- रविन्द्र गिन्नौरे
सरगुजा में एशिया की सबसे पहली रंगशाला है, सीता बेंगरा। सोलह सौ फीट ऊँचे पहाड़ की चट्टान को तराश कर बनी है यह रंगशाला। ऐसे मुक्ताकाशी रंगमंच (ओपन एयर थिएटर) की परंपरा वैदिक काल से शुरू हुई थी। त्रेतायुग में राम का वनवास काल और कालिदास का रामगिरि सहित ईसा पूर्व तीसरी सदी की समृद्ध सभ्यता एवं संस्कृति को समेटे हुए हैं रामगढ़ की पहाड़ियाँ।
छत्तीसगढ़ का सरगुजा अपने आगोश में युगों की गाथा, ऐतिहासिकता और पुरा-अवशेष संपदा समेटे हुए है। कहा गया है कि त्रेतायुग में राम ने वनवास काल में यहाँ विश्राम किया था। महाकवि कालिदास की रामगिरि भी यही है, जहाँ बैठकर कवि ने ‘मेघदूत’ की रचना की थी। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की सभ्यता के पुष्ट प्रमाण रामगढ़ की पहाड़ियों में विद्यमान हैं। यही है सीता बेंगरा, जहाँ नाटक और गीत-संगीत के आयोजन होते थे।
सरगुजा अर्थात ‘सुर’ और ‘गजा’ - अर्थात देवता या सुर-संगीत और हाथियों वाली धरती। ‘स्वर्गजा’- स्वर्ग और जा अर्थात स्वर्ग के समान वाला प्रदेश। तीसरा नाम ‘सुरगुंजा’- सुर और गुंजा अर्थात गीतों के मधुर स्वरों का गुंजन। सभी नाम सरगुजा की विशिष्टता को साकार करते हैं। सुर और संगीत की तान यहाँ के गुफा रंगमंच में कभी गूंजती थी। सुरम्य वन-प्रकृति में हाथियों के स्वच्छंद विचरण वाली यह धरती है। मुगल काल में सेना के लिए यहीं से हाथी भेजे जाते थे। रामायण काल में ‘दंडकारण्य’ और 10वीं सदी में ‘डांडोर’ के नाम से जाना जाता रहा आज का सरगुजा।
सरगुजा का गुफ़ा नाट्यालय
सरगुजा के गुफा रंगमंच को सबसे पहले कर्नल आउसुले ने 1848 में देखा। इसी आधार पर 1904 में डॉ. टी. ब्लास ने रामगढ़ की पहाड़ियों के पुरावशेषों का अध्ययन किया। ब्लास ने गुफा रंगमंच को भारत के महान आश्चर्यों में शामिल किया और जर्मन भाषा में इस पर विस्तृत विवरण लिखा।पुराविद् डॉ. टी. ब्लास ने अपनी रिपोर्ट में इसे प्राचीन नाट्यशाला बताया। ब्लास ने कहा है, “रामगढ़ की पहाड़ी में अवस्थित सीता बेंगरा गुफा स्पष्ट तौर पर ऐसे तपस्वी का आश्रय नहीं हो सकती, जो संसार से विरक्त होकर यहाँ पुण्यशील क्रियाओं में संलग्न थे; बल्कि यह एक ऐसी जगह थी जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच में अभिनय होता था।”
छत्तीसगढ़ में गीत-संगीत, अभिनय और कला ईसा पूर्व तीसरी सदी में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी थी। इस काल में रामगढ़ और उसके आसपास समृद्ध नागर सभ्यता रही थी। ईसा पूर्व तीसरी सदी में रामगढ़ की पहाड़ियों को तराश कर तीन वृहत् निर्माण किए गए- पहला नाट्यशाला सीता बेंगरा, दूसरा गुफा-चित्रकारी जोगीमारा, और तीसरा आवागमन के लिए बनाई गई हाथीपोल सुरंग।
अरण्य का गोपन
रामगढ़ की नाट्यशाला पर ममगैन लिखते हैं, “रामगढ़ की नाट्यशाला निश्चित ही एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला है। यहाँ पंच विधान, पर्ण परिधि, दर्शक दीर्घा, कौतुक मंडल, कर्णाक्ष छिद्र, ध्वनि रूपक आदि की सारी व्यवस्था का ध्यान नाट्यशाला के निर्माण में सुनिश्चित किया गया है। विशेष अवसरों पर यहाँ नाटकों का मंचन किया जाता रहा होगा।”
कालिदास का रामगिरि
कवि कालिदास ने राम के यहाँ आने का उल्लेख करते हुए 'मेघदूतम्' के प्रथम श्लोक में लिखा है:
दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन्निवत्स्यसि।
चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसन्निभः॥
(वाल्मीकि रामायण)
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेशु॥
(मेघदूतम्, पूर्वमेघ - श्लोक 1)
महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना यहीं की थी। कालिदास ने निर्वासित यक्ष बनकर स्वयं अपनी विरह-वेदना को जिस स्थल पर लिखा, वह यही रामगिरि है। यक्ष ने अपना प्रणय-संदेश मेघ को दूत बनाकर मानसरोवर स्थित अलकापुरी में अपनी प्रियतमा के पास भेजा था।
कालिदास ने ‘मेघदूत’ में 'सीता कुंड' का वर्णन किया है- यही रामगढ़ के कालिदास की रामगिरि होने का पुख्ता आधार है। हाथीपोल सुरंग के भीतर पहाड़ से रिसकर एक शीतल जल कुंड बना है, जिसे सीता कुंड कहा जाता है।
लोकगीत में राम
सरगुजा के लोकगीतों और किंवदंतियों में राम की महिमा गाई जाती है। राम को महिमामंडित करते हुए यहाँ के कई स्थलों के नाम भी रखे गए हैं- रामगढ़ की पहाड़ियाँ, सीता बेंगरा, जोगीमारा, लक्ष्मण बेंगरा, सीता कुंड आदि राम से ही जुड़े हैं।
त्रेतायुग में सरगुजा क्षेत्र घनघोर जंगलों से परिपूर्ण था। जंगलों में ऋषि-मुनि आश्रम बनाकर रहते थे। वनवास काल के दौरान राम ने उन राक्षसों का वध किया जो ऋषि-मुनियों को सताते थे। सरगुजा के लोकगीतों में ऐसा ही वर्णन मिलता है:
"चउदह बछर विपत्ति ला बितावें
रामगढ़ परबत में घर ला बनावें
बनवासे करण बने राम चले।"
सीता बेंगरा रंगमंचसीता बेंगरा नाट्यशाला आज के आधुनिक थिएटर जैसी बनी है, जहाँ नेपथ्य, रंगपीठ, रंगशीर्ष आदि विद्यमान हैं। सीता बेंगरा गुफा नाट्यालय तक पहुँचने के लिए 15 सीढ़ियाँ बनी हैं। इन सीढ़ियों से चढ़कर गुफा में पहुँचते हैं, तो सामने 17 फुट चौड़ा गुफा नाट्यालय का प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता है, जिसका ऊपरी भाग गोलाई लिए हुए है। नाट्यशाला 46 फीट लंबी, 15 फीट चौड़ी और 9 फीट ऊँची है। पर्दे और खंभे लगाने के लिए दीवारों में दोनों ओर गड्ढे बने हुए हैं। नाट्यालय की दीवारों से सटकर दर्शकों के बैठने के लिए पत्थरों की आसंदियाँ (बैठने की जगह) बनी हैं। मंच का निर्माण तीन मेढ़ियों पर किया गया है जो ढालनुमा हैं।
सीता बेंगरा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित रंगशाला के अनुरूप बनाई गई है। ईसा पूर्व तीसरी सदी में यहाँ नाटक एवं गीत-संगीत के आयोजन होते थे। यह एक ऐसा स्थान था जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच पर अभिनय होता था।
सीता बेंगरा की गुफा में उत्कीर्ण पंक्तियों में ऐसी परिकल्पना की गई है, जहाँ मनुष्य कोलाहल से दूर एकांत में, रात्रि के नृत्य-संगीत और हास-परिहास की दुनिया में स्वर्गीय आनंद में लीन होकर पुष्पों की भीनी खुशबू से मोहित हो उसका आलिंगन करता है।
जोगीमारा गुफा
सीता बेंगरा के बगल में पहाड़ी के दक्षिणी ढलान पर स्थित है जोगीमारा गुफा। यहाँ ईसा पूर्व तीसरी सदी के जनजीवन के भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। जोगीमारा गुफा 30 फुट लंबी, 15 फुट चौड़ी और 9 फुट ऊँची है। गुफा की भीतरी दीवारों पर चिकना लेप लगाकर उस पर तरह-तरह के भित्तिचित्र बनाए गए हैं। गुफा की छत भी आकर्षक रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित है।
ज्यामितीय अलंकरणों के साथ गुफा की दीवारें पशु-पक्षी, मछली, मकराकृति, देव और दानवों के चित्रों से सुसज्जित हैं। गुफा की छत व दीवारों पर लाल, पीले, हरे व काले रंगों से अलंकरण किया गया है। जोगीमारा के गुफा-चित्रों को निहारने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इन्हें देखकर प्रतीत होता है कि तत्कालीन साहित्य, कला, सामाजिक वातावरण, मानवीय कला-संवेदना और भावनाओं का उत्कर्ष अत्यंत वैभवशाली रहा होगा।प्रेम-अभिलेख
नाट्यशाला का संचालन देवदासी सुतनुका के हाथों में था। सुतनुका को रूपदक्ष/शिल्पकार देवदीन से प्रेम हो गया। नाट्यशाला की मर्यादा के विपरीत ऐसा प्रेम-संबंध उस समय राजकीय कोप का कारण बना। तत्कालीन राज्य अधिकारियों ने चेतावनी स्वरूप उनकी इस प्रणय-गाथा को गुफा की दीवार पर अंकित करवा दिया ताकि भविष्य में ऐसे संबंध की पुनरावृत्ति न हो। देवदीन और सुतनुका की प्रणय-गाथा ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में गुफा की दीवार पर अंकित है, जो इस प्रकार है:
सुतनुका नाम देवदसिं।
तं कमयिथ बलानसेए।
देवदिने नाम लुपदखे॥
अर्थात्: "सुतनुका नाम की देवदासी से वाराणसी के श्रेष्ठ रूपदक्ष (शिल्पकार) देवदीन ने प्रेमासक्त होकर प्रणय किया।"
प्राचीन शिल्पकार देवदत्त (देवदीन)
देवदासी सुतनुका की ओर आकर्षित होकर शिल्पकार देवदीन (देवदत्त) उन पर मोहित हो गए थे। सुतनुका अपने समय की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र पर उत्कीर्ण पंक्तियाँ देवदीन और सुतनुका की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।
देवदीन अपने समय के प्रसिद्ध शिल्पकार थे। डॉ. हीरालाल शुक्ल कहते हैं, “प्रदेश के कलात्मक वैभव के आदि पुरुष देवदत्त हैं, जिन्हें भारत के प्रथम ज्ञात ‘रूपदक्ष’ (शिल्पकार) होने का गौरव हासिल है, जो ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में रामगढ़ अभिलेख में सादर स्मरण किए गए हैं। भारत के शेष कलाकार इन्हीं देवदत्त के उत्तराधिकारी हैं।”हाथीपोल सुरंग
सीता बेंगरा के पार्श्व भाग में आवागमन के लिए हाथीपोल सुरंग बनाई गई है। सुरंग का प्रवेश द्वार 55 फीट ऊँचा है, जिससे हाथी भी आसानी से गुजर सकता है। यह सुरंग 180 फीट लंबी है। रामगढ़ की पहाड़ी के पार से सीता बेंगरा पहुँचने के लिए इसी सुरंग का उपयोग किया जाता है।
रामगढ़ की पहाड़ी का वैभव
रामगढ़ की पहाड़ी के आसपास ईसा पूर्व तीसरी सदी की उन्नत नागर सभ्यता विद्यमान थी। समृद्ध नगर होने के प्रमाण सर्वेक्षणों में मिले हैं- ईंटों की दीवारें, बर्तनों के टुकड़े, मनके और प्राचीन सिक्के पाए गए हैं। यहीं पर लोहा गलाने वाली भट्टी भी मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में यहाँ धातुकर्म (लोहा गलाई) का कार्य होता था।
बीसवीं सदी की शुरुआत में जिस रामगढ़ को पुराविदों ने भारत के महान आश्चर्यों में गिना था, उस रामगढ़ के संपूर्ण वैभव से दुनिया आज भी काफी हद तक अनजान है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन विरासत को सँजोए सरगुजा के इस गौरवशाली इतिहास को नए सिरे से खँगालने और विश्व पटल पर स्थापित करने की आवश्यकता है।






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