July 25, 2012

शोधः तेज होता है टैक्सी चलाने वालों का दिमाग

लंदन में टैक्सी चलाने वाले लोगों पर किए गए टेस्ट से पता चला है कि उनके मस्तिष्क का आकार बढ़ गया है। रास्तों के नाम याद करते- करते उन्होंने अपने दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
लंदन में टैक्सी ड्राइवर बनने का मतलब केवल ट्रैफिक के नियमों को याद करना ही नहीं होता, बल्कि हर गली- सड़क का नाम भी याद करना होता है। वैज्ञानिकों की मानें तो ये ड्राइवर अपने दिमाग का आम इंसान से ज्यादा प्रयोग करते हैं। दरअसल इन ड्राइवरों को सैलानियों को ध्यान में रखते हुए सभी पर्यटन स्थलों और साथ ही दस किलोमीटर के घेरे में करीब 25 हजार सड़कों के नाम याद करने होते हैं। लंदन के ड्राइवरों ने इसे नालेज यानी ज्ञान का नाम दिया है। इस ज्ञान को हासिल करने में चार साल का वक्त लग जाता है और आधे ही लोग इसे ठीक तरह से ग्रहण कर पाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि टेस्ट पास करने वाले ड्राइवर केवल लाइसेन्स ही प्राप्त नहीं करते हैं, बल्कि वे अपना दिमाग भी बाकियों की तुलना में ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।
यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के न्यूरोसाइंटिस्ट्स के एक दल ने पाया कि टेस्ट पास करने वाले ड्राइवरों के मस्तिष्क में ग्रे मैटर अन्य ड्राइवरों की तुलना में ज्यादा था। रिपोर्ट लिखने वाली एलेनोर मेगवायर ने बताया, हम जानते हैं कि मस्तिष्क का वह हिस्सा जो रास्ते याद करने में हमारी मदद करता है उसे हिपोकैम्पस कहा जाता है। सिर्फ वे ड्राइवर जो टेस्ट पास कर सके- जो नालेज हासिल कर सके- सिर्फ उन्हीं के मस्तिष्क में हमें कुछ बदलाव दिखे और ये बदलाव खास तौर से हिपोकैम्पस में देखे गए।
एलेनोर मेगवायर की टीम ने 79 ड्राइवरों पर प्रयोग किए। इन में से केवल 39 ही टेस्ट पास कर सके। इसके अलावा अन्य 31 लोगों को भी प्रयोग में शामिल किया गया। सभी 110 लोग एक ही आयु वर्ग के और एक जैसे बौद्धिक स्तर के थे। इन सब के मस्तिष्क का एमआरआई किया गया। परिणाम एक जैसे ही दिखे। लेकिन फिर तीन चार साल बाद जब दोबारा स्कैन किया गया तब परिणाम अलग दिखे। जिन लोगों ने टेस्ट पास किया था उनके मस्तिष्क में हिपोकैम्पस का आकार बढ़ गया था।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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