मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Aug 25, 2012

आपके पत्र मेल बॉक्स

कुशल संपादन

उदंती जून 2012 का अंक प्राप्त हुआ। मेरी व्यंग्य रचना को स्थान देने के लिए बहुत आभारी हूँ। नेट पर तो मैं हमेशा उदंती देखती ही रहती हूँ, हर अंक में आपके अच्छे संपादन की झलक दिखती है। आप निसंदेह बहुत प्रशंसनीय कार्य कर रही, इसके लिए आप बधाई की पात्र है। रचनाओं का चयन बहुत उत्कृष्ट रहता है, यह आपके कुशल संपादन को दर्शाता है। शुभकामनाओं सहित
- प्रेम गुप्ता मानी, premgupta.mani.knpr@gmail.com

प्रतीक्षा

उदंती के सभी स्तम्भ मनभावन होते हैं। एक को पढ़ कर आगे की प्रतीक्षा आरम्भ हो जाती है इस बार की सभी रचनाये अच्छी लगी प्रेमचंद जी और मंटो साहब की कालजयी रचनाएं पढऩे का अवसर देने के लिए हार्दिक आभार ... शुभकामनाओं के साथ।
- ज्योतिर्मयी पंत, pant.jyotirmai@gmail.com

वोट की राजनीति

सहिष्णुता लोकतन्त्र की रीढ़ है। धार्मिक विश्वास हो या राजनैतिक क्रियाकलाप। आजादी के बाद का सबसे दु:खद पहलू है लोकतान्त्रिक मूल्यों का विघटन। यही कारण है कि क्षुद्र राजनीति से लेकर अफसरशाही के हथकण्डों तक, आम आदमी को नहीं वरन नेताओं और अफसरों की सहनशीलता पूरी तरह स्वार्थ केन्द्रित हो चुकी है। वोट की राजनीति का खेल इतना निम्नस्तरीय हो गया है कि, जरा- सी बात पर हल्ला मचाना ही हमारा चरित्र बन गया है। आपात स्थिति हटने के बाद हिन्दी के स्कूली पाठ्यक्रम से निराला की कविता 'कुत्ता भौंकने लगा' हटाई गई, कभी 'रोटी और संसद' धूमिल की कविता को हटाया गया। आज ऐसे विश्वविद्यालय भी हैं जहाँ पुरानी और बेजान कविता ही पढ़ाई जा रही हैं। वहाँ सबसे बड़ा डर है कि न जाने कब, कौन किस बात पर हल्ला बोल कार्यक्रम आयोजित कर बैठे। दागदार को सबसे बड़ा डर रहता है, अत: वह सीधे लोकतन्त्र पर खतरा बताने लगता है, जबकि उस तन्त्र में रोजमर्रा पिसते हुए उस लोक का दर्द इन बहरे कानों तक नहीं पहुँचता। आने वाली पीढ़ी का दिमाग कितना विषाक्त कर दिया जाएगा, इसे सोचकर ही डर लगता है। आपने अनकही 'हसना मना है' में मुद्दे को जिस तरह से पेश किया है, उससे नासमझ लोगों के दिमाग की खिड़कियाँ खुल जानी चाहिए।
- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, सहज साहित्य

सुखद आश्चर्य

 उदन्ती का जून अंक पा कर और उसमें अपनी रचनाओं को देखकर, सुखद आश्चर्य हुआ। पत्रिका देख कर मन खुश हो गया। प्रेमचन्द जी की कहानी इस अंक की उपलब्धि है।
- गिरिजा कुलश्रेष्ठ, girija.kulshreshth@gmail.com

हाइकु

हिंदी हाइकु में डॉ. सुधा गुप्ता का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। हिंदी हाइकु पर उन्होंने बहुत काम किया है और श्रेष्ठ हाइकु हिंदी साहित्य को दिये हैं। इस अंक में प्रस्तुत उनके हाइकु इसका प्रमाण हैं।
- सुभाष नीरव, subhashneerav@gmail.com

लू के थपेड़े

सुधा जी के सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं।  भाव, शिल्प, सौन्दर्य सभी स्तरों पर। नए रचनाकारों के सीखने के लिए श्रद्धेया सुधा जी जैसी महान कवयित्री की रचनाएँ हमेशा प्रेरणादायी होती हैं।
- उमेश महादोषी, aviramsahityaki@gmail.com

अनोखी खेती उतेरा

आज रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से यह भूमि प्रदूषित हो गयी है और उपजाऊ परत घट गयी। हमारे मालवा में सन बोया जाता था उसके उगने के बाद खेत में ही हाक दिया जाता था इससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ती थी। आज ऐसा नहीं होता आज लोगों ने ज्वार बोना बंद कर दिया। उदंती में प्रकाशित बाबा मयाराम का लेख 'सतपुड़ा की अनोखी खेती उतेरा' उन किसानों के लिए अनुकरणीय है जो सहज, सरल, सादगी से खेती कर इस धरती को बचाना चाहते हैं।
- बंशीलाल परमार, मध्यप्रदेश

रंग बिरंगी दुनिया

 भारत का सबसे लंबा परिवार पुणे में
इनसे मिलिए यह है भारत का सबसे 'लंबा' परिवार। इस कुलकर्णी परिवार में सभी सदस्य इतने लंबे हैं कि अब वे विश्व रेकॉर्ड बनाने जा रहे हैं। इस परिवार में हैं 52 साल के शरद कुलकर्णी, जिनकी लंबाई 7 फुट 1.5 इंच है। उनकी 46 वर्षीय पत्नी संजोत, जो 6 फुट 2.6 इंच लंबी हैं। कुलकर्णी की दोनों बेटियां भी 6 फुट लंबी हैं। उनकी बड़ी बेटी मुरूगा 22 साल की है और लंबाई है 6 फुट, छोटी बेटी सान्या जो सिर्फ 16 साल की हैं वह 6.4 फुट की हैं। परिवार के चारो सदस्यों की लंबाई मिला दें तो पूरी 26 फुट बैठती है। अब यह परिवार की कुल लंबाई 26 फुट पर नया विश्व रेकॉर्ड बनाने जा रहे हैं। कुलकर्णी और उनकी पत्नी का नाम लिम्का बुक ऑफ विश्व रेकॉर्ड में पहले से ही दर्ज है।
शरद कुलकर्णी और संजोत की शादी 1989 में हुई थी। कुलकर्णी को उम्मीद थी कि वे 'सबसे लंबे पति- पत्नी हैं और वे गिनेस बुक ऑफ रेकॉर्ड भी बना पाएंगे, लेकिन यह रेकॉर्ड कैलिफोर्निया के वेन और लॉरी हॉलक्विस्ट ने अपने नाम कर लिया था। दोनों की लंबाई 13 फुट 4 इंच थी।
इसके बाद अब कुलकर्णी परिवार को उम्मीद है कि वे इस बार दोनों बेटियों के साथ मिलकर जरूर गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज करवा लेंगे। इस परिवार का अपनी लंबाई के बारे में कहना है कि जब आप दूसरों से अलग होते हैं तो लोग आपको देखते हैं थोड़ा अजीब तो लगता है लेकिन जब आपकी यही अलग पहचान दुनिया तक पहुंचती है तो अच्छा लगता है। हमें उम्मीद है कि सबसे लंबे परिवार का विश्व रेकॉर्ड बनाने में हम जरूर कामयाब होंगे।

6100 मगरमच्छ

चीन में एक किसान और व्यवसायी जिआंगसू प्रांत के फुनिंग शहर में रहने वाले याओ शाओजुंग ने मगरमच्छों के लिए एक फार्म बनाया है, जिसमें करीब 6100 मगरमच्छ पल रहे हैं। वे 2004 से इन मगरमच्छों को पाल रहे हैं।
याओ को सिआमेस मगरमच्छों में विशेषज्ञता हासिल है और उसने हाल ही में थाईलैंड से 36 मगरमच्छ खरीदे हैं। सिआमेस मगरमच्छ ऊष्ण कटिबंधीय इलाकों में रहते हैं और याओ इनको तापमान में आए बदलाव से बचाने के लिए सर्दियों में सौर ऊर्जा वाले ग्रीन हाउस में रखते है।
याओ के फार्म में सबसे बड़े मगरमच्छ का वजन 350 किलोग्राम है। मुख्यत: दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाए जाने वाले सिआमेस मगरमच्छों को विलुप्त हो रही प्रजाति माना जाता है। कुछ वन्यजीव कार्यकर्ताओं के मुताबिक दक्षिणी चीन के कुछ शहरों में इनके मांस को बहुत चाव के साथ खाया जाता है।

प्रकृति की अनमोल कलाकारी

कुदरत के रंग भी अनोखे होते हैं यह अपने अजब- गजब रंग दिखाती ही रहती है। अब जरा नीचे के इस चित्र को देखिए ऐसा लगेगा मानों कोई औरत के आकार का पुतला पेड़ पर लटक कर रहा है। लेकिन सच तो यह है कि यह एक अनोखा फूल है जिसे नारीलता फूल कहते हैं। यह यह एक दुर्लभ फूल है जो 20 साल के अंतराल पर खिलता है। यह भारत के हिमालय और श्रीलंका तथा थाईलैंड में पाए जाने वाले एक पेड़ में खिलता है। हिमालय में इसे इसके आकार के कारण नारीलता फूल कहा जाता है। जब यह फूल खिलता है तो पूरे पेड़ पर चारो तरफ औरत नुमा यह फूल लटके रहते हैं और हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि महिला के बनावट का यह फूल है वाकई में दुर्लभ एवं प्रकृति की अनमोल कलाकारी है।

Aug 18, 2012

लघुकथाएँ



-आशीष दशोत्तर
खलल
संतो के प्रवचन सुनने का उन्हें शौक था। नियमित प्रवचन सुनते। कोई संत नगर में आता तो रोज सुनने जाते। अब तो ऊपर वाले ने उनकी सुन ली थी। टेलीविजन पर रोज प्रवचन आने लगे। वे सुबह से ले कर शाम तक अपने समय के खाली हिस्सों को इन्हीं प्रवचनों से भरते। उनकी इस भक्ति भावना को देखते हुए उन्हें धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति समझा जाने लगा था।
एक दिन वे टेलीविजन पर प्रवचन सुन रहे थे। संत कह रहे थे- बुजुर्गों की सेवा में ही जीवन का सार है। जिसने अपने बुजुर्गों की उपेक्षा की, उसका जीवन नर्क के समान है।
वे प्रवचन में खो चुके थे। संत वाणी को सुन उनकी ऑंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी खट्-खट् की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। पीछे के द्वार पर बूढ़े पिता दस्तक दे रहे थे। वे उठे और उनके पास पहुँचे। लगभग चिल्लाते हुए बोले, क्या है? सभी कुछ तो धर दिया है आपके कमरे में। अब तो चैन से रहने दो। यह कहते हुए वे पिता को घसीटते हुए उनके कमरे में छोड़ आए। आते वक्त उन्होंने पिता के कक्ष के द्वार की साँकल बाहर से जड़ दी। अब प्रवचन सुनने में कोई खलल नहीं होगा। यह सोचते हुए वे पुन: टेलीविजन के सामने बैठ गए।
             परम्परा
बहू घर में पहली बार आई तो सास ने बहू को वही साड़ी दी जो उन्हें अपनी सास से मिली थी। यह घर की परम्परा थी। सास अपनी बहू को साड़ी देती, जिसे वह गोदभराई के वक्त पहनती। बहू का जब गोदभराई का समय आया तो सास ने याद दिलाया कि बहू वही साड़ी पहनना।
बहू ने मुँह बिचकाकर कहा- वो साड़ी और मैं पहनूँ? उसे तो मैंने कभी का बर्तन वाली बाई को दे दिया। कितनी ओल्ड फैशन और घिसी-पिटी साड़ी थी। उसे मैं पहन लेती तो मेरा दम ही घुट जाता।
सास, इस वक्त चुपचाप खड़े अपने बेटे और बोलती बहू के बीच खड़ी नई परम्परा से खुद को जोडऩे की असफल कोशिश कर रही थी। 

लेखक के बारे में- जन्म -05 अक्टूबर 1972, शिक्षा एम.एस.सी.(भौतिक शास्त्र) एम.ए.(हिन्दी)ए एम.एल.बी.ए बी.एड ए बी.जे.एम.सी.ए स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन। प्रकाशन- मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती, ग़ज़ल संग्रह- लकीरें, भगतसिंह की पत्रकारिता पर पुस्तक- समर में शब्द। नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित, आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पाश्र्व स्वर। पुरस्कार- साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन, साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन, म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृष्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत। साहित्य गौरव पुरस्कार। किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित। सम्प्रति- आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।
संपर्क- 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001, मो. 098270-84966, Email- ashish.dashottar@yahoo.com

Jul 25, 2012

उदंती.com-जुलाई 2012

उदंती, जुलाई 2012
मासिक पत्रिका  वर्ष2, अंक 11, जुलाई 2012

 

कैसा छंद बना देती हैं, बरसातें बौछारों वाली,
निगल-निगल जाती हैं बैरिन, नभ की छवियाँ तारों वाली!
    -
माखनलाल चतुर्वेदी



 संस्मरण: बिन पानी सब सून... - डा. रत्ना वर्मा
 मौसम: मानसून की कहानी  - नवनीत कुमार गुप्ता     
 यात्रा वृतांत: अकथ कहानी प्रेम की... -चन्द्र कुमार 
 जीवनशैली: बूंदों में जाने क्या नशा है...  - सुजाता साहा
 फूड प्रोसेसिंग: भोजन के पोषक तत्व कहां... - भारत डोगरा
 कविता: पानी  - अख्तर अली
 मानसून: मोर पपीहा बोलन लागे... - आर. वर्मा
खोज: 10 नए अनोखे प्राणी  - उदंती
 शोध: तेज होता है टैक्सी चलाने वालों का दिमाग
 कालजयी कहानियाँ: उसने कहा था - चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
 लघुकथाएं: 1. सदुपयोग 2. समय चक्र  3. दो रुपए के अखबार -बालकृष्ण गुप्ता गुरु 
 जन्म शताब्दी वर्ष: मैं क्यों लिखता हूँ? - सआदत हसन मंटो
 व्यंग्य: हुए जिन्दगी से जुदा, आ लगे कतार में  - जवाहर चौधरी
 गजल: आँखें भी थक गयीं  - डा. गीता गुप्त
 विचार : मैं तो नहीं पढूंगी ... - डा. ऋतु पल्लवी
 प्रेरक कथा: खाली डिब्बा
 ब्लाग बुलेटिन से: कोलंबस होना अच्छा...  - रश्मि प्रभा
 वाह भई वाह    
 ताँका: पावस - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
 आपके पत्र
 रंग बिरंगी दुनिया

बिन पानी सब सून...

- डा. रत्ना वर्मा
पानी की कमी एक समस्या बनकर हमारे जन- जीवन को प्रभावित करने वाली है यह तो हम सभी अनुभव कर रहे थे परंतु इतनी जल्दी यह मुसीबत हमारे सामने खड़ी नजर आयेगी यह कल्पना हमने नहीं की थी और अब भी हम इस गंभीर समस्या से आँखें मूंदे हुए हैं।
पूरा देश इन दिनों पीने की पानी की समस्या से जूझ रहा है। हमारे देश की राजधानी दिल्ली से लगभग प्रतिदिन यह समाचार आता है कि वहां नलों के नीचे सैकड़ों की संख्या में लोग लाइन लगाए खड़े रहते हैं। दिल्ली शहर यमुना नदी के किनारे बसा है, फिर भी वहां के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि यमुना जो देश की बड़ी नदियों में से एक है, को प्रदूषण से एक जहरीला नाला बना दिया गया है। ऐसे में अन्य बड़े शहरों में कैसा हाहाकार मचा होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। गर्मी के मौसम में पानी की यह समस्या और भी विकराल बन जाती है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने इस वर्ष किया है-
 पिछले साल की तरह इस साल भी हम अपने प्रदेश के 45 डिग्री से भी अधिक पार कर चुके तापमान से राहत पाने उत्तराखंड की पहाडिय़ों पर छुट्टी मनाने जिलिंग (काठगोदाम से सड़क के रास्ते लगभग ढ़ेेड़ घंटे का मार्ग) की पहाडिय़ों पर गए। यह स्थान नैनीताल जिले के मटियाल गांव के ऊपर पहाडिय़ों के बीच बसा वह सुंदर स्थल है जहां सड़क नहीं है और टे्रकिंग करके ही वहां तक पंहुचा जा सकता है। लेकिन गर्मी से राहत इस साल वहां भी नहीं मिली। उत्तराखंड में पहाड़ के लोग भी इस बार गर्मी की तपन झेल रहे हैं और पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। मैदानी इलाके में रहने वाले हम जैसे लोग पहाड़ में रहने वालों की समस्या को तब तक महसूस नहीं कर सकते जब तक उसे स्यवं अनुभव न करें और अपनी आँखों से पीने के पानी के लिए उन्हें जूझते न देखें। लेकिन हम कई बरसों से समाचारों में पढ़ते रहे हैं जिसमें हमारे पर्यावरणविद् अपने अध्ययनों के आधार पर लगातार यह कहते आ रहे हैं कि विश्व में अगली लड़ाई पानी के लिए होगी।  यह लड़ाई अब शुरु हो चुकी है। पहाड़ों पर साल- दर- साल बढ़ रही गर्मी और पानी के लिए तरसते वहां के जीव- जंतु इसके गवाह हैं।
पानी की कमी एक समस्या बनकर हमारे जन- जीवन को प्रभावित करने वाली है यह तो हम सभी अनुभव कर रहे थे परंतु इतनी जल्दी यह मुसीबत हमारे सामने खड़ी नजर आयेगी यह कल्पना हमने नहीं की थी और अब भी हम इस गंभीर समस्या से आँखें मूंदे हुए हैं। अपनी इस यात्रा में जब हमने अपनी आँखों से यह सब देखा और स्वयं इस समस्या से रूबरू हुए तो विश्वास करना पड़ा कि हम अपने पर्यावरण के प्रति कितने लापरवाह हो चुके हैं। एक वह समय था जब आने वाली पीढ़ी को विरासत के रूप में सौंपने के लिए हमारे बुजूर्ग छायादार और फलदार पेड़ लगाते थे, यह सोच कर कि हमारे बच्चे जब बड़े होंगे तो इन हरे- भरे पेड़ों की छांह तले बैठ कर इसकी ठंडी हवा को महसूस कर हमें याद करेंगे कि हमारे दादा- परदादा ने हमारे बेहतर जीवनयापन के लिए ये पेड़ लगाये थे। पर आज के लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए पेड़ तो नहीं लगाते बल्कि क्रांक्रीट के जंगल जरूर खड़े करते चले जा रहे हैं। ऐसे जंगल जो अगली पीढ़ी को मुसीबत के अलावा और कुछ नहीं देने वाले।
...तो मैं बता रही थी उत्तराखंड इन दिनों पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। वहां के रहने वालों से बात करने पर जानकारी मिली कि पहाड़ के नीचे रहने वाले तो फिर भी किसी तरह अपने लिए पीने के पानी का इंतजाम कर लेते हैं। जैसे नदी से या बोरिंग से। (यद्यपि नदी भी हमें सूखे ही मिले, क्योंकि छह दिन के इस पड़ाव में दो दिन हम स्वयं भी पानी की कमी से जूझे थे और नहाने के लिए नदी ही गए थे, जहां पर भी पानी बहुत कम था लगभग नहीं के बराबर)  हम जिस इलाके में रूके थे वहां के लोग भी पहाड़ों से नीचे उतर कर बोरिंग से पीने का पानी भरकर ऊपर ले जाते थे। वैसे जिस बोरिंग से वे सब और हम भी पानी ले जाते थे उसकी खासियत यह थी कि उस बोरिंग को बगैर ओटे ही लगातार पानी आते रहता था इतना स्वच्छ कि मिनरल वाटर भी पीछे रह जाए। चूंकि वहां पानी पहाड़ों पर बसे घरों पर पहुंचाना होता था इसलिए पानी के उनके बरतन बहुत बड़े नहीं होते थे। मुश्किल से 5-7 लीटर पानी ही वे एक बार में ले जा पाते थे। ज्यादातर महिलाएं और लड़कियां ही पानी भरने दूर- दूर से आती थीं। बिना पानी के कैसे गुजारा होता है पूछने पर वे लोग कहते थे पीने को पानी मुश्किल से मिलता है वहां नहाने की बात ही कहां उठती है हम तो कई कई दिन नहाते ही नहीं।
 बहुत ही कम पानी में जीवन गुजारना हो तो वह पहाड़ में पानी की समस्या से जूझ रहे लोगों से सीखना होगा। हम शहरों के नलों में पानी के लिए लाइन लगाए लोगों को देखकर परेशान हो जाते हैं पर कोई इन पहाड़ में रहने वालों का दुख भी देखे जो पानी का मटका या पीपा लेकर ऊंची- ऊंची पहाडिय़ों पर चढ़ते- उतरते हैं। पिछले साल भी हम इसी इलाके में गए थे पर तब हालात आज से बेहतर थे। जंगल हरे- भरे थे। फलों की भरमार थी। लोग खुश नजर आते थे पर आज उनकी आंखों में निराशा साफ झलकती है।
  वहां पिछले एक साल से वर्षा ही नहीं हुई है। इस वर्ष पहली बार उस क्षेत्र में तापमान 32 से 35 डिग्री तक गया। जंगल का एक बहुत बड़ा इलाका आग से जल गया है। पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती करने वाले किसानों की हालत तो बहुत ही खराब है। पानी के अभाव में उनकी फसलें सूख रहीं हैं। सरकार ने ग्रीन हाऊस प्रोजेक्ट के माध्यम से वहां के किसानों को फायदा दिलाने की कोशिश की है पर पानी के अभाव में यह भी उनके फायदे का नहीं रहा। ग्रीन हाऊस के पौधों को बचाने के लिए वे पानी लाएं तो कहां से लाएं। पहाड़ों के सभी सोते सूख चुके हैं। पशु- पक्षी प्यासे भटक रहे हैं। मानसून के इंतजार में किसानों की आंखें पथरा गई हैं।
जाहिर है प्रकृति हमसे नाराज है। बेदर्दी से काटे जा रहे जंगल, नदियों पर बनाए जा रहे बांध, कल- कारखानों का फैलता जाल और भूजल का दोहन आदि सबने मिलकर आज ये हालात बना दिए हैं कि जिन पहाड़ों पर से झरनों के हजारों सोते नीचे आकर नदियों से मिल जाया करते थे वे पहाड़ आज उजाड़ हो गए हैं। मानसून भी इस बार 10 दिन विलंब से आया है और इस बरस इसके कमजोर रहने की संभावना भी बताई जा रही है।
याद रहे बिन पानी सब सून।