“मम्मी, इस बार हमारे स्कूल का ट्रिप जा रहा है -पिंक सिटी… प्लीज़, इस बार मुझे भेज दो। पिछली बार आगरा गया था, तब तुमने मुझे नहीं भेजा था।’’
“हाँ, तू छोटी है न, तो मुझे डर लगता है। इसलिए नहीं भेजा था।’’
अंजली ने अपनी छोटी बेटी को टालने के लिए कहा। वैसे वह जानती है कि डर से अधिक उसे पैसों की चिंता थी कि ट्रिप के इतने सारे पैसे देने पर पूरे महीने का बजट गड़बड़ा जाएगा।
“पर अब तो मैं छोटी नहीं हूँ, आठवीं कक्षा में हूँ, चौदह साल की हो गई हूँ।’’ छोटी बेटी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा।
“कितने पैसे लगेंगे ट्रिप के?’’ अंजली का दिल जानता था, वह बस यूँ ही पूछ रही है। उसने तो बेटी को किसी न किसी तरह मना ही लेना था, ट्रिप पर ना जाने के लिए, पर पूछने में क्या हर्ज़ है।
“चार हज़ार…।’’ बेटी ने थोड़ी झिझक के साथ कहा। वह भी जानती थी कि इतनी रकम सुनकर माँ परेशान हो जाएगी। वह जानती है माँ को। माँ तो छोटी-सी रकम सुनकर भी परेशान हो जाती है।
फिर ये तो चार हज़ार हैं!
“चार हज़ार!’’ अंजली सचमुच परेशान हो गई थी, सोच में पड़ गई थी।
“कौन-कौन जा रहा है? तेरी फ्रेंड माधुरी भी जा रही है?’’ यूँ ही उसने पूछा। अंदर से जानती थी कि यह सवाल ही व्यर्थ है, बिल्कुल खोखला है, चले हुए कारतूस जैसा… भला इस सवाल का क्या मतलब है? स्कूल-ट्रिप जा रहा है तो बच्चे तो जाएँगे ही, प्रिंसीपल भी जाएगी, सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम भी होगा, सब कुछ सही होगा… फिर भी… फिर भी क्या? बस, यही कि ट्रिप के पैसे बहुत ज्यादा हैं… हज़ार के करीब होने चाहिए। स्कूल वालों को खुद भी तो सोचना चाहिए, आखि़र फीस लेते हैं… डोनेशन लेते हैं, फिर ये अलग से इतने पैसे?
“मम्मी, क्या हुआ? अच्छा ठीक है? मैं नहीं जाऊँगी,बस। वैसे मुझे भी डर लगता है… फिर भी, भविष्य में मौका मिला तो मैं तुम्हारे साथ जाऊँगी, साथ में दीदी भी होगी, ओ.के.।’’ छोटी बेटी ने माँ के गले में लाड़ से दोनों बाहें डालकर कहा, चेहरे पर मुस्कराहट लाकर।
“मगर तू फ्रेंड्स के साथ एन्जॉय करना चाहती है न?’’
माँ बेटी के दिल की बात जानती थी, पर बेटी भी कहाँ कम थी, वह भी माँ के दिल की बात खूब जानती-समझती थी। माँ के अभाव, माँ की मज़बूरियाँ, माँ की जिम्मेदारियाँ।
“ओ नहीं मम्मी… मैंने तो यूँ ही कहा था कि मैं जाना चाहती हूँ। असल में, मैं नहीं जाना चाहती… आय स्वेयर… मैं तेरे और दीदी के साथ ही जाना चाहती हूँ… सचमुच… ओ.के.!’’
बेटी माँ के साथ और भी अधिक लाड़ जताने लगी। हमेशा ऐसा ही क्यों होता हे? अंजली उदास हो गई। वह सदैव कोशिश करती है कि दोनों बेटियों की हर खुशी पूरी करे, हर ज़रूरत पूरी करे, परंतु जब कभी अधिक पैसों की ज़रूरत पड़ जाती है तो वह कमज़ोर पड़ जाती है। जैसे जब बढ़िया रेस्तरां में खाना खाने की बात आती है या जब मार्किट में आए नए मोबाइल, लैपटॉप, आई-पैड, आई-पॉड या एल.ई.डी. टीवी लेने की बात चलती है या जब बढ़िया क्लबों में स्वीमिंग पूल अथवा स्केटिंग ज्वाइन करने की बात करती हैं, अपनी सखी-सहेलियों की मिसालें देती हैं, तो वह असहाय-सी अनुभव करने लगती है स्वयं को। फिर लगता है कि उसके हाथ-पाँव फूल रहे हैं घबराहट में, परेशानी में… तब उसको लगता है, वह कितनी अकेली है, हालाँकि वह नौकरी करती है, अच्छी पोस्ट पर है, अच्छा वेतन है, पर ये अतिरिक्त सुख, अतिरिक्त सुविधाएँ-खुशियाँ? काश! एक और इतनी ही तनख्वाह होती… पर किसकी? उसके पति की? हाँ? पति की… है न। पर वह तनख्वाह उसके खुद के लिए है, उसकी अपनी ऐश के लिए है। काश! तलाक के समय वह थोड़ी-सी हिम्मत दिखाती, कोर्ट में केस करती, पति से खर्चा लेने का… पर सबने कहा, ‘छोड़ भी… न पड़ इन झंझटों में। तू खुद कमाती है, इसलिए तुझे खर्चा मिलेगा भी नहीं… और खर्चा देने वाला इंसान तो बिना किसी केस के भी, फर्ज़ समझकर दे सकता है। क्या वह नहीं जानता कि बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर आजकल कितना खर्चा होता है? स्कूल, कालेज की फीस और ट्यूशन का खर्च ही दम नहीं लेने लेते… उस पर अन्य सौ प्रकार के खर्चे।’’
“मम्मी, तू क्यों उदास हो गई? कुछ मत सोच। बिलीव मी, तुमने हमारे लिए कोई कमी नहीं रहने दी… यू आर ए वंडरफुल मदर…।’’ छोटी बेटी ने अंजली को पूरा विश्वास दिलाने का यत्न किया कि उसे स्कूल-ट्रिप में न जा सकने का ज़रा-भी अफ़सोस नहीं हो रहा।
‘कितनी समझदार है मेरी बेटी! मेरा कितना ध्यान रख रही है और मैं… मैं इसकी छोटी-सी खुशी भी पूरी नहीं कर सकती। लानत है मेरे पर… लानत है उस घड़ी पर जब मैं जन्मी थी, अपने काले, अभावों भरे करम लेकर। काश! मैं जन्म ही न लेती… काश!…।’ अंजली का मन हुआ कि वह जी भरकर अपने आप को कोसे, लानत है मेरे सुंदर होने पर, कैसी सुंदरता?... जब मेरा पति ही मुझे छोड़कर किसी दूसरी सुंदर स्त्री पर मोहित हो गया… हमें छोड़कर चला गया। मेरे जैसी बदसूरत तो कोई नहीं होगी। अंजली उठकर रसोई में चली गई, रात के खाने का प्रबंध करने लगी। पर मन था कि उखड़ चुका था, टिक नहीं पा रहा था।
हमेशा ही ऐसा होता है, जब रूटीन से हटकर कोई खर्चा करने की बात होती है तो उसका मन उखड़ जाता है। कई बार तो छोटी-छोटी बात पर भी ऐसा हो जाता है। जैसे, जब बेटियाँ पीज़ा आर्डर करने की बात करती हैं, मैकडोनल्ड जाना चाहती हैं या पी.वी.आर में जाकर फिल्म देखना चाहती हैं, जहाँ एक व्यक्ति की टिकट ही तीन-साढ़े तीन सौ से शुरू होती है या वे ब्रैंडिड ड्रैसिज लेना चाहती हैं, या फिर कुछ भी जैसे मिडिल क्लास से अपर क्लास की ओर जाने वाली बात करती हैं तो उसका मन उखड़ जाता है। तब वह सोचने लगती है कि वह इन्हें लेकर महानगर में क्यों बैठी है, जहाँ सब कुछ महंगा है, जहाँ का लाइफ़-स्टाइल बच्चों को आकर्षित करता है, उनकी मांगों को बढ़ाता है। यद्यपि वह बहुत कोशिश करती है कि वह अपनी बेटियों की मांगें पूरी करे। अपने आप पर खूब कंजूसी करती है। अपनी पसंद की ड्रैसिज़ को हाथ लगाकर उस पर टंगा कीमत का टैग पढ़कर छोड़ देती है। खुद थियेटर, सिनेमा, कन्सर्ट्ज़ न जाकर, बेटियों को ही भेज देती है। कभी ब्यूटी पॉर्लर नहीं जाती, स्पॉ में जाना तो बहुत दूर की बात है। खर्चे ही इतने हैं, वह करे तो क्या करे?
असल में, हर समय असुरक्षा की भावना ही हावी रहती है, यदि कभी वह बहुत बीमार हो गई? अगर कहीं एक्सीडेंट हो गया फिर? यदि होस्पीटल में एडमिट होना पड़ा तो?... बस, इन्हीं सब डरों के चलते उसने हैल्थ पॉलिसियाँ ले रखी हैं, अपने नाम पर, बच्चों के नाम पर। उनकी किस्तें भरती है वह। फिर मकान लिया तो बैंक से लोन उठाना पड़ा, उसकी किस्तें अलग हैं। छोटी-सी डीज़ल पर चलने वाली टाटा की कार ले ली थी, उसकी भी किस्तें भरती रहती है। और मकान जिसे फ्लैट कहना अधिक उचित है, की मैंटेनेंस हर महीने देनी पड़ती है। इसके अलावा, मोबाइलों के बिल, इंटरनेट और कंप्यूटर का बिल, बिजली और गैस का बिल। बस, बिल ही बिल। किस्तें ही किस्तें। तनख्वाह बेचारी क्या करे। पर्स में पैसे होते हैं, सेविंग अकाउंट में होते हैं, फिर भी डर बना रहता है… अगर ख़त्म हो गए? फिर वह कंजूसियाँ न करे तो क्या करे? कंजूसियाँ भी ऐसी जो ज्यादातर उसके अपने पर ही लागू होती हैं। जैसे कई सालों से वह सवेरे-सवेरे उठकर सैर करने जाती है। घर की बिल्डिंग की पिछली तरफ तो पार्क है। सैर के बाद पार्क से बाहर निकलती है तो सामने नारियल वाले की रेहड़ी लगी होती है और दूसरी तरफ तरह तरह के सूप बिक रहे होते हैं जैसे गेहूँ का सूप, करेले का सूप, मिक्स सूप… हैल्थ के लिए लाभदायक, पर हर साल उसको लगता है कि सूप बहुत महंगे हैं और नारियल पानी भी बहुत महँगा है - ‘भला बताओ, छोटा-सा नारियल पानी और पच्चीस रुपये! अगले महीने से शुरू करूँगी।’
फिर अगला महीना तो क्या, अगला साल आ जाता है। एक घंटे की सैर के बाद गला सूख जाता है। दिल करता है कि नारियल पानी पी ले, पर अब तो वह पैंतीस रुपये का हो चुका है। अब क्या पीना… पता नहीं ये लाग कौन है जो सफ़ेद क्रीज वाल ट्रैक सूट या थ्री-फॉर्थ निक्करें पहनकर सैर करते हैं और फिर सूप या नारियल पानी वाली रेहड़ियों के इर्दगिर्द रीलैक्स होकर जा खड़े होते हैं और जो इच्छा होती है, पीते हैं। वह कब होगी रीलैक्स, बेफिक्र… कब इस रूटीन से उभरेगी। कभी वह बेटियों के संग किसी सस्ते-से रेस्टोरेंट में चली भी जाए तो दो ही प्लेटों का आर्डर देगी। और फिर जब दो प्लेटें आ जाएँ तो बेटियो के आगे सरका देगी और खुद बीच-बीच में एक-आध ग्रास तोड़कर खा लेगी। बेटियाँ भी जिद्द नहीं करतीं, अलग से प्लेट मंगवाने के लिए, बल्कि अपनी-अपनी प्लेट माँ की तरफ सरका कर कहती रहेंगी, “लो न मम्मा… खाओ न मम्मी…।’’ 

शुक्र है, उसकी बेटियाँ समझदार हैं, अंजली सोचती और आह भरती। लगता है, पूरी ज़िन्दगी सिकुड़कर एक आह बनकर रह गई है।
परंतु, जब वह बेटियों को चहक-चहक कर बातें करती देखती है, स्कूल-कालेज की डिबेट में, नाटकों में, डांस प्रतियोगिताओं में फर्स्ट आते देखती है तो उसे लगता है, ‘हाँ, मैं अपनी बच्चियों का बढ़िया पालन-पोषण कर रही हूँ।… तभी तो वे खुश हैं, पढ़ाई में, कल्चरल प्रोग्रामों में आगे हैं।’
फिर, कभी कोई शिकायत भी तो नहीं करतीं। हमेशा यही जताती हैं कि उन्हें कोई कमी नहीं है… और वह भी उनके अंदर यही कान्फीडेंस भरना चाहती थी कि उन्हें कोई कमी नहीं, रिश्तों में भी नहीं… पापा का, दादा-दादी का, चाचा-चाची का, ताया-ताई का या बुआ-फूफा का प्यार उनके लिए नहीं तो क्या हुआ, उनके मामा तो हैं, मामियाँ हैं, मौसियाँ हैं, मौसा हैं… वह इंटरनेट पर उनकी तस्वीरें बेटियों को दिखाती।
“परमात्मा की कृपा से तुम्हारे चार मामा है, मामियाँ हैं, तीन मौसियाँ हैं, मौसा हैं, कज़न हैं… सभी विदेशों में वैल-सैटल्ड हैं।’’
बेटियाँ खुशी-खुशी फेसबुक पर सबके टच में रहती हैं। ससुराल के रिश्ते नहीं हैं तो चलो, मायके के तो हैं। सब अपने अपने कामों में बिजी रहते हैं। कोई हैल्प नहीं करते तो क्या हुआ, वह गर्व से कह तो सकती है कि उसके अपने हैं।
“मम्मी, ये डॉ. करनजीत भी हमारे मामा जी हैं?’’ एक दिन जब डॉ. करनजीत का फोन आकर हटा था तो छोटी बेटी ने पूछा था।
“हाँ, मामा जी ही हैं। मेरे भाइयों जैसे दोस्त। बस, फोन पर ही दोस्ती हो गई। मैं उनसे कभी मिली भी नहीं हूँ। वह दूसरी स्टेट में रहते हैं, हमारे आफिस के हैड-आफिस में काम करते हैं।’’
फिर उसने विस्तार के साथ बेटियों को बताया कि कैसे एक दिन डॉ. करनजीत के साथ आफिस के काम के सिलसिले में ही बात करनी पड़ी थी। ख़ास तौर पर जब वह बुखार के कारण आफिस नहीं जा पा रही थी, तो डॉ. करनजीत ने उसके मोबाइल पर बात की थी, हालचाल पूछा और कहा था, “घबराना नहीं, विदाउट पे भी छुट्टी लेनी पड़ी तो ले लेना, आराम करो। रुपये-पैसे की ज़रूरत पड़े तो मुझे बताना, मैं हूँ न।’’
उस दिन से उसके मन में उस शख़्स के लिए बहुत इज्ज़त पैदा हो गई थी। अंजली को वह दिन याद आ गया, वह मन ही मन उस पल को याद करने लगी। उसे याद है कि जब डॉ. करनजीत ने इस तरह हौसला दिया तो उसका मन किया कि वह कहे, ‘आपने इतना हौसला दिया है, ऐसा तो कभी मेरे अपने सगे बहन-भाइयों ने भी नहीं दिया।’ पर वह यह सोच कर कि ऐसा कहने पर मेरे बहन-भाइयों की इज्ज़त डॉ. करनजीत की नज़रों में क्या रह जाएगी? अंजली सिर्फ़ इतना ही कह सकी -
“आप तो ऐसे हौसला दे रहे हैं, जैसे मेरा कोई बहन-भाई मेरे साथ खड़ा हो।’’
“बस, तुम मुझे अपना भाई-बहन ही समझो।’’
उस घटना के पश्चात अंजली को सचमुच ही लगने लगा मानो डॉ. करनजीत उसके कोई अपने ही हों। बस, उस दिन के बाद डॉ. करनजीत हमेशा उसकी खै़र-ख़बर पूछते रहते थे, हौसला देते रहते थे।
अंजली डॉ. करनजीत के बारे में सोचती, ‘दुनिया में ऐसे इंसान भी होते हैं- हमदर्द, निस्वार्थ, ज़िंदादिल, हौसला देने वाले, पॉजिटिव बातें करने वाले और ज्यादा पर्सनल गहराई में न जाने वाले…।’ वह अंजली से उसकी बेटियों का हालचाल पूछते रहते हैं तो अंजली भी उनसे उनकी तीन बेटियों के बारे में पूछती थी। इस पर वह खुशी में, उत्साह में भरकर अपनी बेटियों की बातें सुनाते थे, अपनी पत्नी की, अपनी माँ की, अपने नए मकान की बातें करते रहते थे। ‘अजीब रिश्ता है ये फोन का…’ अंजली सोचती।
“मम्मी, जब मैं पिछले साल पास हुई थी तो डॉ. करनजीत ने मुझे हज़ार रुपया भेजा था न? कहा था कि मेरी तरफ से इनाम है।’’
छोटी बेटी के प्रश्न ने अंजली को ख्यालों से बाहर निकाला। रसोई के दरवाज़े पर आकर छोटी बेटी खड़ी थी। अचानक यह सवाल क्यों? अंजली समझ नहीं पाई। पिछले वर्ष जब छोटी बेटी सातवीं कक्षा में पास हुई थी तो बातों-बातों में अंजली ने बताया था कि डॉ. करनजीत ने उन्हें हज़ार रुपये का चैक भेजा है कि मेरी तरफ से बेटी को इनाम…।
हज़ार रुपये…! देखा जाए तो कुछ भी नहीं, पर देखा जाए तो बहुत बड़ी रकम है। कौन देता है आज के ज़माने में किसी को हज़ार रुपये?... न कोई रिश्ता, न कोई नाता, न कभी मिले। पता नहीं क्या सोचकर उन्होंने हज़ार रुपये का चैक भेजा कि अंजली और उसकी बेटियाँ खुश हो गईं। आज अंजली हैरान भी हो गई कि छोटी बेटी को इतने महीनों के बाद भी यह बात याद है। शायद इसलिए कि कभी उसको किसी ने इस तरह इनाम भेजा ही नहीं।
पता नहीं क्या सोचकर डॉ. करनजीत ने उसकी छोटी बेटी को हज़ार रुपये भेजे थे। शायद सोचा होगा, कन्या है, पुण्य लगेगा। या शायद इसलिए कि चलो, क्या फर्क़ पड़ता है, साठ हज़ार तनख्वाह है, उसमें से हज़ार रुपये दे भी दूँगा तो क्या फर्क़ पड़ जाएगा? या शायद यह सोचा होगा कि…
‘हज़ार ही है ना… अगर हज़ार भेजकर बच्ची की मम्मी का दिल जीत लूँगा तो भी सौदा महँगा नहीं… कैसे वह विनम्रता में भीग-भीग कर धन्यवाद करेगी… कैसे?... कितना मज़ा आएगा उस धन्यवाद को सुनने में।‘
“मम्मी?“
अंजली चौंक गई।
“हाँ, बेटा। सचमुच पैसे भेजना बहुत बड़ी बात है… बहुत बड़ी। बाचतीत करना तो बड़ी बात नहीं, वह तो सभी करते रहते हैं।’’
अंजली ने अपनी सोच से बाहर निकल कर कहा।
“मम्मी, मैं आठवीं के फाइनल एक्ज़ाम में बहुत मेहनत करूँगी, बहुत अच्छी परसेंटेज़ लाऊँगी। फिर तुम डॉ. करनजीत अंकल को बताना, वह ज्यादा पैसे भेजेंगे। फिर मैं अगले साल स्कूल-ट्रिप पर जा सकूँगी, है न? ’’
अंजली को लगा, उसके हाथ-पैर फूल रहे है फिर से…।



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