July 23, 2012

ताँका: पावस

- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
बिखरी रेत
चिडिय़ा है नहाए
मेघ भी देखे
चिडिय़ा यूँ माँगे है
सबके लिए पानी।
2
बूँदों का झूला
बादल ने है बाँधा
भीगी धरती
छमछम पायल
बजती बरखा की।
3
बिजली हँसी
घनकेश बिखेरे
झपकी आँखें
हुई विभोर धरा
पात नहाए धुले।
4
बैठ झरोखे
गौरैया ये निहारे
कितना पानी!
नीड़ गिरा आँधी से
खो गए कहीं बच्चे।
5
घाटी नहाए
झमाझम वर्षा में
टप-टप टिप के
साज बजाते पत्ते
सन्नाटा टूट गया।
6
झूले की पेंगें
अम्बर को छू लेतीं
खुशबू- भरा
जीवन- रस- भीगा
लहराता आँचल।
7
दो बूँदे गिरीं
नदिया के जल में
बहती गईं
जा मिली सागर में
सागर ही बनी दोनों।
8
नभ से गिरीं
पत्तों पर फिसलीं
चंचल बच्ची
वर्षा की नन्हीं बूँदें
टप-टप बजतीं।
9
नन्हीं फुहारें
उड़ती धुआँ बन
आ धमकतीं
देख खुली खिड़की
माथे को भिगो जातीं।
10
शैतानी करें
हवा के कन्धों पर
चढ़ीं ये बूँदें
पैर हैं लटकाए
द्वार भड़भड़ाए।
11
टिन की छत
तड़तड़ गोली- सी
बूँदें पड़तीं
दौंगड़ा भाग गया
दो पल लड़कर।
12
तपता माथा
धरती का ज्वर से
बादल ने आ
गीली पट्टी रख दी
शीतल हुई काया।
13
मेंढक रागी
गुण गाते रब के -
'तू मेरा दाता
भर ताल- तलैया
दिया सबको पानी।'
14
घुमड़ी घटा
रिमझिम बरसी
सातो ही दिन
जब मिलके बैठे
याद आए अपने।
15
शिखरों पर
ऊँचे पर्वत चढ़
भेड़ों के बच्चे
या मेघ कुदकते
कभी भरें चौंकड़ी।
16
भरके लाए
सुराही बावड़ी
वर्षा रानी ये
पोखर के प्यालों से
पिला प्यास बुझाए।

संपर्क-
फ्लैट न-76,(दिल्ली सरकार आवासीय परिसर),
रोहिणी सैक्टर-11 नई दिल्ली-11008541,
मो. 09313727493,
 rdkamboj@gmail.com

6 Comments:

sushila said...

पावस के पावन जल में भिगो तृप्‍त करते ताँका। सभी बहुत सुंदर! ८वाँ ताँका भाव-सौंदर्य में लाजवाब है तो और १६ वे का रूपम अत्यंत मोहक है!

manukavya said...

आदरणीय रामेश्वर जी की कपना और उन के उपमान सदैव ही अनुपम होते हैं... सभी हाइकू एक से बढ़ कर एक...

शैतानी करें हवा के कंधे पर चढ़ी ये बूँदें.... वाह !! यह तो बस अद्भुत ही है.
सादर
मंजु

उमेश महादोषी said...

उदंती के लिए हार्दिक शुभकामनाएं! हिमांशु जी के तांका बहुत सुन्दर हैं.
दरअसल हिमांशु जी प्राकृतिक दृश्यों के तांका में बेहद खुबसूरत भाव चित्र देते हैं. बधाई!

KAHI UNKAHI said...

बहुत प्यारे ताँके हैं...। खास तौर से यह तो बहुत मार्मिक लगा-
बैठ झरोखे
गौरैया ये निहारे
कितना पानी
नीड़ गिरा आँधी से
खो गए कहीं बच्चे ।

इन की प्रस्तुति के लिए आभार...।
प्रियंका गुप्ता

Dr.Anita Kapoor said...

तपता माथा
धरती का ज्वर से.....और बादल ने आ कर गीली पट्टी रख दी......अनूठी कल्पना......सभी तांका बेहद सुंदर और भावपूर्ण। बधाई

हरकीरत ' हीर' said...

शैतानी करे
हवा के कंधों पर
चढ़ी ये बूंदें ....

अद्भुत हैं ये टांकें ....

आद कम्बोज जी को बहुत बहुत बधाई ....
पत्रिका से पहली बार रु ब रु हुई ...शुभकामनाएं ....!!

लेखकों से अनुरोध...

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