- परमजीत कौर ‘रीत’
आने वाला हर दिवस, दे जाएगा जीत ।।
दे जाएगा जीत, काल की बोली कहती ।
प्रतिपल दे संकेत, हमें चेताती रहती ।
मिले नहीं नवनीत, 'रीत' पानी को मथ के ।
करते रहना कर्म, भूलकर कंटक पथ के ।।
2.
जब तक अंतिम साँस है, तूफानों से ऱार ।
जलता दीपक कह रहा, नहीं माननी हार ।।
नहीं माननी हार, मुझे जलते जाना है ।
अपना तनिक उजास, जगत में बिखराना है ।
लौ बढ़ जाए और, आखिरी जब हो दस्तक ।
कुछ कर ले तूफ़ान, लडूँगा साँसे जब तक ।।
3.
मन में हों जब दूरियाँ, हिम हो जायें भाव ।
सम्बन्धों को तापता, तब बस स्नेह अलाव ।।
तब बस स्नेह अलाव, तरल हिमकण को करता ।
गुड़-मिश्री की भाँति, मधुरता मन में भरता ।
मोल स्नेह का ‘रीत’, समझ लें यदि जीवन में ।
मिट जायें सब द्वंद्व, ख़ुशी छा जाए मन में ।।
4.
पोथी में मिलती नहीं, जीवन की हर बात ।
चिड़िया ! पढ़ना सीख ले, हाव-भाव हालात ।।
हाव-भाव हालात, बदलते हैं कब कैसे ।
चेहरों पर प्रभाव, पड़े रंगों का जैसे ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, अनुभवी बात न थोथी ।
जीवन का हर पाठ,सिखा कब पाती पोथी ।।
5.
घर-बाहर की दौड़ में, छूटे एक न काम ।
ढूँढ रही है मानवी, जीवन के आयाम ।।
जीवन के आयाम, कभी तो पा जाएगी ।
उसका क्या अस्तित्व, कभी दिखला पाएगी ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, खुशी के खोज जवाहर ।
चलती रहती दौड़, मानवी की घर-बाहर ।।
6.
साँकल तेरे पाँव में, दूर बहुत आकाश ।
अरी! चिड़कली किन्तु तूँ, होना नहीं निराश ।।
होना नहीं निराश, पंख फैलाती रहना ।
एक न इक दिन टूट, गिरेंगे बंधन, है ना?
पलट समय के साथ,कहें क्या कौन यहाँ कल।
बन जाए औजार, पाँव की जो है साँकल ।।
7.
दुनिया हाँडी में भरा, माया का नवनीत ।
जुगत लगायें इंद्रियाँ, भोग लगे नित, मीत ।।
भोग लगे नित, मीत, व्यर्थ की भागा-दौड़ी ।
जीवन जाता बीत, जोड़कर कौड़ी-कौड़ी ।
शेष विरासत ‘रीत’, सँभालें मुन्ना-मुनिया ।
चलता रहता चक्र, घूमती हाँडी दुनिया ।।
8.
कुदरत हमको जाँचती, कठिनाई में डाल ।
संयम धीरज नम्रता, देते हमें निकाल ।।
देते हमें निकाल, परीक्षा की घड़ियों से ।
उचित कर्म की राह, मिलाती शुभ-कड़ियों से ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, सफलता की यह कसरत।
करवाती है मित्र, हमेशा सबको कुदरत ।।

बहुत बढ़िया लिखा है आपने हार्दिक शुभकामनाएं। विपरीत परिस्थितियों में भी आशावादी होना चाहिए, निराशा में आशा का संचार करती प्रेरक कुण्डलिया डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
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