19 प्रतिशत, कानून व न्याय में 18 प्रतिशत, और रक्षा में मात्र 11 प्रतिशत। 

कॉर्पोरेट लीडरशिप में वैश्विक स्तर पर महिलाएँ आज भी बहुत पीछे हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के 80 प्रतिशत देशों में समान पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम तनख्वाह मिलती है। टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी मात्र 22 प्रतिशत है और बड़े पदों पर केवल 14 प्रतिशत। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हम 21वीं सदी में प्रवेश तो कर चुके हैं, लेकिन महिलाओं को नेतृत्व, निर्णय लेने की शक्ति और समान अवसर देने के मामले में हमारी मानसिकता आज भी बहुत संकुचित है।

यूएन रिपोर्ट का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस देश की संसद में महिलाओं की भागीदारी 20 प्रतिशत से अधिक होती है, वहाँ बच्चों की सेहत, टीकाकरण और माँ-बच्चे का स्वास्थ्य काफी बेहतर रहता है। यानी जब महिला को नीति-निर्माण और शासन में बराबरी की जगह मिलती है, तो पूरा समाज और आने वाली पीढ़ी स्वस्थ बनती है। अफसोस इसके बावजूद हम महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर आगे बढ़ने से रोकते हैं।

हमारे समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम स्त्री को देवी का दर्जा देकर उसे आसमान पर बिठा देते हैं, लेकिन जमीन पर उसे एक सामान्य मनुष्य का अधिकार देने से भी कतराते हैं। जब तक हम स्त्री को केवल भक्ति का पात्र मानेंगे और व्यावहारिक जीवन में उसे बराबरी, सुरक्षा और स्वतंत्रता नहीं देंगे, तब तक नवरात्र के ये उत्सव और कन्या-पूजन केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएँगे। यदि हमें वास्तव में माँ दुर्गा की भक्ति और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना है, तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा- बेटियों के जन्म पर मातम मनाने या उन्हें बोझ समझने की घटिया मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा, घर के फैसलों से लेकर देश की संसद और कॉर्पोरेट तक, महिलाओं को पुरुषों के बराबर निर्णय लेने का अधिकार देना होगा, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव खत्म कर उन्हें समान काम के लिए समान वेतन और सुरक्षित माहौल देना होगा।

नवरात्र का पावन पर्व हमें केवल उपवास रखने या गरबा खेलने का संदेश नहीं देता, बल्कि वह नारी शक्ति के सम्मान और भेदभाव को भी दूर करने का भी संदेश देता है। आज समय आ गया है कि हम ढोंग और दिखावे से बाहर निकलें; क्योंकि जब तक आजादी के 80 साल बाद भी मासूम बच्चियों की बलि चढ़ती रहेगी और महिलाओं को अपना हक पाने के लिए सदियों का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक हमारी संस्कृति और विकास के दावे अधूरे रहेंगे। सच्चे अर्थों में कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब हर बेटी को इस धरती पर जन्म लेने, पढ़ने, बढ़ने और बराबरी से काम करने का पूर्ण अधिकार मिलेगा।

No comments:

Post a Comment