July 25, 2012

विचार: मैं तो नहीं पढूंगी...

- डॉ. ऋतु पल्लवी
प्रश्न उठता है कि जब पठन- पाठन की दुनिया इतनी रोचक, इतनी प्रभावी और इतनी सफल है तो आज हमारी वर्तमान पीढ़ी इससे विमुख क्यों होती जा रही है?
त्रिलोचन जी अपनी प्रसिद्ध कविता चंपा 'काले -काले अछर नहीं चीन्हती' में चंपा को पढऩे- लिखने के अनेक लाभ बताते हुए पढ़ाई की ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं परन्तु अंत में चंपा यही कहती है... मैं तो नहीं पढूंगी! आज जब कि पठन- पाठन की रूचि और प्रचलन दोनों निरंतर कम होते जा रहा है। प्रिंट माध्यम पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम हावी हो रहा है, कवि की यह समस्या हम सब की समस्या बनकर सामने खड़ी है और पूछ रही है... मैं क्यों पढूं?
मैं क्यों पढूं जब कि आजकल पढऩे को कुछ भी अच्छा नहीं रहा। अखबारों में लूटमार और घोटालों के चर्चे, पत्रिकाओं में मनोहर कहानियां और किताबें छपती हैं उन बड़े लोगों की जो लेख लिखते नहीं खरीदते हैं। एक समय था जब घर के बच्चे चम्पक- नंदन, रामचरित मानस के प्रसंग और गांधी- तिलक की जीवनी पढ़कर बड़े होते थे परन्तु आज चाचा चौधरी और डोरेमोन टीवी पर है जबकि मानस के राम और हनुमान शक्तिमान बनकर फिल्मों में ज्ञान -विज्ञान की बातें किताबों से अधिक इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। और तो और अब तो शिक्षक भी ऑन लाइन ही मिल जाते हैं। फिर क्यों उलझें बच्चे किताबों कि दुरूह दुनिया से ? पहले माता- पिता और शिक्षक बच्चों की वय और मनोवृत्ति के अनुकूल उपयोगी पुस्तकें लाकर उन्हें पढऩे के लिए देते थे परन्तु आज के बच्चे को अपने मनोनुकूल ज्ञान और मनोरंजन एक बटन दबाने पर ही प्राप्त हो जाता है। आप कहेंगे ये प्रगति है, विकास है। मैं इस बात से सहमत हूँ और इस प्रगति के विरोध में बिल्कुल नहीं हूँ परन्तु पठन- पाठन के समग्र प्रभाव और किताबी माध्यम (प्रिंट माध्यम) की सफलता को अधिक सशक्त मानती हूँ। मनोवैज्ञानिक रूप से भी देखें तो टीवी या कम्प्यूटर पर देखी गयी कोई घटना या कहानी हमारे मस्तिष्क पर उतना स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ती जितना कि एक अच्छा पढ़ा हुआ लेख । यदि किसी पढ़ी हुई कहानी, कविता या लेख ने सचमुच आपके मर्म को छुआ है तो आप उस संवेदना को जीवन पर्यंत याद रखते हैं। वास्तव में आज के प्रचलित माध्यम टीवी, कम्प्यूटर आदि का मूलाधार भी तो पठकथा ही है, अत: इन माध्यमों को भी विस्तार के लिए पठन- पाठन का सहारा लेना ही पड़ता है। पूरा प्रयास किया जाता है शरतचंद्र के उपन्यास को परदे पर उतारने का और यदि निर्देशक की मेधा और अनुभूति पुस्तक के मर्म तक पहुँचने में सफल हो जाती है तो हो गयी फिल्म हिट अन्यथा बेकार है। जनसंचार माध्यम के रूप में भी जितनी सफलता प्रिंट या मुद्रण माध्यम को प्राप्त हुई है उतनी इलेक्ट्रॉनिक या अन्य किसी माध्यम को कभी प्राप्त नहीं हो सकती।
कहते हैं किताबें हमारी सबसे अच्छी मित्र हैं। जिसने भी कहा है सही कहा है और आज की आपाधापी भरी व्यस्त जिन्दगी में तो यह और प्रासंगिक है। जिसने किताबों को अपना मित्र बना लिया उसका दिमाग कभी खाली नहीं रहता। विभिन्न विचारों, संवेदनाओं, आस्था- विश्वास का संग्रह उसके मस्तिष्क में होता जाता है। ये पठन- पाठन उसकी चिंतन मनन और मेधा शक्ति का विस्तार करता है, उसकी सोच का दायरा बढ़ता है और वह वास्तव में बुद्धिजीवी बनता है।
वैसे पढऩे के लिए सबके अपने- अपने उद्देश्य हैं, कोई साक्षर बनने के लिए पढ़ता है, कोई हिसाब -किताब के लिए पढ़ता है तो कोई उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पढ़ता है। परन्तु जिस पठन को आदर्श माना जाता है वह है स्वान्त: सुखाय। यह वह पढऩा है जिसमें पढऩे वाला केवल अपने पढऩे के लिए पढ़ता है। पढऩे का नशा भी अद्भुत है- पढऩे वाला जब पढऩे के आनंद में डूब जाता है फिर उसे दीन- दुनिया की कोई खबर नहीं रहती, खाना-पीना तक विस्मृत हो जाता है । इस अनुभूति की दुनिया में पहुँचकर मनुष्य आम जीवन के सब सुख-दु:ख भूल जाता है, यथार्थ की दुनिया से फेन्टेसी की दुनिया में पहुँच जाता है। किताबों की दुनिया अनंत है एक किताब पढ़कर कोई प्रेरणा प्राप्त करता है तो दूसरी किताब पढ़कर कोई जीवन का सार ढूँढता है।
प्रश्न उठता है कि जब पठन- पाठन की दुनिया इतनी रोचक, इतनी प्रभावी और इतनी सफल है तो आज हमारी वर्तमान पीढ़ी इससे विमुख क्यों होती जा रही है? यहाँ मुझे पुन: त्रिलोचनजी की चम्पा याद आती है, ग्वाले की छोटी सी अनपढ़ बच्ची हमारे पढ़े- लिखे समाज को उसका आइना दिखा देती है जब वह कहती है, हाय राम तुम पढ़-लिख के इतने झूठे हो! वास्तव में यह हमारे समाज की विडम्बना ही है कि आज पढ़ लिख कर ऊँचे ओहदों पर पहुँचने वाला कथित शिक्षित वर्ग, समाज के अन्य वर्गों से अधिक भ्रष्ट और अधिक अनैतिक हो गया है। हमारे समाज का यही दर्द, यही टीस हम सबको भी कहीं न कहीं भेदती है, तभी तो आज हम अपने बच्चों को पढऩे के लिए उस शिद्दत से प्रेरित नहीं कर पाते, उनके सामने पढ़े- लिखे समाज का एक आदर्श उपस्थित नहीं कर पाते। समय आ गया है कि अति भौतिकतावादी और मशीनीकरण की इस अंधी दौड़ में कहीं ठहरकर हमें अपनी संवेदनाओं को टटोलना होगा। ये काले- काले अक्षर, मोटी- मोटी किताबें हमारे सभ्य समाज को आकर देतीं हैं, हमारे अध्ययन- चिंतन- मनन को आयाम देतीं हैं जिनके अभाव में मनुष्य एक मशीनी पुतला बनकर रह जाएगा।
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